उत्तराखंड चुनाव: भ्रष्टाचार और रोज़गार हैं बड़े मुद्दे

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उत्तराखंड के चौथे विधानसभा चुनाव के लिए राजनैतिक दलों ने कमर कस ली है. मुख्य मुक़ाबला हमेशा की तरह कांग्रेस और बीजेपी के बीच माना जा रहा है. 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव में क़रीब 76 लाख मतदाता, 15 फरवरी को वोट डालेंगे.

उत्तराखंडः नेता पहाड़ छोड़ मैदानी सीटों से लड़ रहे हैं चुनाव

पिछले चार चुनावों की तरह इस बार भी पलायन, बेरोज़ग़ारी, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली जैसे पारंपरिक मुद्दे ही हैं. हालांकि नोटबंदी भी इनमें जुड़ गया है.

वरिष्ठ पत्रकार जयसिंह रावत कहते हैं, "राज्य बनने से पहले मास्टर नहीं थे, आज भी वही हालत है, डॉक्टर नहीं थे आज भी नहीं है. दिक्कत ही दिक्कत है. प्राकृतिक आपदाओं ने पहाड़ को तहस-नहस कर दिया है. लोग मैदानी इलाक़ों में आ रहे हैं. शहरों में नागरिक सुविधाएं घट रही हैं. ट्रैफ़िक समस्या बढ़ गई है. शहरों पर दबाव बढ़ रहा है. लोगों ने नाल खाले तक क़ब्ज़ा लिए हैं."

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पलायन को लेकर वास्तविक धरातल पर कोई कारगर नीति सरकारें नहीं ला पाईं. चाहे 2007 में बीजेपी की सरकार रही हो जिसके पांच साल में तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बदले या 2012 की कांग्रेस सरकार, जिसके कार्यकाल में दो बार मुख्यमंत्री बदले गए.

राजनीतिक टिप्पणीकार एसएमए काज़मी के मुताबिक़, "पलायन तो बहुत पहले से हो रहा है. स्कूल नहीं हैं अस्पताल नहीं हैं. सुविधाएं नहीं, लोग नीचे तो आएंगे ही. 2013 के बाद इसमें और तेज़ी आ गई है. पहाड़ में कुदरती आपदाएं बढ़ रही हैं और माइग्रेशन भी उसी तेज़ी से बढ़ा है. इस तरह पहाड़ खाली हो जाएंगे. पहाड़ी राज्य का कंसेप्ट था लेकिन पहाड़ में ही विकास नहीं हो रहा है. तो ये मक़सद नाकाम हो रहा है."

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काज़मी मानते हैं कि, "सबसे बड़ा मुद्दा मिसगर्वनेंस का है. करप्शन का मुद्दा है चाहे शराब नीति हो या खनन नीति हो, सब शक के दायरे में है. दूसरा बड़ा मुद्दा बेरोज़गारी है. पिछली बार सरकार ने बेरोज़गारी भत्ते की बात की थी. उसका कुछ पता ही नहीं चला."

उधर, गैरसैण को राजधानी बनाने की मांग को लेकर राजनीतिक गलियारों में आए दिन आवाज़ें तो आती हैं पर उन्हीं गलियारों में गुम भी हो जाती हैं. इस बार भी ये मुद्दा है मगर परिसीमन ने इसे एक तरह से पीछे कर दिया है. मैदानी इलाकों की सीटें पहाड़ी इलाक़ों के अनुपात में लगभग बराबर हो गई हैं, लिहाज़ा सिर्फ़ पहाड़ की फ़िक्र करना प्रमुख राजनीतिक दलों को फ़ायदे का सौदा नहीं लगता. भले वो वहां विधानसभा भवन बना दें या सत्र करा दें, जो कोशिश कांग्रेस ने की भी है.

