जल्लीकट्टू: मर्दानगी और प्यार का खेल?

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जानवरों के अधिकारों के इर्द-गिर्द छिड़ी बहस से अलग, जल्लीकट्टू के खेल का औरतों की ज़िंदगी से भी गहरा रिश्ता है.

कई विश्लेषकों का मानना है कि सांड़ पर क़ाबू पाकर उसे गले लगाने के इस खेल के ज़रिए मर्द अपनी 'मर्दानगी' का सबूत देते हैं.

चेन्नई स्थित सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक नित्यानंद जयरमन कहते हैं, "जैसे मर्द मोटरसाइकिल तेज़ दौड़ाकर औरतों को आकर्षित करने की कोशिश करते हैं, वैसे ही जल्लीकट्टू के ज़रिए अपनी मर्दानगी को दिखाया जाता है."

तमिलनाडु में जल्लीकट्टू का इतिहास क़रीब 1300 साल पुराना है और नित्यानंद के मुताबिक साहित्य में ऐसे कई उल्लेख हैं जिनमें इस खेल का इस्तेमाल शादी के रिश्ते बनाने में भी किए जाने के बारे में बताया गया है.

पिछले कई दशकों में तमिल सिनेमा में भी जल्लीकट्टू का चित्रण 'औरत का प्यार पाने' के लिए दिखाने के कई उदाहरण हैं.

'जो मर्द बंधन खोल देता था, उसे दुल्हन मिलती थी'

क्या ये सिर्फ़ जल्लीकट्टू पर बैन का विरोध है?

1956 में एआईएडीएमके नेता, एमजी रामाचंद्रन ने पहली बार इस खेल को बड़े पर्दे पर दिखाया और मक़सद था एक औरत का प्यार जीतना.

'थाइकुप्पिन थरम' फ़िल्म के क्लाइमेक्स में एमजीआर जल्लीकट्टू में जीतकर अपनी मर्दानगी का लोहा मनवाते हैं और प्रेमिका को जीत लेते हैं.

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फ़िल्मों में जल्लीकट्टू

1980 के दशक में सुपरस्टार रजनीकांत ने ये चलन जारी रखा और उनकी एक फ़िल्म 'मुरत्तू कलई' (आवारा बदमाश सांड़) में जल्लीकट्टू का दृश्य ही नहीं था, फ़िल्म के नाम में ही हीरो के व्यक्तित्व का बखान था.

इन सभी फ़िल्मों में औरतों को इस तरह के प्रदर्शन को पसंद करते हुए ही दिखाया जाता है और ऐसा चित्रण मर्दानगी और औरतों की पसंद के बारे में एक ख़ास समझ बनाता है.

मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट स्टडीज़ (एमआईडीएस), चेन्नई के एसोसिएट प्रोफ़ेसर सी लक्ष्मणन ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "ये मूल रूप से सिर्फ़ मर्द की दिलेरी का सार्वजनिक प्रदर्शन है. अगर गोपनीय तरीके से चुनाव करवाएं तो महिलाएं जल्लीकट्टू का विरोध करेंगी."

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ज़्यादातर तमिलनाडु के दक्षिणी ज़िलों में खेले जानेवाले इस खेल के बड़े आयोजन कृषि से जुड़े त्योहार 'पोंगल' के दौरान होते हैं.

नित्यानंद जयरमन के मुताबिक त्योहार के विभिन्न रस्म-रिवाज़ भी मर्दों और औरतों में बंटे हुए हैं.

वो बताते हैं,"सर्वश्रेष्ठ मर्द उसे माना जाता है जो जल्लीकट्टू में सांड़ को क़ाबू कर ले और औरतों में जो चावल के आटे से बनाए जाने वाली कोल्ल्म (रंगोली) में सबसे जटिल डिज़ाइन बनाए."

इन दोनों खेल में आगे आनेवाले को ही शादी के लिए बेहतरीन वर और वधू माना जाता है.

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जल्लीकट्टू का शाब्दिक अर्थ होता है 'सांड़ को गले लगाना'. 'जल्ली' का मतलब होता है सिक्का और 'कट्टू' का मतलब होता है बांधना.

इसकी शुरुआत ईसा-पूर्व काल में हुई थी जब सोने के सिक्कों को सांड़ की सींग में बांधकर इसे खोला जाता था.

इस खेल के दौरान सांड़ को एक बाड़े में से छोड़ दिया जाता है और नौजवान मर्दों की भीड़ की चिल्लाहट सुनकर सांड़ दौड़ पड़ते हैं.

तमिल विद्वान और पेरियारवादी थो पारामासिवम कहते हैं, "नौजवान मर्दों के लिए सांड़ के कूबड़ को पकड़कर सींग में बंधे सोने का सिक्का निकालना एक चुनौती है जिससे इज़्ज़त का मसला जुड़ा था. जो मर्द बंधन खोल देता था, उसकी शादी के लिए दुल्हन मिलती थी."

पारामासिवम के मुताबिक अब शादी का ये तरीक़ा प्रचलन में नहीं है.

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