फ़ोन बंद कर एकांत में जाना चाहते थे ओमपुरी

  • 14 जनवरी 2017
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शराब की बदबू को दबाने के लिए पान चबाते हुए पुलिस इंस्पेक्टर अनंत वेलणकर सधे क़दमों से थाने में घुसता है.

उसकी चाल में एक कड़कपन है, बदन तार की तरह सीधा तना हुआ है, आँखें नशे से भारी और चेहरे पर लापरवाही, ग़ुस्सा, डर और असुरक्षा की हलकी सी परत.

'अर्द्धसत्य' फ़िल्म में अनंत वेलणकर का रोल कर रहे ओमपुरी ने मिनट भर के इस दृश्य में इतने सारे मिलेजुले भावों को इतने सधे ढंग से उकेरा कि उनके स्क्रीन पर आते ही एकबारगी लगता है जैसे कमरे में पान और सस्ती शराब की मिली जुली बदबू फैल गई हो.

"आपने क्या शराब पीकर वो शॉट दिया था?" ओमपुरी से ये सवाल इतने सीधे तौर पर पूछने के बाद मुझे लगा कि इतना बेतकल्लुफ़ होना भी ठीक नहीं.

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ओम पुरी का स्पेशल इंटरव्यू

मैंने फ़िल्मी हस्तियों के मूड के बारे में कई कहानियाँ सुन रखी थीं और ख़ुद अमिताभ बच्चन से एक इंटरव्यू के दौरान महसूस भी किया कि फ़िल्मी हस्तियाँ अपने आसपास एक अदृश्य कवच बना लेती हैं ताकि कोई उनके निजी जीवन में दख़ल देने की हिमाक़त न कर सके.

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वैसे भी मैं ओमपुरी का कोई पुराना परिचित या दोस्त तो था नहीं. हम दिल्ली हवाई अड्डे पर कुछ ही घंटे पहले मिले थे और एक ही फ़्लाइट से सिलीगुड़ी पहुँचे जहाँ अगले दिन मुझे उनसे एक समारोह में लंबी बातचीत करनी थी.

पर ओमपुरी ने जो जवाब दिया उससे मुझे अपने बारे में ग़लतफ़हमी ज़रूर हो गई. उन्होंने कहा, "आप दूसरे इंसान हैं जिसने ये सवाल किया है. पहली बार ये सवाल मुझसे पूछा मेरे दोस्त नसीरुद्दीन शाह ने. सच तो ये है कि मैंने वो शॉट बिना पिए दिया था."

सिलीगुड़ी के एक होटल में 14 नवंबर की दोपहर जब हम ये बातचीत कर रहे थे, ओमपुरी के हाथ में व्हिस्की का पैग था. उनके ऐशट्रे में जली-अधजली सिगरेटों का ढेर बढ़ता जा रहा था.

कमरे में सिगरेट का धुआँ इतना गहरा हो गया था कि सिगरेट से परहेज़ करने वाले मेरे जैसे आदमी के लिए साँस लेना दूभर हो जाए. कुछ ही देर पहले जब मैं उनके कमरे में पहुँचा था तो ओमपुरी अपने बिस्तर पर लेटे थे और इलेक्ट्रानिक मशीन से अपना ब्लड प्रेशर नाप रहे थे.

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ये मशीन और दवाएँ वो हर जगह अपने साथ ले जाते थे. "सिर में कुछ दर्द है. लगता है ब्लड प्रेशर बढ़ गया है", ओमपुरी ने ये बात भी इतने इत्मीनान से कही कि जैसे कुछ हुआ ही न हो. कुछ ही देर में लंच आया और पुरी साहब ने अपने सूटकेस से विह्स्की की मिनिएचर बोतलें निकाल कर खोल लीं थीं.

मैंने देखा ग्लास उठाते वक़्त, सिगरेट बुझाते वक़्त या मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल करते वक़्त पुरी साहब के हाथ लगातार काँपते रहते थे. उस दोपहर में लंच का इंतज़ार करते हुए ओमपुरी ने एक्टिंग की बारीकियों पर बात की.

उनके तेवर अचानक बदले. मैंने बस पूछा भर था कि एक एक्टर के लिए किसी चरित्र में रमने के लिए क्या क्या ज़रूरी होता है.

