अपनी मनमर्ज़ी से क्यों न सजें-संवरें कामकाजी महिलाएँ

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लंदन की संसद ने उन कंपनियों पर जुर्माना लगाने की बात कही है जहां महिलाओं के लिए मनमाना ड्रेस कोड है.

दरअसल लंदन की एक रिसेप्शनिस्ट को ऊंची एड़ी की सैंडल पहनने से मना करने पर ऑफ़िस से घर भेज दिया गया.

निकोला थ्रोप ने इस भेदभाव भरे ड्रेस कोड को चुनौती दी और याचिका दायर की. इस पर अब तक डेढ़ लाख लोगों ने दस्तखत कर चुके हैं.

कपड़े और दूसरी चीजों को लेकर काम की जगह पर टीका-टिप्पणी और अनलिखा कोड भारत में भी दिखाई देता है.

चाहे वह बड़ी बिंदी हो या जूड़े में अटका फूल, फटी जीन्स या टैंक टॉप, घुंघरू वाली चप्पल या टिक-टॉक करती हिल्स. साजगार हम सबके जीवन में रंग और राग बिखेरता है.

ये रंग बेमानी और राग बेसुरा लगता है जब ये सजना-संवरना अपनी मनमर्ज़ी का ना हो.

छोटे-बड़े शहरों की लड़कियों ने जीन्स पहनने और चुन्नी न ओढ़ने के लिए जाने कितनी लड़ाइयां जीती और हारी हैं. ऐसे में जब किसी दफ्तर या क्लब का दखल हमारे ड्रेसिंग टेबल तक पहुँचता है, तो लगता है कि "लुक्स" को लेकर ऊहापोह अभी ख़त्म नहीं हुई है.

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बारह साल पहले, दिल्ली में एक अंग्रेजी अखबार के दफ्तर में एक दिन. मैं सरोजिनी नगर से खरीदा "बड़े-गले वाला टॉप" पहन कर दफ्तर पहुंची.

कुछ देर बाद एक सीनियर महिला सहकर्मी ने अपने कमरे में बुलाया. हंसी-ठट्ठा करते हुए पूछा, 'आज किसी को काम नहीं करने दोगी क्या?' मैंने भी मज़ाकिया जवाब देकर बात को रफा-दफा करने की कोशिश की.

वह सहकर्मी अचानक गंभीर हो गईं. मुझसे 4-5 साल उम्र में बड़ी इस सहकर्मी ने समझाने की कोशिश की मुझे दिल्ली को अभी समझने में समय लगेगा. वे मुझे दफ्तर के नीचे वाले मार्किट में ले जा कर एक चुन्नी खरीदवा लायीं.

मुझे कुछ समय लगा ये समझने में कि ये बात मुझे बुरी लग रही है. चुन्नी खरीद तो लाई पर ओढ़ नहीं पायी. अंदर से मन एक अजीब से अवसाद और गुस्से से भर गया. कुछ समय बाद मैं उनके कमरे में वापस काम के सिलसिले में वैसे ही पहुंची जैसे मैं दफ्तर आयी थी, बिना चुन्नी के.

इस घटना के बाद वह सीनियर मुझसे 2-3 दिन नाराज़ रहीं.

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बात सिर्फ फॉर्मल सेटिंग्स की नहीं है, कई अनौपचारिक बैठकों में भी बातचीत का रुख कई बार आपकी वेशभूषा तय करती है. इस बात में मुझे अमरीका भारत से ज़्यादा अनुशासित लगा. फॉर्मल सेटिंग्स में आपका भीड़ से अलग लगना लोगों को अक्सर चौंका देता है.

याद है सनफ्रांसिस्को की पार्टीज. वहां के ड्रेस कोड के हिसाब से हमेशा ज़्यादा रंगीन कपड़े में शामिल होना, और अंत में भारत और यहाँ के कलरफुल कल्चर पे बात का आ जाना. वहां मेरे अलावा एक या दो लोग ही अपनी मर्ज़ी के कपड़ों में होते.

वहीं बेंगलुरू में ऐसे डिफाइंड रूल्स कम हैं, पर हिडन रूल्स ज़्यादा हैं. मैं जब भी कुर्ते-सलवार में किसी कॉरपोरेट वर्ल्ड की पार्टी में होती हूँ तो अक्सर मुझसे पहला सवाल पति और बच्चों के बारे होता है, वहीं जब वेस्टर्न कपड़ों में होती हूँ, तो लोग मेरे काम और करियर के बारे में पूछते हैं.

बिंदी बॉटम्स वेबसाइट के लिए एक कहानी करते हुए एक लड़की मिली फौन्सी. मदुरई में पली बढ़ी फौन्सी एयरपोर्ट पर काम करती है और पैंट-शर्ट उनके ऑफिस का ड्रेस कोड है.

काम शुरू करने के पहले फौन्सी ने कभी भी ऐसे कपड़े नहीं पहने थे और पहले दिन खुद को असहज पा रही थीं. जब उन्होंने अपनी शर्ट के ऊपर एक ऊनी चुन्नी डाली, तो साथ काम करने वाली कई लड़कियों ने उनको "बहन जी" बुलाया. कइयों ने उनको जल्दी से खुद को "आधुनिक" वेश-भूषा में ढाल लेने की सलाह दी.

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आखिर ये "आधुनिक" और "परंपरागत" वेश भूषा है क्या? क्या हमारा पहनावा हमारे इंटेलेक्ट की निशानी है?

यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया के ऑडियो प्रोजेक्ट रिप्रेजेंट के लिए कहानियां-किस्से ढूंढते बिहार के कई गांव-कस्बों में कई लड़कियां मिलीं,स्कूल-कॉलेज वाली, और सबके सवाल अमूमन एक जैसे थे, "दीदी, क्या आप अमरीका में भी सलवार-कुर्ता पहनती हैं? आपने यहाँ जीन्स क्यों नहीं पहनी? और सिंदूर क्यों नहीं लगाती जब आपकी शादी हो गई?"

ये सवाल मुझसे शिकायती लहज़े में नहीं पूछे जा रहे थे, बल्कि एक उम्मीद के साथ पूछे जा रहे थे. उम्मीद थी की जब ये अपनी पसंद का सब कर पाती हैं तो ज़रा जाना जाए कैसे?

गांव और शहर की कपड़ों को लेकर अपनी लड़ाइयां हैं. आजकल गांवों में खास मौकों पर वेस्टर्न पहनना आधुनिक होने की निशानी है वहीं शहरों में परंपरागत कपड़े आपकी गहरी सोच-समझ की.

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पहनने-ओढ़ने का मामला समाज और संस्कृति की बुनावट समझने का एक टूल हो सकता है ये कतई नहीं तय कर सकता कि हम अपने काम या जीवन में कैसे हैं? मेरी बड़ी बिंदी मेरे एक्टिविस्ट होने का सबूत नहीं हो सकती या मेरी मिनी स्कर्ट मेरे आधुनिक विचारधारा की निशानी.

किसी लड़के की काली टर्टल नैक टी-शर्ट उसको एक एन्टेर्प्रेनुएर या उसका कुर्ता उसको लेखक के रूप में पहचान नहीं दे सकता.

अपनी पहचान के लिए हम सबको मेहनत करनी होगी. पैरहन की रंगत तभी चटख होगी जब अंदर का रंग गहरा होगा.

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