उत्तर प्रदेश में 'बीजेपी सीएम' की घुड़दौड़

इमेज कॉपीरइट Reuters

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह बस्ती ज़िले में बूथ प्रभारियों की एक बैठक ले रहे थे.

जुलाई, 2016 की इस दोपहर, शाह के भाषण के बीच, कुछ कार्यकर्ताओं ने एकाएक खड़े होकर योगी आदित्यनाथ के नारे लगाने शुरू कर दिए.

'हमारा सीएम कैसा हो, आदित्यनाथ जैसा हो" के नारों से नाराज़ मंच पर मौजूद अमित शाह ने गुस्से में कहा, "भाषण जारी रखें या बंद कर दें?"

मोदी और शाह: ज़बानें दो, मक़सद एक

क्या यूपी में चल पाएगा मोदी का करिश्मा?

बाद में इसी भाषण में अमित शाह ने कहा कि गोरखनाथ मंदिर के प्रमुख पुजारी और गोरखपुर से सांसद "योगी आदित्यनाथ का नाम उत्तर प्रदेश में ऊर्जा प्रदान करता है".

इसी मंच पर प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य भी बैठे थे जो मुस्कुराने की 'भरपूर कोशिश' कर रहे थे.

इमेज कॉपीरइट www.yogiadityanath.in
Image caption योगी आदित्यनाथ

जहाँ ये क्षेत्रीय बूथ सम्मलेन जारी था उससे सिर्फ़ डेढ़ घंटे की दूरी पर भाजपा सांसद वरुण गाँधी का चुनाव क्षेत्र सुल्तानपुर है.

बस्ती की बैठक के महीने भर पहले इलाहाबाद में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान शहर के कई हिस्सों में 'वरुण गाँधी यानी भावी सीएम" के पोस्टर रातोंरात देखे गए थे.

आदित्यनाथ और स्मृति इरानी पर 'तनातनी'

योगी आदित्यनाथ पर मोदी की चुप्पी का मतलब

सुल्तानपुर से ही सटा हुआ है अमेठी जहाँ पर पिछले लोक सभा चुनावों में राहुल गाँधी से हारने के बावजूद केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के तूफानी दौरे होते रहे हैं.

ऐसे ही एक दौरे से लौटते समय हवाई जहाज़ में मैंने उनसे 'मुख्यमंत्री' पद के बारे में पूछा.

मुस्कराती हुई स्मृति का जवाब था, "दफ़्तर आओ, बात करते हैं. लेकिन सवाल मंत्रालय से जुड़े ही रखना".

इमेज कॉपीरइट Keshav Prasad Maurya FB
Image caption केशव प्रसाद मौर्य

पिछले साल में इन चारों नेताओं का नाम कभी न कभी मुख्यमंत्री पद के लिए 'उछला' है या 'उछलवाया' गया है.

लेकिन पार्टी नेतृत्व अभी तक किसी के लिए 'पसीजता' नहीं दिखा है.

हाल ही में एक पत्रकार ने अमित शाह से पूछा, "क्या भाजपा राजनाथ सिंह या योगी आदित्यनाथ को प्रदेश के सबसे बड़े पद के लिए प्रोजेक्ट करेगी?"

अमित शाह का जवाब पुराना सा था, "भाजपा के लिए कार्यकर्ता महवपूर्ण होते हैं और हमारे यहाँ आंतरिक लोकतंत्र आज भी ज़िंदा है".

यूपी चुनाव के निकट आते-आते भाजपा के तमाम कार्यकर्ताओं ने अपने चहेते लीडरों के नाम मुख्यमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाने शुरू कर दिए हैं.

लेकिन भाजपा को पिछले तीन दशक से कवर कर चुके पत्रकार राजीव बाजपेयी को लगता है 'दाल किसी की नहीं गलने वाली'.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption वरुण गांधी

उन्होंने कहा, "जातीय-सामाजिक समीकरणों को देखते हुए भाजपा के पास इतनी हिम्मत नहीं की किसी एक नाम की घोषणा करें. वे मोदी के नाम को पीछे रख किसी और का नाम भी नहीं बढ़ाना चाहते क्योंकि नेतृत्व को लगता है मोदी ही जिता सकते है."

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र नाथ भट को लगता है कि भाजपा अपने हाल के इतिहास को दोहराने की मंशा से ऐसा कर रही है.

