जल्लीकट्टू विरोध प्रदर्शन में कैसे बदलते रहे हालात?

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तमिलनाडु में एक सप्ताह के अंदर ही हालात बदल गए. जल्लीकट्टू यानी सांड़ों की लड़ाई के खेल के समर्थन में हज़ारों लोगों का शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन अचानक से सरकार के प्रति विरोध प्रदर्शन में तब्दील हो गया.

ये प्रदर्शन इतना शांतिपूर्ण था कि एक सप्ताह तक समाज के विभिन्न वर्ग के युवाओं के प्रदर्शन के बावजूद सरकारी व्यवस्थाएं सामान्य तौर पर सुचारू रूप से जारी थीं.

लेकिन फिर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हिंसक रूप लेने लगा और चेन्नई की सड़कों पर हिंसा देखने को मिली, पुलिस स्टेशन तक को चलाने के मामले सामने आए. इस ग़ुस्से से यह ज़ाहिर हो रहा है कि लोगों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर एक तरह का ग़ुस्सा व्याप्त था.

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जल्लीकट्टू का आयोजन केवल तमिलनाडु के दक्षिणी हिस्से में होता है. लेकिन यह खेल चेन्नई के मरीना तट, मदुरई, त्रिची, त्रियूनलवेली और अन्य जगहों पर लोगों के प्रदर्शन के केंद्र में यही खेल था.

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के चेन्नई चैप्टर के एन. सत्यामूर्ति ने कहा,"युवकों में तो ग़ुस्सा है ही, महिलाओं में भी ग़ुस्सा देखने को मिल रहा है. वो भी बडी संख्या में प्रदर्शन में आ रही है. कावेरी और मुलापेरियार जल विवाद को लेकर भी ग़ुस्से में हैं."

जो लोग जल विवादों के बारे में बात कर रहे हैं, उनके बारे में सत्यामूर्ति कहते हैं, "अदालतों में मुकदमा चल ही रहा है. लेकिन आम धारणा तो यही है कि तमिलनाडु के लोगों को संघर्ष करना पड़ रहा है."

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शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही भीड़ का मूड बदल रहा है, इसका पहला संकेत तब मिला था, जब मरीना तट पर प्रदर्शन कर रहे लोगों की मांग बदल गई थी. जो लोग जल्लीकट्टू के आयोजन की मंज़ूरी चाहते थे, उन लोगों ने बाद में इसके आयोजन के लिए स्थायी हल की मांग शुरू कर दी थी.

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मदुरई से 18 किलोमीटर दूर अलानगानालुर जल्लीकट्टू का मुख्य क्षेत्र है, यहीं से प्रदर्शन की शुरुआत हुई थी. यहां विरोध प्रदर्शन करने वाले लोग अपना प्रदर्शन वापस ले चुके हैं.

सेनाथिपति कनगेयम कैटल रिसर्च फाउंडेशन के बैनर तले जल्लीकट्टू के लिए संघर्ष करने वाले कार्तिकेय सेनापति कहते हैं, "हम अध्यादेश का स्वागत करते हैं, हम जानते हैं कि ये पूरी जीत नहीं है लेकिन हमें भविष्य में भी सहायता मिलेगी. अगर ज़रूरत हुई तो हम फिर से प्रदर्शन करेंगे."

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सेनापति और उनके सहयोगी इस बात को लेकर बेहद स्पष्ट हैं कि उनके विरोध प्रदर्शन को एक तरह से अवांछित लोगों ने हाईजैक कर लिया. ये लोग राजनीतिक नेताओं के ख़िलाफ़ अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये भी एक वजह थी कि इन लोगों ने अपना विरोध प्रदर्शन वापस लिया है.

इस विरोध प्रदर्शन में शामिल कुछ युवा गणतंत्र दिवस के बॉयकॉट करने के नारे भी लगा रहे थे. इसके अलावा त्रियूनलवेली के दो कैंप के बीच वाद विवाद भी देखने को मिला है.

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विश्लेषकों के मुताबिक इस विरोध प्रदर्शन में अल्ट्रा नेशनलिस्ट तमिल लोग शामिल हो गए हैं. मद्रास इंस्टीच्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट स्टीडीज़ (एमआईडीएस) के प्रोफेसर एआर वेंकटचलापति कहते हैं कि इस विरोध प्रदर्शन अल्ट्रा नेशनलिस्ट तमिल समूह के अलावा अल्ट्रा लेफ्टिस्ट और दूसरे चरमपंथी समूह भी इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए थे.

वह कहते हैं, "राज्य सरकार ने उग्र हो सकने वाले विरोध प्रदर्शन को शांत किया है, उसका बेहतरीन उदाहरण है. हज़ारों लोगों के प्रदर्शन के बावजूद सरकार को कोई नुकसान नहीं हुआ है. ये शांतिपूर्ण प्रदर्शन ही था."

वैसे इस विरोध प्रदर्शन का सबसे मज़बूत पहलू ये भी था कि राज्य के मुख्यमंत्री जल्लीकट्टू के खेल का उद्घाटन करने के लिए अलानगानालुर में प्रवेश नहीं कर पाए थे. वैसे ये एक ऐसी घटना ज़रूर है जिसकी तुलना जयललिता के मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान बनी स्थिति से ज़रूर होगी.

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