नज़रिया: क्या भारतीय गणतंत्र के पिता थे पटेल?

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गणतंत्र एक ऐसा थिएटर है जो दावा करता है कि नागरिक ही उसके मुख्य एक्टर हैं. इन एक्टर्स को जिस स्क्रिप्ट के हिसाब से अभिनय करना होता है, वो है- संविधान.

भारत गणतंत्र का 67वाँ साल पूरा कर चुका है. ऐसे में मेरी भूमिका बुज़ुर्ग ड्रामा क्रिटिक जैसी है, जिसे ये बताना है कि ड्रामा कितना सशक्त है.

इसके जवाब के लिए भारतीय गणतंत्र के सफ़र पर नज़र डालनी होगी, इतिहास के पन्नों को भी पलटना होगा.

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67 साल पहले गणतंत्र का जन्म तो हो रहा था लेकिन विभाजन का दंश बना हुआ था. दुनिया के किसी दूसरे देश को इस प्रक्रिया के दौरान इस तरह के हालात का सामना नहीं करना पड़ा है.

विभाजन के बाद 10 लाख से ज़्यादा लोगों की जानें गईं और लगभग ढाई करोड़ लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा.

महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू का इस गणतंत्र के निर्माण में योगदान था, लेकिन गणतंत्र के प्रणेता के रूप में सरदार पटेल कहीं ज़्यादा हकदार थे- अगर इस पहलू से सोचें तो अंदाज़ लगाया जा सकता है कि क्यों नरेंद्र मोदी पटेल की विशालकाय मूर्ति बनाने जा रहे हैं.

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कहानी कहना याददाश्त पर निर्भर है और यहां पर ये इस पर निर्भर है कि कोई क्या याद रखना चाहता है. बहरहाल, ये कहा जा सकता है कि नेहरू ने इस राष्ट्र को आकार दिया.

हमारा गणतंत्र वैसा गणतंत्र रहा जिसका भरोसा विज्ञान पर था. हम इस बात पर यक़ीन करते थे कि विज्ञान की मदद से हालात सुधर जाएंगे, ग़रीबी दूर होगी.

ये नेहरू थे जिन्होंने दावा किया था, "भविष्य उनका है जो विज्ञान से दोस्ती करेंगे." उन्होंने ये भी दावा किया कि बांध और प्रयोगशालाएं आधुनिक भारत के मंदिर हैं.

वैसे ये भी अजीब संयोग है कि इन बांधों ने देश में तकरीबन उतने लोगों को विस्थापित किया जितने लोग युद्धों के कारण दर-ब-दर हुए.

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अच्छी नीयत से किए गए फ़ैसलों का नतीजा इतना ख़तरनाक भी हो सकता है, ये अब समझ में आता है.

भारत के मशहूर वैज्ञानिक और योजनाकार विश्वेश्वरैय्या ने भविष्य का जो खाका बुना था, उससे आप समझ सकते हैं कि तब बांधों को लेकर लोगों के विचार कैसे थे. उनका कहना था कि राष्ट्र निर्माण, बांध निर्माण और चरित्र निर्माण समानार्थी हैं.

वैसे एक सेमिनार की कहानी काफ़ी दिलचस्प है. उसमें हर प्रतिनिधि को एक पहेली हल करने को दिया गया था, जब किसी ने उसे हल किया तो अब्राहम लिंकन की तस्वीर बन गई, जब उसे ऊपर से नीचे की ओर पलटा गया तो अमरीका का नक्शा दिखने लगा.

संदेश साफ़ था कि आप उस शख़्स का ख़्याल रखिए, राष्ट्र अपना ख़्याल अपने आप रख लेगा.

भारत जब गणतंत्र बन रहा था तब देश में कई महान नेता मौजूद थे. भारत ने ख़ुद को तीसरी दुनिया के देशों के नेता के तौर पर देखा जो एक बेहतर समाज बनाना चाहते थे.

शुरुआती सालों में पंचशील जैसे आदर्श सिद्धांतों का दौर आया और गुट निरपेक्ष आंदोलन का रास्ता खुला. चाहे वो कोरिया शांति आंदोलन में भारत की भूमिका रही हो या कांगो का मसला रहा हो, भारत की अहम भूमिका रही और हमारा भरोसा संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में मज़बूत हुआ.