मुझ पर लगे आरोप मनगढ़ंत हैं: वरुण गांधी

वरुण गांधी पार्टी लाइन से अलग क्यों चले?

उन्होंने कहा, "हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र के पिछले चुनावों में बिना सीएम कैंडिडेट के उतरने और सफल होने का फॉर्मूला भाजपा नेतृत्व के जेहन में लगता है. वैसे भी यूपी में पार्टी के पास विकल्पों का थोड़ा अभाव दिखता है."

इस बीच चार साल प्रदेश अध्यक्ष रह चुके लक्ष्मीकांत बाजपेयी इस बात से इनकार करते नहीं थकते कि यूपी में एक बड़े स्थानीय चेहरे का संकट है.

उनके अनुसार, "जिनके पास नेतृत्व है वो क्या संकट में नहीं हैं. अखिलेश के यहां आपस में लड़ाई हो रही है. शीला दीक्षित के नाम की घोषणा के बाद उन्हें मंझधार में छोड़ दिया गया है और मायावती के पास कुछ नया नहीं है. हमारे पास 1000 से ज़्यादा कार्यकर्ता हैं जिनमें से नेतृत्व जिसे कहेगा वो मुख्यमंत्री बन जाएगा."

इमेज कॉपीरइट EPA
Image caption राजनाथ सिंह

हालांकि भारतीय जनता पार्टी के कुछ वरिष्ठ लोग इस बात से इनकार भी नहीं करते कि पार्टी ने चुनाव की घोषणा से पूरे एक वर्ष पहले टिकट वितरण के साथ इस बात पर गौर किया था कि क्या किसी को बतौर सीएम आगे लाया जा सकता है.

इनके मुताबिक़, "पार्टी ने टिकट बांटने के पहले सात आतंरिक सर्वे करवाए जिनमें से तीन की रिपोर्ट सीधे अमित शाह के पास भेजी गई. इसके बाद संघ की सूची, संगठन की सूची और जिलाध्यक्षों की लिस्ट मांगी गई."

स्मृति ईरानी होंगी यूपी में बीजेपी का चेहरा?

स्मृति को 'सज़ा' की बात क्यों सही नहीं लगती?

इन जानकारों के अनुसार इस लिस्ट के ज़रिए इस बात को पूरी तरह भांप भी लिया गया कि असल में कोई एक ऐसा बड़ा नाम है ही नहीं.

पार्टी के कुछ लोगों के अनुसार ऐसे ही तमाम सर्वेक्षणों के ज़रिए ये भी भांप लिया गया था कि दूसरे दलों के किन नेताओं को अपने खेमे में लाया जा सकता है.

इस रणनीति में अमित शाह के लिए तीन खास लोग काम कर रहे थे जिसमें ओम माथुर, सुनील बंसल और कृष्ण गोपाल थे जिन्हें प्रदेश के चुनाव प्रभारी पहले ही बना दिया गया था.

जानकार बताते हैं कि ओम माथुर ने शुरुआत से ही किसी सीएम कैंडिडेट को प्रोजेक्ट न करने की राय दी और फिर सबने कहा "मोदी ही हमारे फेस रहें तो बेहतर है."

लेकिन अब जब चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं पार्टी में इस बात को लेकर थोड़ी चिंता भी बढ़ रही है कि कुछ क्षेत्रीय नेता और सीएम के दावेदारों के समर्थक कहीं खेल न बिगाड़ने में लग जाएं.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption स्मृति ईरानी

टिकट बंटवारे को लेकर कार्यकर्ताओं में नाराज़गी पहली सूची के बाद ही सामने आ चुकी थी जिसके चलते आगे की लिस्टों में देर की गई.

कुछ कार्यकर्ताओं में नाराज़गी इस बात पर भी दिखी कि वितरण में नेतृत्व ने दूसरे दलों से आए नेताओं को निराश नहीं किया है.

इस सब के बीच अगर अपने-अपने नेताओं को सीएम न प्रोजेक्ट किए जाने का रोष बाहर आता गया तो पार्टी को नुकसान पहुँच सकता है.

लेकिन जनता के समक्ष पार्टी अभी भी एकजुटता के दम भर रही है.

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता चंद्रमोहन द्विवेदी ने कहा, "पूरी पार्टी सामूहिक रूप से एक होकर इस चुनाव में उतर रही है और नतीजे हर भ्रम को दूर कर देंगे".

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे