क्यों मजबूर हैं सुषमा ट्विटर पर तीर चलाने को?

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बहुत पुरानी बात नहीं, आज की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तब प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में शुमार की जाती थीं.

वह मशहूर हो चुकी थीं. सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ दिलेरी से चुनाव लड़ने के लिए और फिर दिल्ली के चुनाव.

मुख्यमंत्री के रूप में अरविंद केजरीवाल के अवतरित होने के पहले ही दिल्ली की जनता के साथ यह वादा करने के लिए- मैं जागूँगी सारी-सारी रात ताकि आप चैन की नींद सो सकें!

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वह केंद्र सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री की जिम्मेदारी भी निबाह चुकी हैं. सुषमा जानी जाती रही हैं अपने श्रोताओं को भावावेश से भर देने वाले ओजस्वी हिंदी भाषणों के लिए जो अटल जी के अच्छे दिनों की याद ताज़ा करा देते थे.

आज सुषमा जी नज़र आती हैं तो सिर्फ ट्विटर पर चहचहाती हुईं.

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सुषमा फॉरेन पॉलिसी मैगज़ीन के ग्लोबल थिंकर्स में

मौजूदा हालात का ज़िक्र करते हुए कुछ हमदर्द विश्लेषक बेसाख़्ता कराह रहे हैं- 'ज़माने ने मारे जवां कैसे कैसे, जमीं खा गई आसमां कैसे कैसे!'

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बहुत बोलने वाली और दिल खोल के बोलने वाली इस नेता का हाल यह हो गया है, "हम भी मुंह में ज़बान रखते हैं काश पूछो कि मुद्दआ क्या है!"

गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद अस्पताल के बिस्तर से अपने गंभीर रोग और उसके इलाज से जुड़ी तमाम जानकारियों का साझा उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए 160 अक्षरों में जिस वीतराग भाव से किया उसकी दाद देने को दुश्मन भी मजबूर हुए हैं.

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कई लोगों को यह बात काफी अजीब लग रही है कि क्या आज भारत की विदेश मंत्री के पास बस इतना भर काम बचा है कि वह ट्विटर पर ही दिन रात 'व्यस्त' बनी रह सकती हैं- कभी किसी को तत्काल से भी तत्काल पासपोर्ट दिलवा दें, बिछुड़ों को फिर मिला दें या किसी दूसरे विभाग के सरकारी.

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कर्मचारी को अनुशासन भंग करने के अपराध में मुअत्तली की धमकी ठिठोली के अंदाज़ में सुना दें.

शायद कड़ुवा सच यही है कि बीमारी के पहले भी अति सक्रिय प्रधानमंत्री ने साउथ ब्लॉक के मुखिया के लिए ज़्यादा कुछ ज़िम्मेदारी छोड़ी नहीं थी.

सुषमा स्वराज जैसी मुखर इंसान के लिए यह अनचाही फुरसत सज़ा से कम नहीं थी.

'मेरी बात रही मेरे मन में' जैसी स्थिति वह स्वीकार नहीं कर सकती थीं.

इस जुझारू नेता के आत्मविश्वास में कमी नहीं थी. 'मन की बात' कहने का जो मंच सुलभ था उसी पर उन्होंने कब्ज़ा कर लिया.

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कुछ इस अंदाज़ में 'अभी तो मैं हयात हूं, हवा भी ख़ुशगवार है' वगैरह.

वैसे भी अपने समकालीन सहयोगियों की तुलना में आधुनिकतम तकनीक अपनाने में वह आगे रही हैं.

जब अपनी चुलबुली टिटहरियों के कारण शशि थरूर ने अपने लिए बहुत सारी दिक्कतें पैदा कर ली थीं तकरीबन उन्हीं दिनों से सुषमा जी ट्विटर की नन्ही सी गागर में सागर भरने के अभियान में जुटी रही हैं.

परेशानी का सबब यह है कि ट्विटर गागर कम, डूबने-डुबाने वाली लुटिया ज़्यादा साबित होती रही है.

जब संकटग्रस्त ललित मोदी के साथ अपने पारिवारिक संबंधों की वजह से वह विवादों के घेरे में फँसी थीं तब भी ट्वीट के ज़रिए ही अपना बचाव करने की जो रणनीति उन्होंने अपनाई उसने भी कुल मिला कर उनकी छवि को नुक़सान ही पहुँचाया था.

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सुषमा यह सोचने वालों में अकेली नहीं कि ट्विटर का तरकश बिहारी के दोहों वाले नाविक के तीरों से भरा है- देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर.

मगर जब धनुष की प्रत्यंचा ही ढीली या टूटी हो तब तीर हो या तुक्का निशाने तक पहुंच ही नहीं सकता.

फ़िलहाल अकेले सुषमा जी की ही नहीं बहुत सारे लोगों की मायूसी का सबब मीर का शेर याद दिलाने वाली इस दर्दनाक हक़ीक़त का अहसास है- 'करें क्या कि दिल भी तो मजबूर है, जमीं सख़्त है, आसमां दूर है!'

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