किसी 'ब्लाइंड' के साथ देखी है कोई फ़िल्म?

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हीरो-हीरोइन के हाथ में स्टिक है क्या? ऋतिक रोशन बॉडी-बिल्डर जैसा लग रहा है क्या? उनकी शादी पर कितने लोग दिखाई दे रहे हैं? उनका घर कैसा है? वो एक साथ डांस कर रहे हैं या अलग-अलग?

जब सिर्फ़ आवाज़ ही आईना हो तो पर्दे पर चल रही पूरी तस्वीर कैसे समझ में आए?

सोचिए ऐसे लोग- जो कुछ भी देख नहीं सकते, वो सिनेमा हॉल में फ़िल्म देखते होंगे क्या?

या कभी आपने किसी 'ब्लाइंड' यानी नेत्रहीन व्यक्ति के साथ फ़िल्म देखी है?

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पहले तो मैंने भी नहीं सोचा था पर एक 'ब्लाइंड' जोड़े की प्रेम कहानी पर आधारित फ़िल्म 'क़ाबिल' के रिलीज़ होने पर ये सवाल मन में आए.

तो जेएनयू में पढ़ रही 'ब्लाइंड' छात्रा श्वेता मंडल के साथ मैंने 'क़ाबिल' फ़िल्म देखी.

या शायद ज़्यादा सही ये कहना होगा कि फ़िल्म मैंने देखी. श्वेता ने सुनी.

मैं श्वेता को फ़िल्म के कई दृश्य सुनाती जा रही थी.

पर सही तरीके से कर पा रही हूं या नहीं इस पर ख़ुद को अंधेरे में महसूस करती रही.

श्वेता क्या जानना चाहेगी? कहीं मैं बहुत ज़्यादा तो नहीं बोल रही? क्या वो डायलॉग सुन पा रही है?

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ऋतिक रोशन और यामी गौतम जब एक दूसरे के क़रीब आते हैं, और संगीत के अलावा कोई और आहट नहीं होती तो इसे कितनी बारीक़ी से बताऊं?

मैंने पहले ध्यान नहीं दिया था कि फ़िल्मों में मोहब्बत का कितना इज़हार इशारों या अहसास से किया जाता है, शब्दों से नहीं.

इस फ़िल्म में हीरो-हीरोइन 'ब्लाइंड' हैं तो मुझे लगा बातें बहुत होंगी पर इसमें भी कितना कुछ था जो छूकर या एक-दूसरे की नज़दीकी और अहसास से जुड़ा था.

इसे शब्दों में ढालकर मैं श्वेता को कैसे बताती?

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फ़िल्म देखकर श्वेता ने उसे पांच में से ढाई स्टार ही दिए.

श्वेता को क्या पसंद आया -

'ब्लाइंड' लोग अपनी बाक़ी 'सेन्सेस' यानी इंद्रियों का इस्तेमाल कैसे करते हैं ये बख़ूबी दिखाया.

वो आम ज़िंदगी में कैसे सक्षम होते हैं, जैसे कोई चीज़ नीचे फेंककर आवाज़ से उस जगह की ऊंचाई का अंदाज़ा लगाना, दो चीज़ों में दूरी को कदमों से नापना वगैरह.

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पर कई मायने में ये बॉलीवुड की एक आम मसाला फ़िल्म जैसी ही थी. हीरोइन एक अबला नारी या कमज़ोर कड़ी थी और हीरो उसका रक्षक था.

श्वेता को क्या नापसंद था -

हीरोइन 'ब्लाइंड' है और औरत भी. पर उसकी क्या ख़ास ज़रूरतें हैं इसे फ़िल्म में नहीं उभारा गया.

समाज की विकलांग लोगों की ओर बेरुख़ी श्वेता की अपनी ज़िंदगी के अनुभव से मेल नहीं खाती.

वैसे तो पूरी फ़िल्म इसी उधेड़बुन में निकली कि 'ब्लाइंड' हीरो-हीरोइन का चित्रण कितना सही है. ये आकलन मैं भी कर रही थी और श्वेता भी.

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बाहर निकले तो श्वेता ने कहा कि वो 99 फ़ीसदी फ़िल्म समझ पाई. कुछ कहानी वो इंटरनेट पर पढ़कर आई थी, कुछ मेरे ज़रिए बुनती गई.

और मैं? कुछ अधूरा सा महसूस कर रही थी. इतनी बारीक़ी से इससे पहले मैंने कोई फ़िल्म नहीं देखी थी.

शायद इतने ध्यान से और इतना समझकर देखने की वजह से ही लगा कि ये फ़िल्म किसी 'ब्लाइंड' व्यक्ति की समझ से नहीं बल्कि आंखों में रोशनी रखने वाले की ओर से ही बनाई गई है.

मेरा अनुभव आज क्षण भर का ही सही, पर साफ़ था कि 'ब्लाइंड' लोगों की कहानी इतनी सहज नहीं. उनकी ज़िंदगी को पर्दे पर उतारने के लिए उन्हीं की नज़र और नज़रिए की ज़रूरत होगी.

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