जवानों ने सोशल मीडिया को क्यों बनाया हथियार?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

जम्मू कश्मीर में तैनात सीमा सुरक्षा बल के जवान तेज बहादुर यादव ने फ़ेसबुक पर वीडियो क्या डाला, बवाल मच गया. फ़ौजियों को मिलने वाले खाने की गुणवत्ता को लेकर चर्चा ने ज़ोर पकड़ लिया.

देश ने इस पर ठीक से प्रतिक्रिया भी नहीं दी थी कि एक और ऐसा वीडियो आ गया. सीआरपीएफ़ में कार्यरत कॉन्सटेबल जीत सिंह ने फ़ेसबुक और यूट्यूब पर वीडियो डाला, जिसमें सुविधाओं की कमी और सेना-अर्धसैनिक बलों के बीच भेदभाव की बात कही गई थी.

जब लग रहा था कि मुद्दों की तरफ़ ध्यान खींचने के लिए दो वीडियो काफ़ी साबित होंगे, तभी सोशल मीडिया पर तीसरा वीडियो वायरल हो गया. भारतीय सेना के जवान लांस नायक यज्ञ प्रताप सिंह ने आरोप लगाया कि अधिकारी, जवानों का शोषण करते हैं.

भारतीय जवान के वीडियो की पाकिस्तान में ख़िल्ली उड़ी!

जवानों को जले परांठे, गृह मंत्री ने मांगी रिपोर्ट

तीनों वीडियो में दो बातें एक जैसी थीं. सभी में जवान शिकायत कर रहे थे और इन सैनिकों ने अपनी शिकायत कुछ ख़ास अफ़सरों, नौकरशाहों या नेताओं तक ना पहुंचाकर आम जनता तक पहुंचाईं. तीनों ने इसके लिए मौजूदा दौर के सबसे असरदार हथियार का इस्तेमाल किया - सोशल मीडिया.

जवानों को इसके दो फ़ायदे हुए. किसी ख़ास अख़बार या चैनल में गुहार लगाने के बजाय उनकी कहानी कहीं ज़्यादा लोगों तक पहुंच गई. और जवानों को ये उम्मीद भी रही होगी कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल शिकायत करने के बाद भी उनके लिए ढाल की तरह काम करेगा.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव का वह वीडियो

अब तक हुआ भी यही है. सरकार और सेना के आलाकमान ने शिकायत तंत्र को दुरुस्त बनाने के आदेश दे दिए हैं. लेकिन क्या वाक़ई सोशल मीडिया इतना ताक़तवर हो गया है? इसका जवाब इंटरनेट की ताक़त का प्रसार करने वाली संस्था डिजिटल एम्पावरमेंट फ़ाउंडेशन के फ़ाउंडर-डायरेक्टर ओसामा मंज़र ने दिया.

मंज़र ने बीबीसी से कहा, ''सोशल मीडिया शुरू से पावरफ़ुल था. चूंकि ग़ैर-विवादित बातें ज़्यादा होती हैं, ऐसे में हम उसकी ताक़त का सही आकलन नहीं कर पाते. लेकिन जब लोग उसे शिकायत या विवादित मुद्दों पर चर्चा के लिए टूल के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, तो अंदाज़ा होता है कि वो कितना मज़बूत है.''

ये मामला जवानों से जुड़ा था, इसलिए सोशल मीडिया ने प्रतिक्रिया देने में ज़रा वक़्त नहीं लगाया. मंज़र के मुताबिक, ''जब ये टूल ऐसे समुदाय ने इस्तेमाल किया, जिसे देश में काफ़ी सम्मान की नज़र से देखा जाता है, तो असर और बढ़ गया. दिल भी दुखा कि वो तकलीफ़ में क्यों हैं, जबकि देश उनके लिए टैक्स देता है. फिर भी उन्हें वो दर्जा नहीं मिल रहा, खाना नहीं मिल रहा. ये बहुत बड़ा मुद्दा है.''

