'मेरी एक ही चीज़ में दिलचस्पी है और वो है आग'

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(साल 2017 में कोलकाता स्थित फ़ायरफ़ाइटर बिपिन गनत्रा को भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से नवाज़ा है. बीबीसी ने बिपिन गनत्रा से बातचीत पर आधारित एक लेख 6 मार्च, 2016 को छापा था. गनत्रा बीबीसी की ख़ास सिरीज़ 'हीरो हिंदुस्तानी' का हिस्सा थे.)

कोलकाता में अपने एक कमरे के फ्लैट में पालथी मारकर बैठे बिपिन गनत्रा कहते हैं, "आग आप से बात करती है. आग लाल और नीले रंग में आती है. नीले रंग वाली आग ज़्यादा ख़तरनाक होती है. उसकी आवाज़ आपको बताती है कि ये आग कितनों को निगल जाएगी."

गनत्रा 59 साल के बुज़ुर्ग हैं लेकिन पेशेवर फायरमैन नहीं हैं. वे सातवीं के बाद स्कूल में आगे नहीं पढ़ पाए और जीवनभर उन्होंने अलग-अलग तरह के काम किए हैं- मसलन जूट बेचने वाले के यहां काम, बिजली मिस्त्री और मीटर ठीक करने का काम.

इन कामों से जब फुरसत मिलती है तो वे शहर भर में आग बुझाने का काम करते हैं. करीब 1.5 करोड़ की आबादी वाले कोलकाता में बीते चार दशक के दौरान वे आग लगने की एक सौ से ज़्यादा घटनाएं देख चुके हैं. वे आगजनी के दौरान आग की लपटों को कम करने, लोगों की मदद करने और मलबे को साफ़ करने में योगदान देते हैं.

बिपिन गनत्रा कहते हैं, "आप कह सकते हैं, मेरे जीवन में एक ही चीज़ में दिलचस्पी है. वो है आग."

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500 वर्ग फ़ीट के फ्लैट को देखते हुए आपको महसूस होगा कि ये कुंवारा आदमी अपना सच ही बता रहा है. एक कोने में जर्जर टेबल और पुराने अंदाज़ की कुर्सी रखी है. नीले रंग की दीवार पर एक छोटा सा टीवी भी अटका हुआ है. कम ऊंचाई वाली एक दीवार से कमरा दो भागों में बंटा हुआ है.

दीवार की दूसरी ओर उनके अन्य सामान हैं- प्रमाण पत्र और सम्मान जो उन्हें अब तक के कामों के लिए मिले हैं वह एक दीवार में बने सांचे में रखा हुआ है. एक स्टील की अलमारी है जिसमें गोल शीशा लगा हुआ है. एक नीले रंग की बाल्टी भी है जिसमें केले और दवाइयों- विटामिन, गैस की समस्या के लिए टेबलेट और नींद की गोली रखी हुई है.

गनत्रा ज़्यादा सोते नहीं हैं. वे अपने टीवी पर ख़बरें देखते रहते हैं कि कब कहां आग लगने का पता चल जाए. यह टीवी भी उन्हें दोस्तों ने भेंट किया है. वे दिन रात टीवी पर ख़बरें ही देखते रहते हैं. जब कहीं भी आग लगने की ख़बर का उन्हें पता चलता है कि वे तुरंत फायर ब्रिगेड के मुख्यालय को फ़ोन करते हैं और टैक्सी से वहां के लिए निकल पड़ते हैं.

कोलकाता में आग लगने की घटनाएं ज़्यादा होती हैं. इसे सिटी ऑफ़ फायर भी कहा जाता है. 2014 में ही क़रीब 2000 जगहों पर आग लगने की घटनाएं हुईं और इनमें करीब 347 लोगों की मौत हो गई जबकि 1749 लोग घायल हो गए. बीते साल भी 1600 जगहों पर आग लगने की पुष्टि हुई जिसमें 143 लोगों की मौत हुई जबकि 974 लोग घायल हए.