शुरुआती साल संस्थान निर्माण के साल रहे. नेहरू ने सपना देखा कि चंडीगढ़ में विभाजन की याद नहीं रहे और इसके अलावा उन्होंने सीएसआईआर, आईआईटी और भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर जैसे संस्थानों के निर्माण पर ज़ोर दिया.

यह वह दशक था, जिसमें शरणार्थियों को फिर से बसाने की चुनौती थी.

इसके बाद चीन ने 1962 में भारत पर हमला कर दिया और लगा कि हमारा देश अचानक से मुश्किल में आ गया. नेहरू का करिश्मा धुंधला पड़ने लगा.

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ये वो दौर था जब विज्ञान और खेल में कामयाबियों का दौर थम गया. हम अविकसित देशों में गिने जाने लगे. नॉर्वे के अर्थशास्त्री रेगनार नुर्कसे के मुताबिक़ ग़रीबी के चक्र ने हमें परेशान करना शुरू कर दिया था. नेहरू का आशावाद, इंदिरा गांधी के लिए राजनीतिक यथार्थ बन चुका था.

साठ का दशक योजनाओं का दशक था, सुब्रह्मण्यम और स्वामीनाथन की देखरेख में हरित क्रांति का दौर आया.

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सत्तर के दशक में इंदिरा ने ग़रीबी हटाओ का नारा दिया. टेक्नोक्रेट्स का दौर था और इस दौरान ही भारत में 17 महीने का आपातकाल भी लागू हुआ.

संजय गांधी के दबदबे वाले आपातकाल में भारत के बैंक, अदालत और विश्वविद्यालय सबको काफ़ी नुकसान हुआ था. इस दौर को लेकर एक कैरिकेचर बड़ा मशहूर हुआ था जिसमें कहा गया था कि ग़रीबी के बदले ग़रीबों को ही मिटाया जा रहा है.

लेकिन देश के आम मतदाताओं ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया, उसी इंदिरा को जिनके बारे में कांग्रेस के देवकांत बरूआ ने कहा था, "इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा."

आपातकाल के दौर के बाद जनता पार्टी सरकार में आई, लेकिन वे शासन ठीक से नहीं संभाल पाए. इंदिरा जल्दी ही सत्ता में लौट आईं.

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फिर देश में असंतोष पनपा और नक्सलबाड़ी, चिपको और कोयलकारो जैसे आंदोलन शुरू हुए.

इन आंदोलनों ने विकास, योजना और सुरक्षा के नाम पर देश चलाते रहने के विचार को चुनौती दी थी बल्कि राष्ट्र और लोकतंत्र को दोबारा परिभाषित करने की ज़रूरत पैदा हो गई. लेकिन उदारीकरण और ग्लोबलाइज़ेशन ने सामाजिक आंदोलनों की रफ़्तार को थाम लिया.

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अब गणतंत्र के सामने ख़तरा पैदा हुआ है, लोकतंत्र के ज़रिए. वर्चस्व वाले बहुमत के साथ भाजपा सत्ता में आई जिसके बाद से अल्पसंख्यकों और हाशिए पर पड़े लोगों का सपना टूटने लगा है. राजसत्ता ने ख़ुद को ताक़त के साथ स्थापित किया और विविधता की कल्पना किनारे कर दी गई.

भारत आज गणतंत्र है, लोकतंत्र भी है लेकिन समाज में बहुमत वाला तबका और बाज़ार आधारित समूह ही अपने लोगों के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन चुके हैं. सांप्रदायिक दंगों के कारण एक करोड़ लोगों को विस्थापन झेलना पड़ा है.

गणतंत्र के इस दौर में विकास की होड़, असंगठित अर्थव्यवस्था के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़े हुए हैं. अल्पसंख्यक, हाशिए का तबका, विस्थापित और कमज़ोर तबका इस बात को महसूस नहीं कर पा रहा है कि वह भारत का नागरिक है.

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ऐसे दौर में लोकतंत्र को अपने नागरिकों के लिए नए आइडिया तलाशने होंगे ताकि सबको अधिकार मिले और उनको साथ लेकर चला जाए ताकि गणतंत्र का सपना कायम रहे.

संविधान को लेकर नया सपना और संस्थानों का निर्माण देश की ज़रूरत है ताकि देश का गणतंत्र सार्थक हो, मौलिक हो और टिकाऊ भी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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