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जब ओम पुरी ने कहा आर्मी मुझे सजा दे

जिस शख़्स को हम अपने कैशोर्य के दिनों से पर्दे पर अलग अलग रंगतों और भावों में देखते आए थे, वो ऐन हमारे सामने खड़े होकर हमें बताने वाला था कि उसके पास एक्टिंग के कौन कौन से औज़ार हैं और वो उनका कैसा और कितना इस्तेमाल करते हैं.

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ओमपुरी सिगरेट झाड़ते हुए उठ खड़े हुए और एक ड्रामा टीचर की तरह एक सीन समझाने लगे: "आपके सामने मैयत पड़ी है और आप वहाँ मातमपुर्सी के लिए पहुँचे हैं. आप क्या करेंगे? क्या आप बदहवास होकर चिल्लाने लगेंगे? नहीं. ख़बर चाहे जितनी बुरी मिले, आदमी सिर्फ़ उस ख़बर पर ही फ़ोकस नहीं करता. उसे तमाम और काम करने होते हैं - अगर बच्चा है तो उसके खाने का इंतज़ाम करना होगा, गाड़ी की चाबी उठानी होगी, अपने आस पास के लोगों को ज़रूरी निर्देश देने होंगे..."

ओम पुरी का वो अंदाज़

और फिर वो अचानक अपने कमरे में अंदर चले गए, जैसे कोई कलाकार स्टेज पर आने से पहले विंग्स में चला गया हो.

दो पल बाद भीतर से ओमपुरी की कड़कती हुई आवाज़ आई: "देखो, ये गाड़ी उधर दूर लगा दो...मैं अभी लौटता हूँ." पर वहाँ न कोई गाड़ी थी और न उनकी बात सुनने वाला कोई इंसान.

कमरे में सन्नाटा था और उसमें मौजूद लोग दम साधे बैठे थे. ओमपुरी दरवाज़ा लाँघ कर दाख़िल हुए. उनका चेहरा बदला हुआ था. ये वो चेहरा नहीं था तो कुछ देर पहले हमारे बीच से उठकर गया. ये मैयत में शामिल होने आए एक व्यक्ति का चेहरा था - एकदम ग़मज़दा और संजीदा - मगर बिलकुल सामान्य. कहीं से 'एक्टिंग' का कोई निशान तक नहीं.

अभिनय की बारीकियों के जानकार बताते हैं कि अभिनेता के तौर पर अक्सर ओमपुरी और नसीरुद्दीन शाह की तुलना की जाती है. नसीर बहुत पायेदार कलाकार हैं, लेकिन उनका क्राफ़्ट या ट्रेनिंग उनकी बेहतरीन एक्टिंग में झलक जाती है जबकि ओमपुरी जब एक्टिंग करते हैं तो वो अपने क्राफ़्ट को छिपा ले जाते हैं और उनकी एक्टिंग कहीं से भी एक्टिंग लगती ही नहीं है.

ओमपुरी ने गहरी साँस ली, हाथ आगे बाँध लिए और मौन खड़े रहे जैसे सामने पड़ी अर्थी को एकटक देख रहे हों. उस कमरे में कुछ नहीं बदला था - मेज़, कुर्सी, सोफ़े सब अपनी जगह पर थे और एक कलाकार अपनी एक्टिंग के बल पर एक काल्पनिक मैयत हमारे ज़ेहनों पर उकेर रहा था. पर ऐसा क्यों लग रहा था कि वहाँ अंतिम संस्कार का इंतज़ार कर रहा कोई शव वाक़ई पड़ा हो?

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सिलीगुड़ी में उनसे हुई इस मुलाक़ात के ठीक 53 दिन बाद यानी 6 जनवरी को मुंबई के उनके फ़्लैट में ख़ुद ओमपुरी का शव अंतिम संस्कार का इंतज़ार कर रहा था. पंजाब के एक ग़रीब परिवार से निकल कर अंतरराष्ट्रीय सिनेमा का एक जाना पहचाना चेहरा बन जाने वाले ओमपुरी जीवन के आख़िरी मरहले पर बिलकुल अकेले पड़ चुके थे.

बचपन की यादों का बार-बार लौटना

शराब के ज़रिए उन्होंने अपने अकेलेपन को दूर करने की कोशिश ज़रूर की पर वो कामयाब नहीं हुए और जनवरी की एक रात अपने अकेलेपन में ही दुनिया छोड़ गए.

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इस अकेलेपन में वो बार बार बीते हुए दिनों को याद करने लगे थे. उनकी यादों में उनकी माँ बार बार आती थीं. उनका बचपन लौट लौट कर आ जाता था. उन्होंने मुझे उन दिनों के बारे में बताया जब उन्हें चेचक निकल आई.

