भारतीय 'अपराधी' नेताओं के लिए क्यों वोट डालते हैं ?

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भारतीय राजनीतिक पार्टियां ऐसे उम्मीदवार क्यों उतारती हैं जिन पर आपराधिक मुक़दमे होते हैं? उनके दाग़दार इतिहास के बावजूद मतदाता उन्हें क्यों वोट देते हैं?

राजनीतिशास्त्र के जानकार मिलन वैष्णव भारत में अपराध और लोकतंत्र के संबंधों पर पिछले काफी सालों से अध्ययन कर रहे हैं. उनकी आनेवाली किताब 'व्हेन क्राइम पेज़' से कुछ पेचीदा मुद्दों के जवाब मिलते हैं जो भारतीय चुनावी लोकतंत्र का परेशान करनेवाला पहलू है.

अच्छी ख़बर ये है कि आम चुनाव एक फलता-फूलता, विशाल और कड़ी मेहनत वाला काम है. 2014 में हुए चुनाव में 55 करोड़ 40 लाख मतदाता अपना वोट डालने के लिए नौ लाख केंद्रों में कतार में लगे. 464 राजनीतिक दलों के 8,250 उम्मीदवारों की क़िस्मत दांव पर लगी.

बुरी ख़बर ये है कि चुने गए 543 सांसदों में से एक तिहाई यानी 34 फ़ीसदी के ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमे थे. जहां 2004 में ये आंकड़ा 24 फ़ीसदी था, 2009 में ये बढ़ कर 30 फ़ीसदी हो गया था.

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भीषण प्रतिस्पर्धा

नेताओं पर लगे कुछ आरोप मामूली या राजनीति से प्रेरित थे. लेकिन 20 फ़ीसदी से ज़्यादा नए सासंदों के ख़िलाफ़ हत्या की कोशिश, सरकारी अधिकारियों पर हमला, और चोरी जैसे गंभीर आरोप थे.

अब, भारत के आम चुनाव वास्तव में आसान नहीं रह गए.

समय के साथ इनमें प्रतिस्पर्धा भीषण रूप से बढ़ गई है. 2014 में 464 दल चुनावी मैदान में थे. जबकि 1952 में हुए पहले चुनाव में 55 दलों के बीच मुक़ाबला था.

2009 में जीत का औसत अंतर 9.7 फ़ीसदी था, जो पहले चुनाव की तुलना में सबसे कम था. 2014 के चुनाव में 15 फ़ीसदी के साथ भारी बहुमत की जीत का औसत अंतर कुछ ज़्यादा था, लेकिन यह भी बहुत छोटा था. जैसे 2012 के अमरीकी संसद चुनावों में जीत का औसत अंतर 32 फ़ीसदी और 2010 में ब्रिटेन के आम चुनावों में ये आंकड़ा 18 फ़ीसदी था.

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भारत में सत्तारूढ़ बीजेपी और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस समेत लगभग सभी दल दाग़ी उम्मीदवारों को मैदान में उतारते हैं. वे ऐसा क्यों करते हैं?

डॉ. वैष्णव इसका कारण बताते हैं कि, "एक मुख्य वजह जो गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीवदारों का चयन करने के लिए पार्टियों को प्रेरित करता है वह है विशुद्ध नगद."

चुनावों की बढ़ती लागत और इसमें पैसों की संदिग्ध व्यवस्था होती है जहां पार्टियां और उम्मीदावार अपने चंदे और ख़र्चों को कम करके दिखाते हैं. इसका मतलब है कि पार्टियां "स्व-वित्तपोषित उम्मीदवारों में दिलचस्पी दिखाती हैं जो पार्टी के सीमित खज़ाने से धन लुटाने की बजाए उल्टा पार्टी को ही 'किराया' देने में योगदान करते हैं. इनमें से कई उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड हैं.

तीन स्तर में बंटे भारत के लोकतंत्र में 30 लाख राजनीतिक पद हैं. हर चुनाव में काफी संसाधनों की ज़रूरत पड़ती है. कई पार्टियां निजी मिल्कियत की तरह हैं जिसे प्रभावी हस्तियां या ख़ानदान चला रहे हैं और जिनमें आंतरिक-लोकतंत्र की कमी है. ये परिस्थितियां "मोटी जेब वाले अवसरवादी उम्मीदवारों" की मदद करती हैं.

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'अच्छी प्रोक्सी'

डॉ. वैष्णव अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए कार्नेगी एंडोमेंट में वरिष्ठ फेलो हैं. वे बताते हैं, "अमीर, स्व-वित्तपोषित उम्मीदवार पार्टियों को लुभाते ही नहीं हैं, बल्कि इसकी भी संभावना होती है कि वे चुनावी प्रतिस्पर्धा में ज़्यादा मज़बूत हों. दुनिया के ज़्यादातर जगहों में चुनाव लड़ना एक ख़र्चीला काम है. किसी उम्मीदवार की संपत्ति उनके चुनावी जीत को ज़्यादा सुनिश्चित करती है."

