भारत में ईसाइयों में कैसे दिया जाता है तलाक़?

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सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर फ़ैसला देते हुए कहा है कि 'चर्च' यानि ईसाई संस्थानों के पास तलाक़ पर फ़ैसला देने का अधिकार नहीं है. कोर्ट के मुताबिक सिर्फ़ अदालतें ही ये फ़ैसले कर सकती हैं.

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जानिए भारत में कैथोलिक ईसाई समुदाय में तलाक़ कैसे दिया जाता है.

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ईसाई धर्म में तलाक़

'कैथोलिक चर्च' तलाक़ को सही नहीं मानती. शादी के व़क्त ली गई शपथ में 'मौत होने तक साथ रहने' की बात कही जाती है.

लेकिन अगर किसी दंपत्ति के बीच ऐसे हालात बन जाएं कि वो किसी भी कीमत पर साथ नहीं रहना चाहते हों, तो 'कैथोलिक चर्च' उनकी शादी को 'नल एंड वॉएड' यानि रद्द करने का तरीका बताती है.

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शादी रद्द करने का तरीका

शादी रद्द करवाने के लिए दंपत्ति को इसकी वजहों का एक आवेदन चर्च में देना होगा. चर्च सबसे पहले बातचीत के ज़रिए उनमें सुलह करवाने की कोशिश करेगी.

सुलह ना होने की सूरत में, पति और पत्नी को छह महीने से एक साल की अवधि तक अलग रहने के लिए कहा जाएगा. इस बीच भी बात ना सुलझे तो इसके बाद चर्च के 'डॉओसीस कोर्ट' में सुनवाई शुरू होगी.

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अलग होने की सूरतें

चर्च की नज़र में दो प्रमुख बातों का उल्लंघन साबित होने पर शादी रद्द कर दी जा सकती है - अगर शादी बिना रज़ामंदी के हुई हो या शादी को शारीरिक संबंध बनाकर मुकम्मल ना किया गया हो.

सुनवाई के दौरान घरेलू हिंसा, 'अडल्ट्री' यानि व्यभिचार, या दो धर्मों के बीच हुई शादी में धर्म का पालन ना करने दिया जाने जैसी वजहों को भी शादी रद्द करने की वजह के तौर पर सुना जाता है.

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तलाक़ चर्च में या अदालत में

कैथोलिक चर्च देश के क़ानून के मुताबिक चलती है. मसलन, चर्च के मुताबिक शादी की न्यूनतम उम्र औरतों के लिए 14 और मर्दों के लिए 16 साल है, पर भारत के क़ानून में ये 18 और 21 साल होने की वजह से वो भी यहां यही सही मानती है.

इसी तरह तलाक़ के लिए भी चर्च, अदालत में दिए तलाक़ को ही सही मानती है. चर्च में तलाक़ लिया भी नहीं जा सकता, सिर्फ़ शादी रद्द की जा सकती है.

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कैसे होगी दूसरी शादी?

चर्च में दूसरी शादी करने के लिए पहली शादी का क़ानून की नज़र में ख़त्म होना ज़रूरी है - फिर चाहे वो तलाक़ से हो या पति-पत्नी में से एक की मृत्यु से.

साथ ही पहली शादी का चर्च में रद्द किया जाना भी ज़रूरी है - चाहे वो शादी चर्च में की गई हो, किसी और धार्मिक स्थल पर या अदालत में.

यानि क़ानूनी तलाक़ और चर्च में पहली शादी रद्द होने के बाद ही चर्च में दूसरी शादी हो सकती है. पर अगर ईसाई धर्म का व्यक्ति दूसरी शादी चर्च में ना करना चाहे (अदालत में करना चाहे) तो पहली शादी चर्च में रद्द करवाना अनिवार्य नहीं है.

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