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इससे अंदाज़ा होता है कि शहर के 1258 फ़ायरमैनों पर काम का कितना दबाव होता है. गनत्रा भी हर दिन कम से कम तीन आग वाली जगहों पर तो जाते ही हैं.

शहर की अग्निशमन विभाग के मुखिया गौर प्रसाद घोष कहते हैं, "उनमें काफी उत्साह है और वह एक बहादुर व्यक्ति हैं. उन्हें फायरफ़ाइटिंग के बारे में आधिकारिक प्रशिक्षण नहीं मिला है, लेकिन वे शानदार ढंग से काम करते हैं. कई बार तो हमारे फ़ायरमैन के लिए वे गाइड की भूमिका में होते हैं. वे हमारे उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं. वे दक्ष पेशेवर की भांति काम करते हैं."

बचपन में जब गनत्रा को दमकल गाड़ियों की घंटियां सुनाई पड़ती थी, तो वे अपना सारा काम छोड़कर उस गाड़ी के पीछे भागते थे. वे दौड़ते हुए वहां पहुंचना चाहते थे, जहां आग लगी हुई होती थी.

वहां पहुंचने के बाद गनत्रा क्या करते थे, इसके बारे में उन्होंने बताया, "वहां मेरे शरीर का हाव-भाव बदल जाता था. मैं वहां फ़ायरमैन को आग बुझाने की कोशिश करते हुए देखता. उनकी मदद करता. वहीं रहता. इससे मुझे अपने जीवन में किक मिलती थी."

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गनत्रा 1976 में सिटी स्कूल में एक मैकेनिक के तौर पर काम करते थे, तब उन्हें एक बड़े बैंक में आग लगने के बारे में पता चला. वे स्कूल से भागकर वहां पहुंचे. वहां उन्होंने फ़ायरमैन की आग बुझाने में मदद की. पास ही स्थित तालाब से पाइप को उन्होंने बैंक की इमारत तक पहुंचाने में मदद की.

वे इस दौरान हुए एक हादसे को आज तक नहीं भूले हैं. वे बताते हैं, "इस घटना की एक याद मुझे आज भी जीवंत हैं. बैंक मैनेजर इमारत से बाहर आ गया था, लेकिन फिर रुक गया. वह कोई चीज़ भूल गए थे, वे उसे लाने वापस चले गए और कभी लौट कर नहीं आए."

इसके बाद बिपिन गनत्रा ने मुड़कर नहीं देखा. सिटी के मशहूर हावड़ा ब्रिज में 1990 के दशक के शुरुआती दिनों में आग लगी, तब गैस टैंकर पलट गया था. उन्होंने आग बुझाने वाले फायरमैन को ट्रैफिक नियंत्रण करने में मदद की.

कोलकाता के कैनिंग स्ट्रीट की चार मंजिली इमारत में जब आग लगी तो उन्होंने एक गर्भवती महिला को टैरस पर कूदने से बचाया. उन्होंने फायरमैन की मदद से एक स्ट्रैचर महिला तक पहुंचाई और उन्हें 10 फ़ीट दूर दूसरी छत पर पहुंचाने में मदद की.

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पांच साल पहले गनत्रा की जान जाते-जाते बची थी, जब वे स्ट्रैंड रोड पर स्थित वेयर हाउस की आग की चपेट में आते-आते बचे. वे 15 किलोग्राम के दो गैस सिलेंडर को बाहर लेकर आए फिर इसके बाद होजपाइप के साथ अंदर गए. इसके बाद उन्होंने 30 फ़ीट की दीवार को ढहते हुए देखा और वे होजपाइप से निकल नहीं पाए. वे दो घंटे तक मलबे में फंसे रहे.

