ये हैं जल्लीकट्टू को बचाने की मुहिम के पीछे

जल्लीकट्टू को बचाने के लिए हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने पिछले छह दिनों से तमिलनाडु ही नहीं बल्कि केंद्र सराकर को हिला कर रख दिया है.

लेकिन तमिलनाडु के पारंपरिक खेल जल्लीकट्टू के अस्तित्व की लड़ाई पिछले कई सालों से लड़ी जा रही है और इस लड़ाई को लड़ रहे हैं कार्तिकेय शिवसेनापति.

जल्लीकट्टू नहीं तो सांड की नस्लों पर खतरा

तस्वीरों में: जल्लीकट्टू पर तमिलनाडु में प्रदर्शन

जल्लीकट्टू पर अगले हफ्ते हो सकता है फ़ैसला

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कार्तिकेय शिवसेनापति पिछले तीन साल से तमिलनाडु के इस पारंपरिक खेल को बचाने के लिए मुहिम से लोगों को जोड़ने का काम कर रहे हैं.

कनगेयम प्रजाति के सांडों की घटती संख्या से दुखी कार्तिकेय मानते रहे हैं कि जल्लीकट्टू पर बैन लगने से सांडों की इस प्रजाति पर ख़तरा मंडराने लगेगा.

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भारत में जर्सी और फ़्रेसीन प्रजाति के पशुओं के आयात के कारण पहले से ही स्थानीय प्रजातियों का अस्तित्व ख़तरे में है.

कार्तिकेय कहते हैं, ''2013 में चेन्नई के मरीना बीच पर जब मैंने जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध का विरोध किया तो मेरे साथ बहुत कम लोग थे.''

इसके बाद कार्तिकेय ने जल्लीकट्टू को बचाने की अपनी मुहिम तेज़ कर दी.

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अब वो जल्लीकट्टू के समर्थकों में इतने लोकप्रिय हो गए हैं कि गुरुवार को मरीना बीच पर जब वो भाषण देने पहुंचे तो उनका स्वागत किसी रॉक स्टार की तरह हुआ.

हालांकि, मरीना बीच पर जल्लीकट्टू के समर्थकों ने किसी नेता या फ़िल्म स्टार को बोलने का मौका नहीं दिया.

वो कहते हैं कि जानवरों के अधिकारों की हिमायती पीपल्स फ़ॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ़ एनिमल्स (पेटा) को तमिलनाडु के किसानों और उनके पशुओं के बीच के रिश्ते के बारे में कोई समझ नहीं है.

44 साल के कार्तिकेय शिवसेनापति का परिवार पीढ़ियों से पशुपालन से जुड़ा रहा है. वो ख़ुद को इस काम से जुड़ी सातवीं पीढ़ी का बताते हैं.

1960 के दशक में पड़ोसी ज़िलों के अलावा विदेश जैसे कि ब्राज़ील, मलेशिया, फ़िलीपीन्स और श्रीलंका में भी कनगेयम सांडों और बैलों की मांग हुआ करती थी.

उनके दादा के एन स्वामिनाथन 1967-72 के बीच तमिलनाडु सरकार में शामिल रहे, इस दौरान कनगेयम प्रजाति के पशुओं को बचाने के लिए कई कानून लाए.

अपने दादा से प्रेरित होकर कार्तिकेय ने भी इस तरफ़ क़दम बढ़ा दिए.

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तमिलनाडु वेटरिनरी यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के मुताबिक़ साल 1991 से 2001 के बीच कनगेयम प्रजाति के पशुओं की संख्या 11 लाख से घटकर चार लाख रह गई.

उन्होंने 2009 में सेनापति कनगेयम कैटल रिसर्च फ़ाउन्डेशन की शुरुआत की.

अंग्रेज़ी में स्नातक की पढ़ाई कर चुके कार्तिकेय जल्लीकट्टू के अलावा रेखला नाम के खेल के लिए भी अभियान चलाते हैं.

कार्तिकेय भारत के योजना आयोग की एक परामर्श कमेटी के सदस्य भी रह चुके हैं.

जल्लीकट्टू को बचाने के उनके इस अभियान में उनकी पत्नी मिनाक्षी और उनकी दो बेटियां भी साथ खड़ी रहती हैं.

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