नज़रिया : यह जनता की वेदना है या काँग्रेस की?

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काँग्रेस का 'जन वेदना सम्मेलन' देखा. समझ में नहीं आया कि यह किसकी वेदना की बात हो रही है? जनता की वेदना या काँग्रेस की? जनता अगर इतनी ही वेदना में है तो हाल-फ़िलहाल के छोटे-मोटे चुनावों में लगातार बीजेपी को वोट दे कर वह अपनी 'वेदना' बढ़ा क्यों रही है?

काँग्रेस की वेदना कितनी है, ज़रा किसी काँग्रेसी से 'ऑफ़ द रिकॉर्ड' बात करके देखिए, पता चल जायेगा. और यह भी पता चल जायगा कि काँग्रेस ऐसी वेदना में लगातार क्यों लटकी हुई है?

और जनता की अगर कोई वेदना है तो वह यही कि काँग्रेस अपनी 'वेदना' दूर करने के लिए रत्ती भर भी कुछ करती क्यों नहीं?

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ढाई साल तक लबड़ धों-धों करते रहने के सिवा काँग्रेस ने आख़िर किया क्या? सरकार से, बीजेपी से या किसी भी पार्टी से जनता अगर बड़ी दुःखी हो, तो भी वह किस बात के लिए, किस आसरे, किस भरोसे काँग्रेस को वोट देने की सोचे?

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कहीं पंजाब जैसी बड़ी ही बेबसी, बड़ी ही मज़बूरी हो कि जनता को त्रिभुज के बाक़ी दोनों कोण इतने ही ऐंचे लगने लगें कि वह काँग्रेस का जुआ अपने गले बांधने का जोखिम लेने की सोचे तो सोचे, वरना काँग्रेस तो ऐसी ठस पड़ी है कि न हिलती है, न डुलती है. क्यों?

इसलिए कि काँग्रेस घोर अनिश्चय में जकड़ी हुई है. काँग्रेस के पास न नेता है, न नारे, न लक्ष्य है, न दिशा, न कार्यक्रम है, न रणनीति, न इच्छा है, न दिलचस्पी, न भविष्य का कोई स्वप्न है, न वर्तमान की कोई जद्दोजहद.

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ऐसी किसी जद्दोजहद का जज़्बा होता, तो उत्तर प्रदेश चुनाव के ठीक पहले पार्टी के नेता को छुट्टी मनाना क्यों सूझता?

जनता के पास बीजेपी का कोई विकल्प नहीं है. जनता की बस यही एक वेदना है.

और यह वेदना तो तभी ख़त्म होगी, जब काँग्रेस पहले अपनी 'वेदना' दूर करे! 'जन वेदना सम्मेलन' में राहुल गाँधी ने काँग्रेसियों से कहा कि डरो मत! काँग्रेसियों के पास अब डरने को बचा ही क्या है? उन्हें अब और क्या खोना है? वह तो ख़ाली हाथ हैं!

नरेंद्र मोदी के बाण तो राहुल गांधी के तीर

राहुल जी, 'डरो मत' के बजाय कुछ करने की बात कीजिए! डरने के लिए काँग्रेस के पास कुछ भी नहीं बचा है.

करने के लिए बहुत कुछ है. और जो करना चाहता है, वह देखते ही देखते उठ खड़ा होता है, सब कर लेता है.

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अखिलेश यादव की मिसाल सामने है. अभी डेढ़ साल पहले तक वह 'बबुआ' कहाते थे. जनता उन्हें लगभग ख़ारिज कर चुकी थी. समय रहते अखिलेश ने यह बात समझ ली. एक साल में ही लोगों ने एक बिलकुल नये दृढ़संकल्पी, जुझारू और क़द्दावर अखिलेश को देखा.

अखिलेश ने अपनी कमियाँ पहचानीं और उन्हें दूर करने के लिए जो करना था, किया.

साफ़ है कि नरेन्द्र मोदी के 'राजनीतिक मैनेजमेंट' को किसी ने सबसे ज़्यादा सही तरीक़े से भाँपा और सीखा तो वह अखिलेश ही हैं. लोगों के बीच सर्वे करा-करा कर अखिलेश ने सफलतापूर्वक 'इमेज-करेक्शन' कर लिया, ख़ुद को भी बदला और अपने बारे में, अपनी पार्टी के बारे में लोगों की राय भी बदली.

चुनाव में अखिलेश हारें या जीतें, कम से कम वह 'बबुआ मुख्यमंत्री' के तौर पर इतिहास में नहीं दर्ज होंगे.

