पश्चिम बंगाल: ज़री के तारों के साथ बिखरा धूलागढ़

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"हिंदुओं ने हमारे जुलूस पर हमला किया और हम पर हिंदू देवी-देवताओँ का नाम लेने के लिए दबाव डाला"-एक अल्पसंख्यक युवक.

"अल्पसंख्यकों ने बाहरी लोगों की मदद से हमारी दुकानों और घरों में आग लगा दिया" -एक हिंदू महिला.

"हमने हिंसा के आरोप में 58 लोगों को गिरफ्तार किया है" -हावड़ा जिला पुलिस.

"धूलागढ़ में कोई दंगा नहीं हुआ" -मुख्यमंत्री ममता बनर्जी.

इन बयानों के मतलब और जरी उद्योग के लिए मशहूर धूलागढ़ में बीते महीने हुई हिंसा के तीन हफ्ते बाद भी पसरे रहस्यमयी सन्नाटे को समझ लें तो पूरा माजरा आपकी समझ में आ जाएगा.

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लेकिन यह उतना आसान नहीं है. खासकर अब जबकि इलाके के लोगों ने अपने होंठ सिल लिए हैं. शायद अब कोई भी तबका आगे कोई हिंसा नहीं चाहता.

स्थानीय मीडिया ने तो इस हिंसा पर लगभग चुप्पी साध ही रखी है, राष्ट्रीय मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइटों पर इस बारे में जो खबरें आती रही हैं उनसे बचपन में सुनी एक कहानी बरबस ही याद आ जाती है. वह कहानी चार नेत्रहीनों के हाथी को छू कर देखने की है. जिसने हाथी के शरीर का जो हिस्सा छूआ उसने उसका वैसा ही ब्योरा दिया.

परस्पर विरोधाभासी बयानों के चलते पक्के तौर पर यह कहना तो मुश्किल है कि आखिर इस छोटे-से अनाम कस्बे में हिंसा की चिंगारी कैसे भड़की.

लेकिन अब तीन हफ्ते से ज्यादा समय गुजरने के बाद कुछ चीजें शीशे की तरह साफ हैं. मिसाल के तौर पर 13-14 दिसंबर को हुई हिंसा और आगजनी में जो घर, दुकानें और कारखानें जलाए गए, वे दोनों संप्रदायों की थीं, किसी एक की नहीं.

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इसके साथ ही यह भी सच है कि हिंसा की इस बहती गंगा में कुछ 'बाहरी' लोगों ने भी जम कर हाथ धोया था. दोनों पक्षों के बयानों में बाकी तमाम बातें भले एक-दूसरे से उलट हों, उनमें एक बात आम है कि हिंसा में 'बाहरी' लोग भी शामिल थे.

छोटा-सा इलाका होने की वजह से ज़्यादातर लोग एक-दूसरे को पहचानते हैं. ऐसे में किसी भी पक्ष के लिए बाहरी व्यक्ति की शिनाख्त करना कोई मुश्किल नहीं है.

लेकिन इस 'बाहरी' के सवाल पर पुलिस और प्रशासन यह कह कर पल्ला झाड़ रहे हैं कि अभी जांच चल रही है. वे यह भी बताने को तैयार नहीं हैं कि इस मामले में अब तक गिरफ्तार 58 लोगों में से कोई 'बाहरी' है या नहीं.

हिंसा के बाद इलाके में धारा 144 लागू कर दी गई थी. अब उसे तो हटा दिया गया है. लेकिन मीडिया और विपक्षी राजनीतिक दलों के लिए अघोषित प्रतिबंध अब भी जारी है. इलाके में हर बाहरी व्यक्ति को संदेह की निगाहों से देखा जा रहा है.

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किसी अनजान व्यक्ति को किसी से बात करते देख कर चार आदमी ठिठक जाते हैं. अगर वह अनजान व्यक्ति पत्रकार हुआ तो उसे शालीनता से वहां से चले जाने को कहा जाता है.

कैमरा या मोबाइल से फोटो खींचना तो यहां आफत को न्योता देना है. शायद हिंसा की आग में झुलस चुके लोग अब चाहते हैं कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाए. करें भी तो क्या ? उनको रहना तो आखिर यहीं है.

आखिर उस दिन हुआ क्या था? जितने मुंह उतनी ही बातें.

