नज़रिया: 'प्रतिभाओं का गला घोंटने का गंदा खेल'

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हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे दलित छात्र रोहित वेमुला ने 17 जनवरी 2016 को आत्महत्या कर ली थी.

इस मौक़े पर बीबीसी हिंदी की ख़ास पेशकश में पढ़िए पहली कड़ी.

भारतीय विश्वविद्यालयों में प्रतिभाशाली छात्रों को आगे नहीं बढ़ने देने के लिए शिक्षकों द्वारा प्रतिभाओं को दबाने का चलन पुराना है, किसी सांस्कृतिक विरासत की तरह.

ये विरासत द्रोणाचार्य के ज़माने से चली आ रही है, माना जाता है कि उन्होंने अपने छात्र एकलव्य का अंगूठा मांग लिया था, इसकी वजह ये थी कि एकलव्य अपने ब्राह्मण गुरू द्रोणाचार्य से कहीं बेहतर धनुर्धर थे. वह भी तब जब उन्होंने वह विद्या ख़ुद से सीखी थी.

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अब ये चलन केवल ब्राह्मण गुरुओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ये ग़ैर-ब्राह्मण शिक्षकों तक पहुंच चुका है.

अपने से प्रतिभाशाली छात्रों की प्रतिभाओं का गला किस तरह से घोंट दिया जाता है, इसका उदाहरण आप हैदराबाद यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर पोडिल अप्पा राव में देख सकते हैं, जिन्होंने अपने छात्र रोहित वेमुला (एक प्रतिभाशाली विज्ञान छात्र) को बीते साल 17 जनवरी, 2016 को कथित तौर पर आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर दिया.

लेकिन तिरूपति में आयोजित साइंस कांग्रेस में तीन जनवरी, 2017 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें सम्मानित किया है. कह सकते हैं कि अपनी ही प्रतिभाओं का गला घोंटने का खेल अब इतना ख़राब हो चुका है.

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आत्महत्या से पहले रोहित वेमुला के लिखे अंतिम ख़त को पढ़कर देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में लोग हैरान रह गए थे. रोहित वेमुला ने ख़त में लिखा था कि वे कार्ल सगान की तरह विज्ञान लेखक बनना चाहते थे, लेकिन वे अपने ही हाथों से उस सपने को सीमित कर रहे हैं. ये उदाहरण कुछ वैसा ही जैसा सोक़रात का अपने हाथों ज़हर पी लेना था, ताकि यूनानी समाज की मान्यताएं क़ायम रहें.

देश ने रोहित के साहस और अंतिम ख़त में दिखाए दृढ़ विश्वास का सम्मान किया जिसके ज़रिए उन्होंने हमारे विश्वविद्यालयों में मौजूद जातिगत ढांचे की नैतिकता पर सवाल उठाया था.

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रोहित की मौत संसद के अंदर मुद्दा बनी, विश्वविद्यालयों से लेकर देशभर की गलियों में इसकी चर्चा हुई.

इन सबके बावजूद प्रधानमंत्री, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, आंध्र प्रदेश का ही प्रतिनिधित्व करने वाले और अप्पा राव के समुदाय खम्मा से ही ताल्लुक़ रखने वाले केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने वाइस चांसलर को सम्मानित करने का फ़ैसला लिया.

उन्होंने ऐसा तब किया जब अप्पा राव के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला लंबित है. सत्तारूढ़ लोगों ने रोहित और अप्पाराव के मामले में मानवीय पहलुओं का तनिक भी ध्यान नहीं रखा. इन लोगों ने रोहित के जन्म प्रमाणपत्र को मुद्दा बनाया है. रोहित की मौत के बाद उनकी मां की जाति को मुद्दा बनाया.

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Image caption हैदराबाद यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर अप्पा राव

रोहित वेमुला का उदाहरण नैतिकता के तक़ाज़े का उदाहरण है जबकि वहीं पर अप्पाराव अनैतिकता का उदाहरण हैं. ज्ञान और विज्ञान के दायरे में अगर नैतिकता का क़त्ल हो जाए और अनैतिकता को सम्मानित किया जाए तो देश भले ही बाहर से कितना ही कामयाब क्यों नहीं दिखे, अंदर से वह खोखला होने लगता है.