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लेकिन राहुल गाँधी ख़ुद को बदलेंगे क्या? यह सवाल इसलिए कि काँग्रेस राहुल गाँधी को बदले और किसी और के पीछे चलना शुरू कर दे, इसकी सम्भावना तो है ही नहीं, कम से कम अभी तो दिखती नहीं. इसलिए काँग्रेस की छवि तो तभी बदलेगी, जब राहुल गाँधी की अपनी छवि बदले!

लेकिन सवाल यह है कि 2014 की धूल-धूसरित हार के बाद के ढाई साल में राहुल गाँधी ने क्या सीखा, क्या बदला? बस इतना ज़रूर हुआ कि पहले के मुक़ाबले बोलने की कला में वह मामूली सुधार कर पाए हैं. लेकिन जब मुक़ाबले पर नरेन्द्र मोदी जैसा बोलनेवाला हो, बस इतने-से काम कैसे चलेगा?

बुधवार के 'जन वेदना सम्मेलन' के उनके भाषणों को ही लीजिए. उन्हें पता नहीं कि मंगल पर मंगलयान गया था या चन्द्रयान? याद नहीं कि 'स्वच्छ भारत' और 'मेक इन इंडिया' के अलावा मोदी सरकार कौन-कौन से कार्यक्रम चला रही है.

मंच पर मौजूद नेताओं को बाक़ी के नाम बताने पड़े. फिर भी राहुल गाँधी ने उसमें 'टीच इंडिया' जोड़ दिया!

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भाषण में उन्होंने कहा कि 'अभी एंटनी जी बता रहे थे कि कुछ ही घंटे पहले या शायद एक दिन पहले रिज़र्व बैंक को चिट्ठी गयी कि आप 'डिमानेटाइज़ेशन' करने को तैयार हो या नहीं?' चिदम्बरम से उन्हें पूछना पड़ा कि वे कौन-से देशों के नाम बता रहे थे, जहाँ 80 प्रतिशत से ज़्यादा लेन-देन नक़द में होता है!

नोटबंदी पर इस तरह के तमाम तथ्य आज हर आदमी की ज़बान पर हैं. लेकिन राहुल गाँधी को मालूम नहीं. ऐसे गम्भीर मुद्दे पर भी कोई नेता इतना अनजान, इतना 'अगम्भीर' हो, तो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है? कौन उसे 'भावी प्रधानमंत्री' के तौर पर देखने को तैयार होगा?

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ख़ास कर आज के दौर में, जब नेता अपनी छवि, अपनी बात, अपने मैनरिज़्म, अपने व्यक्तित्व को लेकर इतना सचेत हों.

नरेन्द्र मोदी को लीजिए. सोशल मीडिया पर उनका कम मज़ाक़ नहीं उड़ता. लेकिन वह उससे कितना सीखते हैं, इसका अन्दाज़ इसी से लग सकता है कि नव वर्ष की पूर्व संध्या पर दिये अपने भाषण में उन्होंने एक बार भी 'मितरों' नहीं बोला.

आज की राजनीति में नेता को इतना ही सचेत होना पड़ेगा. यह बेमन वाली आधी-अधूरी राजनीति राहुल गाँधी के लिए भी ख़राब है और काँग्रेस के लिए भी.

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राहुल गाँधी को अगर राजनीति में टिकना है तो उनके पास अपने लिए भी एक ख़ाका होना चाहिए कि उन्हें अपने भीतर क्या बदलाव कितने दिन में कर लेने हैं और एक ख़ाका काँग्रेस के लिए भी होना चाहिए कि पार्टी का पुनरुद्धार कैसे होगा.

उत्तर प्रदेश में प्रशान्त किशोर को बड़े ताम-झाम से लाया गया और कुछ ही महीनों में इस 'चुनाव-गुरू' को 'बेआबरू' हो कर बाहर बैठना पड़ा. जो मोदी और नीतीश के साथ चुपचाप काम कर सका, वह घिसे-घिसाये काँग्रेसी नेताओं के आगे क्यों चल नहीं पाया? आख़िर कहीं न कहीं भारी गड़बड़ तो है.

गड़बड़ यही है कि पार्टी के पास कोई प्लान नहीं है. राज्यों में किन नेताओं को उभारा जाये, कैसे पार्टी को खड़ा किया जाये, इसकी कोई योजना नहीं. पार्टी कट-पेस्ट से, तरह-तरह के 'एडजस्टमेंट' से किसी तरह काम चला रही है.

काम चलाना अलग बात है, और काम करना बिलकुल अलग मुहावरा है. काम करने के लिए डर और हिचकिचाहट छोड़नी पड़ती है. मुझे लगता है कि 'डरो मत' का नारा बिलकुल सही है, लेकिन यह कार्यकर्ताओं के लिए नहीं, ख़ुद राहुल गाँधी के लिए है.

तो राहुल जी, डरो मत, कुछ करो, कुछ कर दिखाओ. काँग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं है.

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