अपराध कम होने का नीतीश का दावा फ़ेल?

  • 12 जनवरी 2017
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बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान नीतीश कुमार का शराबबंदी का वादा बड़ा चुनावी मुद्दा बना था और चुनाव जीतने के बाद उन्होंने इसे लागू भी कर दिया.

हालिया बिहार दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी इस नीति की तारीफ़ भी की.

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शराबबंदी के 30 दिन बाद उन्होंने दावा किया कि अपराध में 27 फ़ीसदी की कमी आई है. इसके लिए उन्होंने अप्रैल 2016 और अप्रैल 2015 के बीच आपराधिक आंकड़ों के विश्लेषण का हवाला दिया था.

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लेकिन अब कहानी उलटती दिख रही है. इस फ़ैसले को लागू हुए अब नौ महीने या 270 दिन गुज़र चुके हैं और बिहार पुलिस के आपराधिक आंकड़ों के इंडियास्पेंड विश्लेषण से नई जानकारी सामने आई है.

इसके मुताबिक वो आपराधिक मामले, जिनमें पुलिस मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना जांच कर सकती है, अप्रैल-अक्टूबर, 2016 के बीच 13 फ़ीसदी बढ़ गए हैं.

अप्रैल में 14,279 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि अक्टूबर में ये मामले 16,153 पर पहुंच गए.

दूसरे शब्दों में कहें, तो शराबबंदी से अपराध में कमी नहीं आई है, जो इस फ़ैसले की प्रमुख वजह बताया गया था.

इंडियास्पेंड ने मई 2016 में बताया था कि बिहार में 2010 से 2015 के बीच दोष सिद्धि के मामलों में 68 फ़ीसदी कमी आई थी, लेकिन इस दौरान अपराधों में 42 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा दर्ज किया गया.

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गुजरात, केरल, राजस्थान और मध्य प्रदेश की तुलना में बिहार में आपराधिक दर काफ़ी कम है और इसकी प्रमुख वजह अपराध दर्ज ना होना है.

पटना उच्च न्यायालय ने सितंबर 2016 में शराबबंदी पर रोक लगाते हुए बिहार एक्साइज़ अमेंडमेंट एक्ट 2016 को 'अवैध' क़रार दिया था.

नए बिल के मुताबिक अगर कोई शराब पीता या रखता है, तो परिवार के सभी वयस्कों को गिरफ़्तार किया जा सकता है. क़ानून का उल्लंघन करने पर 10 साल जेल और 10 लाख जुर्माना हो सकता है.

अगर सरकार का कोई विधेयक अदालत दरकिनार कर देती है, तो क़ानूनी पाबंदी को क़ानून में बदला जा सकता है, जिसमें अदालत दख़ल नहीं दे सकती. बिहार में शराबबंदी के मामले में यही हुआ.

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