यूपी चुनाव का वो फैक्टर जो बदल सकता है सारे समीकरण

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उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन बन गया है. ये जानकारी भी सामने आ रही है कि इस गठबंधन को बनाने में आख़िरी समय में प्रियंका गांधी ने दिलचस्पी ली.

वैसे इस गठबंधन की औपचारिक घोषणा से पहले ही लखनऊ की सड़कों पर प्रियंका गांधी और डिंपल यादव के पोस्टर लगने शुरू हो गए थे.

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ज़ाहिर इस गठबंधन के बनने से उत्तर प्रदेश के चुनावी घमासान में एक नया फैक्टर जुड़ गया है. वो फैक्टर है प्रियंका गांधी और डिंपल यादव की जोड़ी के ग्लैमर का.

इन दोनों की छवि ग्लैमरस रही है और यह छवि उत्तर प्रदेश के युवाओं को गठबंधन की तरफ़ आकर्षित करने में कितना कामयाब हो सकता है, इस बारे में हिंदुस्तान टाइम्स के लखनऊ एडिशन की संपादक सुनीता एरॉन कहती हैं, "ग्लैमर का पहलू तो होगा ही लेकिन उससे ज़्यादा यूथ पॉवर का असर होगा. प्रियंका पहले भी चुनाव प्रचार करती रहीं लेकिन केवल अमेठी और रायबरेली तक, और डिंपल भी अपने इलाके तक सीमित थीं. लेकिन अब दोनों बाहर निकल कर एक साथ प्रचार करेंगी तो इससे गठबंधन को फ़ायदा होने वाला है."

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प्रियंका गांधी के नेतृत्व में ही कांग्रेस का भविष्य देखने वाले लोगों की भी कमी नहीं है. चाहे प्रियंका गांधी हों या डिंपल यादव, दोनों की पढ़ाई लिखाई आधुनिक स्कूल-कॉलेजों में हुई है और उनकी अपनी लाइफ़ स्टाइल भी हाई प्रोफाइल जैसी है.

बावजूद इसके दोनों सार्वजनिक जीवन में, राजनीति में आम लोगों को कनेक्ट करना बख़ूबी जानती हैं. इस बारे में वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "1999 में प्रियंका उतनी मैच्योर नहीं रही होंगी, लेकिन बेल्लारी में सुषमा स्वराज के सामने जिस तरह से उन्होंने अपनी मां का प्रचार संभाला हुआ था, उसे मैंने ख़ुद से कवर किया था. आम लोगों में एकदम घुलमिल जाती हैं, ठीक इंदिरा गांधी की तरह ही. यूपी में भी वे अब तक बंद मुठ्ठी की तरह रही हैं. डिंपल का अंदाज़ भी वैसा ही है."

समाजवादी रूझान वाली पत्रिका सोशलिस्ट फैक्टर के संपादक फ्रैंक हुज़ूर कहते हैं, "समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन के प्रचार में अखिलेश-राहुल, जितनी भूमिका प्रियंका गांधी-डिंपल यादव की होने वाली है. इसका संकेत गठबंधन की घोषणा के दौरान राज बब्बर के एलायंस के एजेंडे की घोषणा वाले बयान से लगाया जा सकता है, जिसमें महिला सुरक्षा और उनसे जुड़े मुद्दों को अहमियत दी गई है."

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प्रियंका गांधी और डिंपल यादव के अलावा उत्तर प्रदेश के चुनाव में दूसरी ग्लैमरस महिला नेताओं की भूमिका भी बेहद अहम मानी जा रही है.

समाजवादी पार्टी के अंदर ही अखिलेश यादव के छोटे भाई प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव को लखनऊ कैंट से उम्मीदवार बनाया गया है. हालांकि अभी तक तो उनकी भूमिका केवल अपनी सीट निकालने की होगी.

वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी की ओर से केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को अभी तक मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जा रहा है और वे यूपी का लगातार चुनावी दौरा करती रही हैं. उनकी पर्सनैलिटी का भी अपना एक आकर्षण है.