तृणमूल कांग्रेस के पांचला ब्लाक सचिव शमशेर अली लश्कर बताते हैं, "मिलाद उन नबी के जुलूस में शामिल कुछ लड़कों को बजरंग दल के नियंत्रण वाले स्थानीय अन्नपूर्णा क्लब के कुछ युवकों ने पकड़ लिया और उसे हिंदू देवी-देवताओं की जयकार लगाने को कहा. जुलूस पर फब्बितयां भी कसी गईं."

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लेकिन संघ के नेता इसकी अलग तस्वीर पेश करते हैं. आरएसएस के एक नेता शुभेंदु सरकार कहते हैं, "क्लब के पास एक अंत्येष्टि हो रही थी. लेकिन जुलूस में तेज आवाज में लाउडस्पीकर बज रहे थे और उसमें शामिल लोग लड़कियों पर टिप्पणी कर रहे थे. हमने इस पर आपत्ति की तो कहासुनी हुई. उसके बाद उनलोगों ने हिंदुओं के घर और दुकानों पर हमले शुरू कर दिए."

इलाके के लोगों से बातचीत करने पर यह बात सामने आई कि हाल के वर्षों में यहां बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों का प्रभाव बढ़ा है. अब हाल की हिंसा में इनके इस प्रभाव की कितनी भूमिका है, यह तो जांच का विषय है.

पश्चिम बंगाल सचिवालय नवान्न की इमारत से महज 30 किमी दूर नैशनल हाइवे पर बसा धूलागढ़ जरी उद्योग के लिए मशहूर रहा है. यही स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी का प्रमुख जरिया है.

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हाल में कई लोग मशीन एंब्रायडरी भी करने लगे थे. लेकिन इन हमलों से जरी के तार बिखर गए हैं. हावड़ा जिले में स्थित साढ़े तीन सौ लघु और मझोले उद्योगों में से सौ से ज़्यादा इसी इलाके में हैं.

इन जरी यूनिटों में लगभग दस हजार लोग काम करते थे. लेकिन हिंसा और आगजनी की वजह से इनमें से कम से कम एक दर्जन यूनिटें अब राख हो चुकी हैं. ऐसी ज्यादातर यूनिटों के मालिक मुस्लिम थे और ये वैसे इलाकों में थे जहां दोनों तबके की आबादी मिली-जुली है.

एक फैक्टरी मालिक शेख अलीमुद्दीन ने हाल में बैंक से कर्ज लेकर 18 लाख की नई मशीनें मंगाई थीं. लेकिन वह सब जल गईं. अब उनको सूझ नहीं रहा है कि करें तो क्या करें?

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धूलागढ़ के बांसतला इलाके में रहने वाले रबीन दास कहते हैं, "हिंसा की शुरुआत इलाहाबाद बैंक की स्थानीय शाखा के सामने हुई. नकदी की निकासी के लिए घंटों कतार में खड़े रहने की वजह से लोगों में वैसे भी भारी नाराजगी थी. उस नाराजगी ने एक छोटी-सी बात को बड़े झगड़े में बदल दिया."

अब ताजा हालत यह है कि हिंसा के बाद घर छोड़ कर भागने वाले कई हिंदू परिवार इलाके में लौट आए हैं लेकिन मुसलमानों के मोहल्ले में अब भी सन्नाटा है.

राज्य सरकार ने हिंसा से हुए नुकसान के लिए 35-35 हजार रुपये का मुआवजा दिया है. जिला प्रशासन और पुलिस ने भी अब इस हिंसा पर चुप्पी साध ली है. इस हिंसा के एक सप्ताह बाद सरकार ने हावड़ा के पुलिस अधीक्षख (ग्रामीण) का तबादला कर दिया था.

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नए पुलिस अधीक्षक सुमित कुमार बताते हैं, "हमने 58 लोगों को गिरफ्तार किया है. इलाके में 14 दिसंबर को हिंसा हुई थी और उसके बाद वहां शांति है. घटना की जांच जारी है."

पुलिस और प्रशासन का दावा चाहे कुछ भी हो लेकिन इस हिंसा ने जरी के धागों के साथ-साथ इलाके का सामाजिक और सांप्रदायिक ताना-बाना भी छिन्न-भिन्न कर दिया है. और शायद कोई भी मुआवजा निकट भविष्य में इसकी भरपाई नहीं कर सकता.

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