उन्होंने लगभग भरे गले से बताया, "मैं छोटा बच्चा था और घर के आँगन में चारपाई पर पड़ा रहता था. मेरी माँ मेरे दोनों हाथ कपड़े से बाँध देती थीं क्योंकि उन्हें घर का काम करना होता था और मैं चेचक के दानों को खुजाता था. वो पड़ोस से कटोरी में आटा माँग कर लाती थीं और तब खाना बनता था."

ऐसी ही स्मृति की एक कौंध ओमपुरी का पीछा मरते दम तक करती रही. वो चार पाँच साल के रहे होंगे और अपनी माँ के साथ रेलगाड़ी में सफ़र कर रहे थे.

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सिगरेट का गहरा कश लेते हुए उन्होंने बताया,"मुझे याद है मेरी माँ चुपचाप रो रही थी. पास ही में बैठे एक बुज़ुर्ग ने पूछा क्यों रो रही हो. मेरी माँ ने कहा मेरे पास इस बच्चे को खाना खिलाने के लिए पैसे नहीं हैं. उस बुज़ुर्ग ने उठकर अपना कुरते की झोली बनाकर मुसाफ़िरों के सामने फैला दी और सबने उसमें कुछ पैसे डाले तब मेरी माँ ने मुझे खाना खिलाया." ये कहते कहते ओमपुरी का गला भर आया और वो रोने लगे.

ओमपुरी को हमेश अफ़सोस रहा कि उनकी माँ उनकी सफलता को देखने के लिए ज़िंदा नहीं रह पाईं.

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शायद जनवरी या दिसंबर की ही एक दोपहर थी जब मैं कई साल पहले ओमपुरी से दिल्ली के एक सरकारी फ़्लैट में मिला था. मुझे पता चला कि ओमपुरी और उनकी पहली पत्नी सीमा पुरी मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी आलोक तोमर के घर पर टिके हुए हैं.

बेमिसाल कलाकार का जुलूस में आना

मैं उन्हें पत्रकारों के एक आंदोलन में शामिल होने का निमंत्रण देना चाहता था. तब तक 'आक्रोश' और 'अर्द्धसत्य' जैसी फ़िल्में देकर ओमपुरी एक अभिनेता के तौर पर स्थापित हो चुके थे. तब उनकी पहली पत्नी सीमा पुरी के साथ उनकी कोर्टशिप चल रही थी. कुछ देर इंतज़ार करने के बाद चेचक के दाग़ों भरा वो जाना पहचाना चेहरा मेरे सामने था.

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जब बीबीसी से कई मुद्दों पर खुलकर बोले ओमपुरी

दो कमरे वाले एक सरकारी फ़्लैट में ओमपुरी जैसे स्टार का होना ही मुझे अचंभित किए दे रहा था. मैंने उन्हें पत्रकारों की हड़ताल की वजह बताई और गुज़ारिश की कि अगली सुबह पत्रकारों के जुलूस में उनकी मौजूदगी से हमें काफ़ी संबल मिलेगा. मैं बिना किसी उम्मीद के गया था और बिना उम्मीद लगाए ही लौट आया.

मगर दूसरे दिन मैंने देखा कि पत्रकारों के जुलूस में एक आम आदमी की हैसियत से ओमपुरी भी पैदल ही शामिल थे. वो अपनी स्टारडम उसी सरकारी फ़्लैट में छोड़ आए थे और एक सामान्य आदमी की तरह पत्रकारों का समर्थन करने सुबह सुबह जुलूस में हिस्सा लेने पहुँच गए थे. न उनको उम्मीद रही होगी और न ही मैंने उनके पास जाकर उनका शुक्रिया अदा किया.

अब ओमपुरी की मृत्यु के बाद बार बार ये ख़याल ज़ेहन में आता है - आख़िर उन जैसा मशहूर शख़्स किसी अजनबी से तुरंत इतना बेतकल्लुफ़ कैसे हो सकता है कि अपने 'इमोशन्स' को 'मैनेज' करने की उसे ज़रूरत ही महसूस न हो?

अपने निहायत ही निजी बातें बेबाकी से बताने में उसे कोई गुरेज़ न हो. बात करते करते जब किसी बात पर भावनाएँ भर आएँ तो अपने आँसुओं को रोकने की कोशिश न करना, किसी बहस तलब मुद्दे पर बेखटके चिल्लाते हुए अपनी बात कहना या अगर बातचीत की गरमी में दूसरा आदमी ऊँची आवाज़ में अपनी बात कह रहा हो तो सिगरेट के कश लगाते हुए उसकी बात तल्लीन होकर सुनना.