प्रधानमंत्री और चंद्रबाबू नायडू ये जानते थे कि बीते एक साल के दौरान रोहित वेमुला और अप्पाराव मामले में नैतिकता को लेकर चर्चा हो रही है. अगर चंद्रबाबू नायडू और वेंकैया नायडू ने ये तय कर भी लिया था कि वे इस वैज्ञानिक को सम्मानित करना चाहते थे तो प्रधानमंत्री ने अपने हाथों से उन्हें सम्मानित करने पर सहमति कैसे दी?

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ये वही प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने सात अगस्त, 2016 को हैदराबाद की एक रैली में कहा था कि अगर गोली मारनी हो तो मुझे मारो, मेरे दलित भाइयों को नहीं.

लेकिन उन्होंने 'गोली मारने वाले को' सार्वजनिक तौर पर सम्मानित किया. पर रोहित वेमुला देश के मानस पटल पर लंबे समय तक मौजूद रहने वाली छाप छोड़ गए हैं.

Image caption रोहित वेमुला की मां और उनके भाई

ये देश जातियों का है. ब्राह्मणवादी शक्तियों ने बेशर्मी से छुआछूत के चलन को जारी रखा और पीढ़ी दर पीढ़ी ये उपदेश भी देते रहे कि इसे इसी तरह जारी रहना चाहिए.

जब आधुनिक विश्वविद्यालय बन गए तब भी अमानवीय जातिगत प्रथाएं हमारे क्लास रूम और कैंपस का हिस्सा बन गईं. स्वतंत्रता के बाद डॉ. अंबेडकर की निजी गाइडेंस और उनके प्रभाव में दलितों ने हर जगह होने वाले जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ संघर्ष छेड़ा. लेकिन वह लड़ाई निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंच पाई है.

भारत के कई हिस्सों, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और उत्तर पूर्व के राज्यों में इस्लाम और ईसाई धर्म ने प्रवेश कर लिया लेकिन भारत के मैदानी हिस्से में जातिगत व्यवस्था बनी हुई है.

पिछली कुछ शताब्दी में बड़ी संख्या में लोगों ने क्रूर जाति व्यवस्था के चलते ही इस्लाम और ईसाई धर्म को अपनाया है. इसके बावजूद ब्राह्मणवादी ताक़तों पर कोई असर नहीं हुआ है.

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यही वजह है कि जातिगत व्यवस्थाएं ना केवल मंदिरों में हैं, बल्कि वह समाज और बाज़ार के साथ-साथ यूनिवर्सिटी कैंपसों में मौजूद हैं. मुस्लिम और ईसाई समाज का बौद्धिक तबक़ा इसके ख़िलाफ़ अभियान नहीं चलाता बल्कि वह अपने अपने ख़ोल में सिमट जाता है.

केवल महात्मा फूले, अंबेडकर और पेरियार जैसों कुछ एक लोगों ने अंग्रेज़ों के शासन के दौरान इस चलन का विरोध किया. अब एक युवा ने भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में मौजूद जातिवादी नज़रिए की पोल खोलने की इच्छा के साथ आत्महत्या कर ली.

इस घटना के बाद कई लोगों में उम्मीद जगी है कि शायद भारत एक बार फिर से क्रूर जाति व्यवस्था और छुआछूत के चलन के उन्मूलन के लिए प्रतिबद्ध हो. मैं जानता हूं कि देश के यूनिवर्सिटी के ब्राह्मणवादी बौद्धिक ये ज़ाहिर करते हैं कि कैंपसों में जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता है.

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ऐसे में दलित बहुजन और अल्पसंख्यक समुदाय के बौद्धिकों को रोज़ाना के स्तर पर इसके ख़िलाफ़ संघर्ष करना चाहिए. रोहित के प्रेरणा से भरे शब्द हमारे कानों में रोज़ाना गूंजते रहें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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