राजनीतिक पार्टियां आपराधिक पृष्ठभूमि के प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने के लिए इसलिए नामांकित करती हैं क्योंकि वे जीतते हैं.

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डॉ. वैष्णव ने अपने शोध के दौरान पिछले तीन आम चुनावों में खड़े हुए सभी उम्मीदवारों का अध्ययन किया. उन्होंने उन सब को साफ़-सुथरे रिकॉर्ड और आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रत्याशियों में बांटा. उन्होंने पाया कि आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रत्याशियों की अगला चुनाव जीतने की उम्मीद 18 फ़ीसदी है वहीं "साफ-सुधरे" प्रत्याशियों की चुनाव जीतने की उम्मीद सिर्फ़ 6 फ़ीसदी है.

उन्होंने 2003 से 2009 के बीच विधानसभा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की इसी तरह की एक गणना की थी, जिसके अनुसार "जिन उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ केस लंबित हैं उन्हें जीत का ज़्यादा फ़ायदा मिला".

राजनीति भी एक आकर्षक करियर मुहैया कराती है. 2013 के एक अध्ययन से पता चलता है कि वर्तमान विधायक की औसत संपत्ति सिर्फ़ एक कार्यकाल के दौरान 222 फ़ीसदी बढ़ी. दोबारा चुनाव लड़ रहे विजेता और हार गए उम्मीदवारों की आधिकारिक तौर पर घोषित औसत संपत्ति 2004 में एक करोड़ 80 लाख रुपये थी और 2013 में 42 करोड़ एक लाख रुपये थी, जो 134 फ़ीसदी बढ़ी थी.

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'सबसे बड़ा अपराधी'

अब सवाल ये है भारतीय अपराधी उम्मीवदारों को क्यों वोट देते हैं? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि बहुत से मतदाता अनपढ़ या अज्ञानी हैं या फिर उन्हें जानकारी का अभाव है? डॉ. वैष्णव ऐसा नहीं मानते.

आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशी अपनी साख को छुपाते नहीं हैं. इससे पहले इसी महीने में उत्तर प्रदेश के उत्तरी हिस्से में सत्तारूढ़ पार्टी के एक उम्मीदवार ने पार्टी के एक कार्यकर्ता से कथित तौर पर डींग मारते हुए कहा था कि वे "सबसे बड़े अपराधी" हैं. मीडिया के ज़रिये बढ़ती जानकारी और जागरूकता के बावजूद दाग़ी उम्मीदवारों की संख्या कम नहीं हुई है.

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Image caption पप्पू यादव की छवि भी दबंग नेता की ही है.

डॉ. वैष्णव मानते हैं कि अच्छे ख़ासे जानकार मतदाता अपराधी उम्मीदवारों का समर्थन करते हैं, उन निर्वाचन क्षेत्रों में जहां जाति या धर्म के नाम पर सामाजिक विभाजन गहरे हैं और सरकार अपने कार्यों को बिना भेदभाव के पूरा करने में असफल है, जहां सरकार सेवाएं मुहैया करने, न्याय दिलाने या सुरक्षा देने में असफल है.

डॉ. वैष्णव कहते हैं, "ऐसी जगहों पर इसकी गुंजाइश रहती है कि अपराधी उम्मीदवार ख़ुद को रॉबिन हुड जैसी छवि वाला पेश करे."

ज़ाहिर तौर पर, अपराध और राजनीति आपस में ऐसे ही गुथे हुए रहेंगे जब तक भारत अपनी चुनावी वित्तपोषण प्रणाली को पारदर्शी नहीं बना देता, राजनीतिक पार्टियां ज़्यादा लोकतांत्रिक नहीं बन जातीं और सरकार पर्याप्त सेवाएं और न्याय मुहैया नहीं करतीं.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुझाव दिया है कि चुनावों के लिए सरकार पैसा मुहैया कराए जिससे प्रचार की वित्त व्यवस्था साफ-सुथरी बन सके. इससे पहले इसी महीने उन्होंने कहा था कि लोगों को ये जानने का हक़ है कि बीजेपी के पास पैसा कहां से आता है.

उनकी पार्टी बीजेपी ने पिछले चुनाव में जिन उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था, उनमें से करीब 14 फ़ीसदी उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप थे. (कांग्रेस के 10 फ़ीसदी से ज़्यादा उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ आरोप थे). लेकिन कोई भी पार्टी इस बारे में बात नहीं कर रही है.

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