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अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रोशनी में बने रहने के बावजूद वाला ख़ुद को नहीं बल्कि दूसरों को ज़्यादा महत्वपूर्ण बताना और जताना या बिना किसी बनावटीपन के उनकी तारीफ़ों के पुल बाँध देना.

'अपनी कहानी ख़ुद कहने की चाहत'

ओमपुरी के व्यक्तित्व का ये सादापन शायद उनकी अभिनय प्रतिभा से बड़ी क्वालिटी थी. लेकिन इसी ख़ासियत का फ़ायदा उठाकर कई बार उनके क़द को छोटा करने की कोशिश भी की गई. ख़ास तौर पर उनकी दूसरी पत्नी नंदिता पुरी की किताब 'अनलाइकली हीरो: ओमपुरी' ने उन्हें बहुत परेशान कर दिया था.

वो कहते थे कि उनकी पत्नी ने उनकी बीती ज़िंदगी और किशोर उम्र की अंतरंग घटनाओं का किताब में ज़िक्र करके उनका भरोसा तोड़ा है. फिर ओम और नंदिता बहुत दिनों तक साथ नहीं रह पाए. हालात यहाँ तक पहुँच गए कि दोनों के बीच सामान्य बातचीत भी दूभर हो गई.

ओमपुरी और मैं सिलीगुड़ी में थे जब उनके बेटे ईशान ने फ़ोन पर उन्हें याद दिलाया, "मम्मी को बर्थ डे विश कर देना, पापा". "अरे क्या बर्थ डे विश करूँ...वो तो फ़ोन ही काट दे रही है." ओमपुरी की आवाज़ में पीड़ा थी.

फिर उन्होंने मुझसे वो बात कही जो वो कई बार दूसरे लोगों से भी कह चुके थे - "अब मैं अपनी कहानी ख़ुद कहना चाहता हूँ. उस किताब (अनलाइकली हीरो: ओमपुरी) में तो...." वो कई वाक्यों को अधूरा ही छोड़ देते थे. बाद के दिनों में उनसे मेरी कई बार फ़ोन पर लंबी लंबी बातें हुईं - कभी वो ट्रेन में सफ़र कर रहे होते तो कभी शूटिंग से लौटकर घर पर आराम कर रहे होते लेकिन अगर फ़ोन न उठा पाएँ तो वापिस फ़ोन ज़रूर करते थे.

वो वादा जो पूरा ना हुआ

मौत से छह दिन पहले 30 दिसंबर की शाम मैंने उन्हें फ़ोन किया. वो लगभग आधे घंटे तक मुझसे बात करते रहे. "मैं अब चाहता हूँ कि कम से कम एक महीने बंबई से और काम से दूर रहूँ. मैं रानीखेत जाकर वहाँ किसी एकांत जगह में रहना चाहता हूँ."

ये बात वो मुझसे सिलिगुड़ी में भी कह चुके थे. मैंने उन्हें सुझाया था कि उन्हें कुमाऊँ के अल्मोड़ा के पास बिनसर जाना चाहिए जहाँ उन्हें एकांत मिलेगा और कुछ सुकून भी. फ़ोन पर उन्होंने कहा, "मैं अपना फ़ोन बंद कर दूँगा और अपने परिचितों से कह दूँगा कि ये मत समझ लेना कि मैं मर गया हूँ. मरूँगा तो उनको ख़बर मिल ही जाएगी."

ओमपुरी सबसे वायदा कर दिया करते थे. उन्होंने ख़ुद से कई बार वायदा किया था कि वो अपनी सेहत का ध्यान रखेंगे. पर उन्हें मालूम था कि वो ऐसे किसी वायदे को - यहाँ तक कि ख़ुद से किए गए वायदे को भी -- पूरा नहीं कर पाएँगे.

शायद वो एक ऐसी कैफ़ियत तक पहुँच चुके थे जिसका ज़िक्र मिर्ज़ा असदउल्लाह ख़ाँ ग़ालिब ने लगभग डेढ़ सौ साल पहले अपने इन अशआर में किया था:

रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो, हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो

बे-दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए, कोई हम-साया न हो और पासबाँ कोई न हो

पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार, और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वाँ कोई न हो.

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