उन्होंने कहा, "बाहर स्थित फ़ायरमैन ने मुझे मरा हुआ समझ लिया था. हालांकि मुझे बाहर निकाला गया और कुछ चोटों के निशान बन गए थे. लेकिन अस्पताल में मेरे स्वास्थ्य में तेज़ी से सुधार आया. मैं काफ़ी लकी रहा."

आग से लड़ाई काफ़ी मुश्किल होती है और कई बार लोगों को अपनी चपेट में ले लेती है. ऐसे में गनत्रा को साथी फ़ायरमैन के साथ शवों को भी निकालना होता है.

2010 में स्टीफ़न कोर्ट की छठी मंजिल में आग लगी तो गनत्रा पहली मंजिल पर पहुंच गए थे. वे वहां तीसरी मंजिल से कूद रहे एक शख़्स को नहीं बचा पाए थे. वे बताते हैं, "मैं चीख रहा था कि तुम कूदना मत. तुम तक मदद पहुंच रही है. लेकिन वह कूद गया, धमाके की तरह आवाज़ हुई और सब जगह ख़ून फैल गया."

वे आगे बताते हैं, "मुझे याद है कि इस हादसे में मैंने एक महिला के जले हुए शव को भी बाहर निकाला था. उनके गले में इंडियन एयरलाइंस का आईडी कार्ड था. आग में कई बार विचित्र चीज़ें बच जाती हैं."

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इस हादसे में करीब 40 लोगों की मौत हो गई थी. गनत्रा बताते हैं, "कुछ शव जले हुए थे, तो कुछ कुचले हुए. हर जगह मौत की गंध फैली हुई थी."

2011 में इसी तरह एक अस्पताल में आग लगी थी, जिसमें 89 मरीज़ों की मौत हो गई थी. वे जीवितों की तलाश में चार मंजिल तक चढ़ गए. सीढ़ियां धुंए से भरी हुई थी, उनका दम घुटने लगा था, उबकाई हो रही थी, तब उन्हें एक शख़्स जीवित मिला था.

गनत्रा इस हादसे के बारे में बताते हैं, "इस हादसे में भी कई मरीजों की मौत हो गई थी. सब मरीज थे. जो अपने बेड से गिर गए थे और उनकी मौत हो घई थी. आईसीयू में ऐसा था. एक वार्ड धुएं से भरा हुआ था, वहां भी छह से सात शव फ्लोर पर बिखरे थे, बेड पर थे."

बहरहाल, अब इन सब पर सोचने का वक़्त नहीं था क्योंकि टीवी पर शहर के एक कोने में आग लगने की ख़बर फ्लैश होने लगी थी.

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गनत्रा अपनी 21 साल पुरानी खाकी की वर्दी को पहनने लगे. यह उन्हें अग्निशमन विभाग के अधिकारी ने तोहफे में दी थी. उन्होंने अपना पीला प्लास्टिक का हैट पहना और सेफ्टी टॉर्च ले लिया. उनके पास एक मैटेलिक वालेंटियर आईडेंटिटी कार्ड भी है, जो उन्हें एक पूर्व मंत्री ने दिया था.

इसके बाद वे आग लगने की जगह के लिए निकल पड़ते हैं. गनात्रा की ज़रूरतें दोस्तों की मदद से पूरी होती है जो उन्हें हर महीने क़रीब ढाई हज़ार रूपये की मदद करते हैं.

शहर अपनी रफ़्तार से चल रहा है और गनत्रा वहां पहुंच जाते हैं जहां आग लगी हुई है. वे कहते हैं, "मैं आग की सुनता हूं. इसके बाद उस पर काबू पाने की कोशिश करता हूं. मैं पानी का पाइप पकड़ता हूं. अगर आग मेरी तरफ आती है तो मैं जमीन पर कूद जाता हूं उसे जाने देता हूं. आप उसे बढ़ने से रोक नहीं सकते हैं. कभी नहीं. केवल काबू में करने की कोशिश कर सकते हैं."

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