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उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "स्मृति ईरानी भाजपा की स्टार प्रचारक होंगी लेकिन उनकी छवि उत्तर प्रदेश के आम मतदाताओं में एक टीवी कलाकार वाली है, राजनीति में अब तक मिले मौके का वह पूरा उपयोग नहीं कर पाई हैं, ऐसे में प्रियंका और डिंपल यादव के सामने उनकी छवि थोड़ी कमतर दिख रही है."

भारतीय जनता पार्टी में स्मृति ईरानी का साथ देने के अलावा मथुरा से पार्टी की सांसद हेमा मालिनी भी मौजूद होंगी, लेकिन सुनीता एरॉन के मुताबिक फ़िल्मी कलाकार बहुत बड़े पैमाने पर वोट दिला पाएं, ऐसा होता नहीं है.

इसके अलावा उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी यूनिट ने पिछले दिनों में अपने नेता दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह को भी उभारने की कोशिश की है. हालांकि उनकी भूमिका कुछ ही क्षेत्रों में प्रचार तक सीमित रहने की उम्मीद की जा रही है.

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भारतीय जनता पार्टी यूपी चुनाव में अपना दल के गठबंधन के साथ चुनाव लड़ रही हैं और अपना दल की कमान अनुप्रिया पटेल के हाथों में है. अनुप्रिया पटेल बीते कुछ महीनों से लगातार उत्तर प्रदेश में चुनावी दौरा करती रही हैं और उनकी छवि भी आकर्षक है.

सुनीता एरॉन प्रियंका-डिंपल की जोड़ी के सामने स्मृति ईरानी-अनुप्रिया पटेल की जोड़ी के असर पर बताती हैं, "स्मृति ईरानी और अनुप्रिया पटेल भी काफी पढ़ी लिखी नेता हैं. ख़ास बात ये है कि ये दोनों बहुत अच्छे ढंग से बोलती हैं, लोगों के बीच अपनी बात पहुंचाने की काबिलियत दोनों में है. लेकिन इन दोनों की तुलना में प्रियंका और डिंपल की छवि थोड़ी दमदार दिख रही है और उम्र भी दोनों की कम है."

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अनुप्रिया पटेल का असर पूर्वी उत्तर प्रदेश की कुर्मी बहुल्य सीटों तक ही दिखेगा.

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अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "अनुप्रिया पटेल और स्मृति ईरानी शहरी मतदाताओं को अपनी बातों से आकर्षित तो कर सकती हैं, लेकिन यूपी के ठेठ गंवई लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में उन्हें मुश्किल होगी. ये मुश्किल प्रियंका और डिंपल को इसलिए नहीं होगी, क्योंकि शीर्ष स्तर के राजनीतिक पारिवारिक की विरासत के चलते उनकी स्वीकार्यता ज़्यादा है, इन दोनों की अपनी इमेज भी कुछ सौम्य और शालीन अंदाज़ वाली है."

हालांकि लखनऊ के वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार वीरेंद्र नाथ भट्ट के मुताबिक प्रियंका गांधी और डिंपल यादव की जोड़ी का आम चुनाव में बहुत असर दिखेगा, ये कहना जल्दबाजी होगी. क्योंकि कांग्रेस पार्टी अपना वोट समाजवादी पार्टी को ट्रांसफर करा पाए, ऐसा संभव नहीं दिखता, लेकिन वे मानते हैं कि इस जोड़ी का असर शहरी इलाके के युवा वोटरों पर जरूर होगा.

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लेकिन फ्रैंक हुज़ूर दावा करते हैं कि प्रियंका गांधी और डिंपल यादव की जोड़ी का असर युवा मतदाताओं के अलावा महिला मतदाताओं को बड़े पैमाने पर गठबंधन की ओर मोड़ सकता है, क्योंकि दोनों की हैसियत ऐसी है कि वे महिलाओं के हितों वाले मुद्दों पर काम करा सकती हैं, ये बात स्मृति ईरानी और अनुप्रिया पटेल के बारे में नहीं कही जा सकती हैं.

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