इमेज कॉपीरइट Getty Images

लेकिन यहीं एक पेंच भी हैं. देश की सुरक्षा जैसे संवेदनशील मामलों से जुड़े रहने के कारण जवानों के लिए अनुशासन से जुड़े सख़्त नियम होते हैं और शिकायत करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कहीं ना कहीं इन क़ायदों का उल्लंघन है.

सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह का कहना है कि अगर ये चलन जारी रहा, तो मुश्किल हो जाएगी. उन्होंने कहा, ''सवाल ये है कि शिकायत करने के जो ज़रिए मौजूद हैं, वो इस्तेमाल किए गए या नहीं. या जवानों ने सोचा कि कोई सुनता नहीं, तो चलो सोशल मीडिया पर डाल दो.''

सिंह ने कहा, ''इतनी बड़ी फ़ौज में अगर हज़ारों जवान सोशल मीडिया में चीज़ें डालने लगें, तो अनुशासन बनाए रखना बड़ा मुश्किल हो जाएगा. हुक्म दिया जाए कि आप ख़तरों का सामना करें. फिर वो कहेंगे कि हमसे ड्यूटी ले रहे हैं, इसमें हमारी जान का ख़तरा है. सोशल मीडिया पर डाल देंगे, तब क्या होगा?''

स्मार्टफ़ोन ने भी सोशल मीडिया को आसान पहुंच में ला दिया है और सैन्य, पुलिस प्रशासन के लिए ये मुश्किल बनता जा रहा है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने कहा है कि जवान सीधे उनसे शिकायत कर सकते हैं.

सिंह ने कहा, ''मोबाइल से काम करने से एक नई परेशानी आ रही है. फ़र्ज़ कीजिए कि कोई जवान छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी ऑपरेशन का हिस्सा है और मोबाइल से ख़बर मिलती है कि घर में कोई परेशानी है, तो ऐसे में कार्यक्षमता पर असर तो पड़ता है. मोबाइल अगर काम की चीज़ है, तो दिक्कत भी है.''

लेकिन मंज़र इन दलीलों से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. उनका कहना है, ''कोई भी बात जब नकारात्मक होगी, तो हम नियमों और उसूलों की बात करने लगते हैं. उसूल तो ये भी है कि उन्हें खाना मिलना चाहिए था, फिर क्यों नहीं मिल रहा था. जब उनकी फिक्र नहीं कर रहे हैं, तभी तो शिकायत की जा रही है.''

क्या ये चलन आगे भी जारी रह सकता है, उन्होंने कहा, ''सोशल मीडिया भी एक तरह से क्राउड सोर्सिंग है. आप ओपिनियन को क्राउडसोर्स करते हैं. लोगों से समाधान मांगते हैं. ऐसे में अगर चीज़ें ठीक नहीं होंगी, तो लोग इनका बखूबी इस्तेमाल करेंगे.''

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अगर वाक़ई जवानों के पास शिकायत करने का पुख़्ता तंत्र है, तो वो सोशल मीडिया का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं? इसका जवाब 30 साल सेना में गुज़ारने वाले सूबेदार मेजर नेत्रपाल शर्मा ने दिया.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''इन वीडियो को देखकर दुख है तो खुशी भी है कि ये चीज़ें बाहर आ रही हैं. सेना में रहते हुए आप बहुत सी बातें नहीं कह पाते. कहने को कई मंच बने हुए हैं. लेकिन उनका दुरुपयोग होता है.''

नेत्रपाल शर्मा ने एक दिलचस्प वाक़या बताया, जब उन्होंने अपने अफ़सर को शिकायत भेजने के लिए नायाब तरीका निकाला था. तैनाती के वक़्त उन्होंने कुछ दिक्कत होने पर ख़ुद चिट्ठी ना लिखकर एक बच्चे से पत्र लिखवाया, ताकि हाथ की लिखाई से ये ना पता चले कि शिकायत उन्होंने की है.

जानकारों का मानना है कि जब तक जवानों को शिकायत करने में डर लगता रहेगा, अपनी आवाज़ बाहर तक पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल इसी तरह जारी रहेगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे