हाइकमान के रिमोट से फिर चलेगा उत्तराखंड?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

उत्तर प्रदेश से अलग होकर नया राज्य बनने के बाद से उत्तराखंड में तीन विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. इन चुनावों के बाद सत्ता में पार्टी भले ही कोई आए, लेकिन मुख्यमंत्री हमेशा पार्टी हाइकमान से ही थोपा गया है.

उत्तराखंड विधानसभा चुनावों के लिए मतदान 15 फ़रवरी को होना है. पहाड़ की अधिकतर सीटों पर मुक़ाबला भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच है, जबकि हरिद्वार और तराई के इलाक़ों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) मुक़ाबले को त्रिकोणीय बनाए हुए है.

कांग्रेस जहाँ मुख्यमंत्री हरीश रावत के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है, वहीं भाजपा ने यहां मुख्यमंत्री के रूप में कोई चेहरा पेश नहीं किया है. हालाँकि उत्तराखंड भाजपा के चुनाव प्रभारी जेपी नड्डा ने कहा है कि इस बार निर्वाचित विधायकों में से ही मुख्यमंत्री चुना जाएगा.

उत्तराखंड: चुनाव से पहले 19 अपराधी पेरोल पर रिहा

वारिस की ज़िम्मेदारी अब उठा रहे हैं 'रसिक तिवारी'

शायद नड्डा ने ये बयान इस बात को ध्यान में रखते हुए दिया है कि राज्य के अब तक के चुनावी इतिहास में मुख्यमंत्री कभी भी विधायकों में से नहीं चुना गया और ऊपर से थोपा गया.

नौ नवंबर 2000 को इस पहाड़ी राज्य के गठन के बाद से ही हर बार यहाँ मुख्यमंत्री ऊपर से ही थोपा जाता रहा है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

नया राज्य बनने के बाद जब राज्य की अंतरिम सरकार बनी तो भाजपा ने नित्यानंद स्वामी को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया. उनकी ताजपोशी का जनता में ही नहीं, पार्टी के भीतर भी भारी विरोध हुआ था.

नतीजा ये रहा कि नित्यानंद स्वामी एक साल भी कुर्सी पर नहीं टिक सके और भाजपा को भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा.

साल 2002 में हुए राज्य के पहले विधानसभा चुनावों में भाजपा कोश्यारी के नेतृत्व में चुनावी जंग में उतरी, जबकि कांग्रेस का नेतृत्व किया हरीश रावत ने.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption भुवन चंद्र खंड़ूड़ी

इस चुनाव में भाजपा ने सत्ता गंवा दी. कांग्रेस सत्ता में लौटी ज़रूर, लेकिन पार्टी हाइकमान ने मुख्यमंत्री की कुर्सी हरीश रावत को न सौंपकर नारायण दत्त तिवारी को सौंप दी. तिवारी उस समय नैनीताल की लोकसभा सीट से सांसद थे.

नारायण दत्त तिवारी ने पूरे पाँच साल मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली. अपने कार्यकाल के दौरान बड़ी संख्या में 'लाल बत्तियां' बांटने के तिवारी के फैसलों की तीखी आलोचना हुई थी.

उत्तराखंड में नमाज़ के लिए अलग से छुट्टी

2007 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर टक्कर भाजपा और कांग्रेस के बीच रही और इस बार जनता ने भाजपा को चुना. इस बार भी मुख्यमंत्री के लिए पार्टी हाइकमान ने किसी विधायक को योग्य नहीं समझा और तत्कालीन सांसद और पौड़ी सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे भुवन चंद्र खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बनाकर भेज दिया.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption भगत सिंह कोश्यारी

खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बने दो ही साल हुए थे कि तभी 2009 के लोकसभा चुनाव आ गए और भाजपा उत्तराखंड की सभी पांचों लोकसभा सीटें हार गई. इस हार का ठीकरा खंडूड़ी के सर फोड़ा गया और रमेश चंद्र पोखरियाल ने मुख्यमंत्री पद संभाला.

पोखरियाल पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे और पार्टी की बढ़ती अलोकप्रियता को देखते हुए पार्टी हाइकमान ने एक बार फिर खंडूड़ी को आजमाने का फैसला किया.

भाजपा ने 2012 विधानसभा का चुनाव खंडूड़ी के नेतृत्व में लड़ा, लेकिन भाजपा कांग्रेस से एक सीट पीछे रही और खंडूड़ी अपनी सीट तक गंवा बैठे.

इस बार ऊपर से मुख्यमंत्री थोपने की बारी कांग्रेस की थी. कांग्रेस ने मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी विधायक को देने की बजाय टिहरी के तत्कालीन सांसद विजय बहुगुणा को सौंप दी. विजय बहुगुणा उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption विजय बहुगुणा

2013 में केदारनाथ त्रासदी के बाद कांग्रेस सरकार पर लगे आरोपों के बाद पार्टी हाइकमान ने विजय बहुगुणा को हटाकर उनकी जगह केंद्र में मंत्री हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाकर भेजा.

इस बार कांग्रेस एक बार फिर हरीश रावत के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है, जबकि भाजपा ने कहा कि मुख्यमंत्री का फैसला 'विधायक दल' करेगा.

ऐसे में सवाल फिर वही है कि क्या इस राज्य की किस्मत में मुख्यमंत्री विधायक में से बनेगा या फिर ऊपर से थोपा जाएगा?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे