पंजाब के चुनावी दंगल में महिलाओं पर दांव नहीं!

एक ज़माने में 'कुड़ी मारो' के प्रदेश के रूप में बदनाम हुए पंजाब में वैसे तो हालात बेहतर हैं क्योंकि पिछले तीन दशकों में यहाँ की महिलाओं ने अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी जगह बनाने में कामयाबी हासिल की है.

'कुड़ी मारो' या भ्रूण हत्या के लिए पंजाब और हरियाणा काफी बदनाम रहे. हालांकि समाज की सोच काफी बदली, लेकिन आज भी राजनीति में पंजाब की महिलाएं खुद को काफी उपेक्षित ही समझती हैं.

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आखिर समझें क्यों ना? विधानसभा के टिकट के बंटवारे में लगभग हर राजनीतिक दल ने यह सन्देश दे दिया कि पंजाब की राजनीति में सिर्फ पुरुषों का ही दबदबा रहेगा.

इस बार विधानसभा की टिकटों के बंटवारे में भी सभी पार्टियों ने महिलाओं को टिकट देने में काफी कंजूसी का प्रदर्शन किया. जहां कांग्रेस ने 117 सीटों में सिर्फ सात पर महिला उम्मीदवार खड़े किए, अकाली दल ने 94 सीटों पर मात्र पांच. उसी तरह भारतीय जनता पार्टी ने दो जबकि आम आदमी पार्टी ने सिर्फछङ महिला उम्मीदवार ही खड़े किए.

लगभग सभी दलों में कई ऐसी महिला नेता हैं जिन्होंने टिकट मिलने की उम्मीद लगा रखी थी, लेकिन आखिरी क्षणों में उन्हें टिकट ना देकर उनकी जगह किसी पुरुष उम्मीदवार को खड़ा कर दिया गया.

Image caption पंजाब प्रदेश महिला कांग्रेस की उपाध्यक्ष रह चुकी हैं लीना तपारिया

कई जगहों पर इन महिला नेताओं ने बगावत भी की और बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ने की ठान ली. कुछ ने पार्टी हित में सब्र कर लिया, लेकिन कुछ ने मायूस होकर खुद को समेट लिया और घरों में ही रहना बेहतर समझ लिया.

ऐसी ही एक नेता हैं लीना तपारिया जो पंजाब प्रदेश महिला कांग्रेस की उपाध्यक्ष रह चुकी हैं. लुधियाना से उनकी टिकट लगभग पक्की समझी जा रही थी, लेकिन ऐन वक़्त में उनकी जगह राकेश पाण्डेय को टिकट दे दिया गया.

लीना तपारिया पार्टी के इस फैसले से आहत हैं और उन्होंने चुनाव प्रचार से खुद को अलग कर लिया है.

Image caption आम आदमी पार्टी की महिला विंग की उपाध्यक्ष हैं राजवंत कौर का टिकट भी अंतिम समय में कट गया

वो बीबीसी से कहती हैं, "जब धरना-प्रदर्शन और रैलियाँ करनी थीं तो हम पर सारा दारोमदार था. मुझे नहीं लगता अब कांग्रेस की महिलाएं घर से बाहर निकलेंगी. जब मेरा ही मन टूट गया है तो फिर बाकियों का मैं समझ सकती हूँ. सिर्फ मैं ही नहीं कई महिला नेता ऐसी हैं जिन्हें पार्टी में टिकट मिलना चाहिए था, लेकिन नहीं दिया गया. अगर पार्टी हमारे बारे में नहीं सोचती है तो बेहतर है कि हम घर पर ही बैठें."

आम आदमी पार्टी की महिला विंग की उपाध्यक्ष राजवंत कौर भी एक ऐसी ही महिला नेता हैं जिनका टिकट आख़िरी वक़्त में काट दिया गया. पार्टी के फैसले से आहत राजवंत कौर कहती हैं कि वो बदलाव लाने के लिए राजनीति में आई हैं टिकट के लिए नहीं. लेकिन जिस तरह का रवैया है सभी पार्टी के नेताओं का है वो उससे काफी आहत महसूस कर रही हैं.

वो कहती हैं, "अफ़सोस इसलिए है कि टिकट देने से पहले उन्होंने कहा था काम देख कर टिकट देंगे. हमने रात- दिन काम किया और जब टिकट का दावा पेश किया तो बिलकुल किनारे कर दिया गया. यह साबित हो गया कि पुरुषों की तुलना में हमारी पार्टी में भी महिलाओं को कमज़ोर की तरह देखा जाता है. मैंने भी सोचा कि अब घर बैठना ही बेहतर होगा."

उसी तरह भारतीय महिला हाकी टीम की पूर्व कप्तान राजबीर कौर आम आदमी पार्टी में शामिल हुईं थीं. उनका आरोप है कि उन्हें जालंधर कैंट विधानसभा सीट से टिकट देने का आश्वासन दिया गया था. मगर उन्हें टिकट नहीं देकर आप ने एचएस वालिया को टिकट दे दिया. इस बात से नाराज़ राजबीर कौर ने आम आदमी पार्टी की सदस्यता छोड़ दी और शिरोमणि अकाली दल का दामन थाम लिया.

Image caption भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की ओर से अमृतसर से चुनाव लड़ रही हैं गुरनाम कौर

कुछ ऐसी ही कहानी भारतीय जनता पार्टी की नेता रमा महाजन की भी है जिन्हें अमृतसर (पूर्व) से पार्टी का उम्मीदवार लगभग तय माना जा रहा था. मगर उनके साथ भी वैसा ही हुआ जैसा लीना तापरीया और राजवंत कौर के साथ हुआ है.

अमृतसर से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उम्मीदवार बीबी गुरनाम कौर कहती हैं कि जब औरतों की बात आती है तो देश और खासतौर पर पंजाब के सभी बड़े राजनीतिक दलों का एक जैसा ही रवैया है. वो कहती हैं जिन महिलाओं को टिकट मिला भी है वो उन में से हैं जिनके परिवार - यानी पति, पिता या भाई का राजनीति में पहले से दबदबा रहा हो.

गुरनाम कौर के अनुसार, "जिन महिला नेताओं के पीछे परिवार का सपोर्ट है, बस वही पंजाब की राजनीति में अहम पदों पर नज़र आती हैं. जबकि वो महिलाएं जिन्होंने अपने खुद के बूते पर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई है, हाशिए पर ही रहती हैं."

वरिष्ठ पत्रकार शम्मी सरीन मानते हैं कि पंजाब एक पुरुष प्रधान समाज ही रहा है और इसलिए राजनीति में भी इसकी झलक मिलती है.

उनका कहना है कि जो महिलाएं प्रधान या सरपंच का चुनाव लड़कर जीतीं हैं, उनके पति या भाई ही खुद को सरपंच और प्रधान कहते हैं. आज भी समाज इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि महिलाएं चूल्हा चौका छोड़कर घर से बाहर निकल रहीं हैं और समाज में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं.

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