‘रॉबिनहुड’ जिसने हिंदू लड़कियों को आज़ाद कराया!

सुंदर मुंदरीए तेरा कौन विचारा, दुल्ला भट्टी वाला

दुल्ले भी विआही, सेर शक्कर पाई, कुड़ी दे बोदे लाई, कुड़ी दा सालू पाटा

सालू कौन समेटे, जिमीदार लुल्टे, जिमीदार छुड़ाए, गिन-गिन पौले लाए

इक पौला घट गया, जिमीदार वहुटी लैके नस्स गया

लोहड़ी के त्योहार पर यह गीत उस लोकनायक दुल्ला भट्टी की याद में सदियों से लोग गाते हैं, जिसने मुसलमान होते हुए भी हिंदू लड़कियों सुंदरी और मुंदरी को जागीरदारों के हाथों से छुड़ाकर ख़ुद उनकी शादी की थी.

बताया जाता है कि सांदल बार इलाक़े के जागीरदार ने एक ब्राह्मण की दो बेटियों को उठा लिया था. अब यह इलाक़ा पाकिस्तान के मुल्तान शहर के पास है. दुल्ला मुग़लों के ख़िलाफ़ तब गुरिल्ला लड़ाई कर रहे थे.

गीत की शक्ल में कही जाने वाली यह कहानी बताती है कि उसने दोनों लड़कियों को छुड़ाया और ख़ुद ग़रीब ब्राह्मण की जगह उनका बाप बना. लड़कियों के सिर के सालू (पल्लू) को बेटियों की इज़्ज़त माना जाता था जिसे उसने रखवाया. तब किसी ग़रीब के हक़ में और वह भी लड़कियों के हक़ में खड़े होना बड़ी बात थी.

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पंजाब में लोहड़ी का जश्न मनाते लोग.

दुल्ला भट्टी अपने पिता की मौत के चार महीने बाद 1569 में पैदा हुए थे. तब अकबर का समय था और उनके पिता मुसलमान राजपूत फ़रीद ख़ान भट्टी ने सांदल बार के पिंडी भट्टीयां इलाक़े में अकबर के ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी थी. क्योंकि मुग़लों ने ज़मीन का लगान सरदारों की जगह सीधे ही लेना शुरू कर दिया. इसके लिए सरदार तैयार नहीं थे.

मुग़लों ने फ़रीद ख़ान की बग़ावत दबाकर उन्हें फांसी दे दी और उनकी जायदाद ज़ब्त कर ली. दुल्ला भट्टी को अपनी जवानी में पिता की फांसी के बारे में पता चला. और इसके बाद उन्होंने मुग़लों के ख़िलाफ़ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया. वह ख़ज़ाने लूटकर ग़रीबों में बांट देता था. इसी वजह से दुल्ला भट्टी को कुछ लोग रॉबिनहुड भी कहते हैं. अपने मरने से पहले ही उसके नाम पर गीत बनने लगे थे.

दुल्ला की बग़ावत दबाने के लिए अकबर ने फ़ौज भेजी जिसने दुल्ला की मां के साथ उनके क़बीले की महिलाओं को भी बंदी बना लिया था.

इतिहास के जानकार कहते हैं कि मुग़ल फ़ौज ने सुलह के बहाने दुल्ला को बातचीत के लिए बुलाया और धोखे से पकड़ लिया. बाद में लाहौर कोतवाली के सामने उन्हें 1599 में फांसी पर लटका दिया गया. तब दुल्ला की उम्र सिर्फ़ 30 साल थी. बताया जाता है कि उनकी अंतिम संस्कार की रस्में सूफ़ी संत शाह हुसैन ने निभाई थीं, जिसके लिए बाद में शाह हुसैन को भी फांसी पर चढ़ा दिया गया था.

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