जयसिंह रावत कहते हैं, "सारे नेता पहाड़ी सीटों को छोड़कर मैदानी सीटों से लड़ रहे हैं. चाहे वो रावत हों या निशंक. पहाड़ी राज्य का ध्येय ही नहीं रह गया है."

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार अनुपम त्रिवेदी की राय अलग है. वह कहते हैं, "इस बार का चुनाव पर्सनेलिटी पर हो रहा है. दो व्यक्तियों के बीच का इलेक्शन हो गया है. एक ओर नरेंद्र मोदी हैं तो दूसरी ओर हरीश रावत. कांग्रेस वर्सेस बीजेपी भी नहीं दिख रहा है. और इसके बैकड्रॉप में जो मुद्दे हैं वे प्रमुखता से नहीं उठ पा रहे हैं."

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Image caption महमूद का काम नोटबंदी के दौरान पूरी तरह ठप हो गया

कौन से हैं ये मुद्दे? अनुपम त्रिवेदी कहते हैं, "पिछले 16 साल में गांव के गांव खाली हुए. पलायन हो रहा है. लोगों को रोज़गार नहीं मिल रहा है. पहाड़ों में रहना दूभर हो गया है. प्राकृतिक आपदा तो है ही, जंगली पशुओं का हमला और घुसपैठ रिहाइशी इलाक़ों में बढ़ रही है. जहां थोड़ा बहुत खेती है वहां बंदरों और सुअरों का उत्पात हो गया है. मैदानी इलाक़ों में बड़े पैमाने पर खेतिहर लोग हैं लेकिन नोटबंदी ने उनकी कमर तोड़ दी है. ये सब इतने जेनुइन मुद्दे हैं लेकिन इनके बावजूद चुनावी लड़ाई बनाम की हो गई है."

युवा प्रवीण भट्ट चुनावी मुद्दों को समग्र विकास के नज़रिए से जोड़ने की बात करते हैं. उनका कहना है कि "मोदी प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने नीति आयोग बनाया था. पांच सदस्यीय दल उत्तराखंड से भी बुलाया था. मैं उसमें था. हमने उन्हें लोकनीति का मसौदा सौंपा था. हिमालयी विकास से जुड़ा यह समग्र दस्तावेज़ था. जिसमें शिक्षा, कृषि, सिंचाई, सड़क, प्राकृतिक विपदा, संचार आदि सारी बातें शामिल हैं."

तो आम लोग किस तरह सोच रहे हैं? देहरादून के रहने वाले 72 साल के महमूद फलों की रेहड़ी लगाते थे. "मेरा रेहड़ी का काम था. आंखें कमज़ोर हो गई हैं. काम छोड़ दिया है. लड़का काम करता है लकड़ी का. नोटबंदी होने के काम उसका भी काम ठप पड़ा है."

वह कहते हैं, "रोज़ग़ार होना चाहिए और कुछ नहीं. क्या चाहिए. हमें किसी की भीख नहीं चाहिए. अभी तक कोई पेंशन नहीं है हमारी. हम तो पढ़े-लिखे हैं नहीं ज़्यादा. बस यह है कि बच्चों के लिए सोचता है आदमी."

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टिहरी ज़िले के चंबा क़स्बे में ढाबा चलाने वाले हरिप्रसाद जखमोला कहते हैं, "वोटर तो सोच-समझकर वोट देगा और बीजेपी को तो मेरी समझ से बिल्कुल नहीं देगा. हम भी बीजेपी की सोच के थे, लेकिन इन हालात ने हमको चेंज कर दिया. कम से कम गाड़ी का पहिया चल रहा था, थोड़ा बहुत पैसा मिल रहा था, चूल्हा चल रहा था, घर वाले खुश थे, आज घर वाले सर नोच रहे हैं अपना भी और हमारा भी. हम कोई बहुत बड़े सरमाएदार तो हैं नहीं, कि हमारे पास बहुत पैसे होंगे, हमारा अपना छोटा सा काम था."

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