वारिस की ज़िम्मेदारी अब उठा रहे हैं 'रसिक तिवारी'

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आख़िर कोई तो वजह होगी जो 90 साल पार के एक बीमार, चलने-फिरने में असमर्थ वयोवृद्ध नेता को एक राजनैतिक दल से निकलकर दूसरे दल के दरवाज़े पर जाना पड़ा.

91 साल के नारायण दत्त तिवारी के पास भी 'अभी नहीं तो कभी नहीं" जैसी एक बड़ी वजह थी. तभी तो अपने जर्जर शरीर और कांपते हाथों के साथ बुधवार को अपने बेटे के लिए बीजेपी का दामन थामने वो दिल्ली पहुंचे.

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बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के सामने एक तरह से 'पेश' होते ही गांधीवादी और कांग्रेसी राजनीति के ये सबसे बुज़ुर्ग खिलाड़ी भी उस विचारधारा के सदस्य हो गए जिसके विरोध के लिए वो जाने जाते रहे थे.

उनके साथ उनकी पत्नी उज्जवला तिवारी और बेटे रोहित शेखर भी थे.

भारतीय राजनीति का ये शायद सबसे विलक्षण और नाटकीय दल-बदल होगा. अब बीजेपी के पास उम्र के लिहाज़ से पार्टी के दूसरे नंबर के सबसे बूढ़े नेता आ गए हैं. पहले नंबर पर वाजपेयी हैं और तीसरे पर एलके आडवाणी हैं.

तिवारी जितना अपनी कई दशकों लंबी राजनीतिक और प्रशासकीय पारी के लिए मशहूर हैं उतने ही चर्चित वो अपने साथ जुड़े विवादों के लिए भी हैं. तिवारी की कथित स्वच्छंद व्यवहार शैली और रंगीन मिज़ाजी के क़िस्से राजनीतिक और मीडिया गलियारों में अक्सर सुनाए जाते रहे हैं.

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तिवारी ने 1991 में कांग्रेस छोड़कर अपनी पार्टी बनाई थी. इसमें वो सफल नहीं हुए और 1998 में उन्होंने वापिस कांग्रेस के कथित "महासागर" में अपनी नाव उतार दी.

उम्र के साथ अशक्त होते तिवारी को राजनीति में फिर से एक पारी खेलने का मौक़ा मिला साल 2002 में जब उत्तराखंड का पहला विधानसभा चुनाव जीतकर कांग्रेस ने स्थानीय पसंद को दरकिनार कर उन्हें देहरादून भेज दिया.

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तिवारी के लिए बुढ़ापे में उत्तराखंड की कुर्सी किसी सौगात से कम न थी. उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रहने के बाद और वहां नोएडा जैसे महानगरों के निर्माण में योगदान के बाद तिवारी विकास पुरुष की छवि हासिल कर चुके थे.

इसी छवि के सहारे उत्तराखंड में वो टिके रहे, लेकिन उनका पांच साल का कार्यकाल सबको खुश रखने के लिए ही सबसे ज़्यादा याद किया जाएगा. कहते हैं कि जो तिवारी जी के पास पहुंच जाए और कभी ज़ोर से या हल्के से भी कुछ मांग ले वो खाली हाथ नहीं लौटता था.

उस दौर में खूब लालबत्तियां बांटी गईं. तिवारी को किसी की नाराज़गी की भनक लगने भर की देर थी, वो पहुंच जाते उसके पास.

तिवारी मीडिया हलकों में भी लोकप्रिय हो गए. सीधे रिपोर्टर का हाथ पकड़ लेते या कंधे पर हाथ रख लेते. होली दिवाली आती तो उमंग में आ जाते. होली में गीत गाते झूमते और दिवाली में भी मौका मिलते ही ठुमकने लगते.

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तिवारी की यही 'ठुमक-ठुमक' अदा, शेरो शायरी, कुमाऊंनी लोकगीतों और देशभक्ति के गीतों की झड़ी और मौक़ा मिलने पर गांधी की याद और उस याद में भावुकता के आंसू, अचानक भर्रा जाने वाला गला...... ये सब चीज़ें तिवारी को एक पॉलिटिकल सेलेब्रिटी और एक आकर्षक इंसान बनाती हैं.

कई बार लोग असहज हो जाते, लेकिन तिवारी थे कि छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत की कविताओं की तरह सुकुमार भाव से थपकी दे आगे बढ़ जाते.

इसी दौरान उत्तराखंड के लोकप्रिय गायक गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी का वीडियो एल्बम "नौछमी नारैण" रिलीज़ हुआ जिसने धूम मचा दी.

कहा जाता है कि ये तिवारी और उनके कार्यकाल पर एक तीखी चुटकी थी. इस वीडियो के गीत में मुख्य किरदार को पीली पोशाक पहने, बंसी थामे, मोर मुकुट बांधे और कुछ रंगबिरंगी पोशाकें पहनीं महिला किरदारों के साथ नाचता गाता दिखाया गया है.

2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की विदाई हुई और बीजेपी का आगमन हुआ.

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'एनडी तिवारी सिर्फ़ मेरे बेटे के पिता हैं'

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तिवारी नई रमणीयताओं और नये भूगोलों की थाह लेने दिल्ली निकल चले. उन्हें आंध्रप्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया. लेकिन सेक्स स्कैंडल के आरोपों में घिर गए. तिवारी ने इसे राजनैतिक साज़िश बताते हुए ख़राब स्वास्थ्य का हवाला देकर 2009 में राज्यपाल पद से इस्तीफ़ा दे दिया और देहरादून लौट आए.

2008 में उनके ख़िलाफ़ एक अदालती मामला मीडिया की सुर्ख़ी बन गया. रोहित शेखर ने कहा कि तिवारी उनके जैविक पिता हैं.

तिवारी अपनी ढलती उम्र में भरसक मोहक अदाएं बनाते-बनाते पहले तो ना-नुकुर करते रहे लेकिन रोहित की लड़ाई तथ्यों पर आधारित और अकाट्य थी. डीएनए जांच से रक्त संबंध साबित हो गया. आखिरकार तिवारी को उन्हें अपना बेटा और उनकी मां उज्जवला को अपनी पत्नी का दर्जा देना ही पड़ा.

पिछले दो एक साल से तिवारी परिवार के साथ लखनऊ से नैनीताल आना-जाना करते रहे. एनडी तिवारी ने रोहित शेखर को राजनैतिक विरासत सौंपने का संकल्प लिया, रही दल की बात तो कांग्रेस नहीं तो बीजेपी सही.

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