नज़रिया: भारतीय मुसलमानों की व्यवस्था में कितनी आस्था

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भारतीय गणराज्य के साथ मुसलमानों के जुड़ाव को लेकर एक दूसरे से विपरीत दो दलीलें अक्सर दी जाती हैं.

एक मज़बूत दावा है कि मुसलमानों को अलग धार्मिक गुट या अल्पसंख्यक मानने के बजाय गणतंत्र का आम नागरिक माना जाना चाहिए.

हाल के वर्षों में राष्ट्रवाद के लोकप्रिय नैरेटिव के साथ ये ख़्याल और भी ज़ोर पकड़ने लगा है. इस नए विचारधारा के तहत एक राष्ट्र, एक संविधान के साथ-साथ इस बात की भी वकालत की जा रही है कि देशभक्त होने के नाते सारे नागरिक भी एक ही हैं.

लेकिन इसके साथ ही एक और बात पुरज़ोर ढंग से कही जाती है. वो ये कि एकदम हाशिये पर रहने वाला मुसलमान समुदाय सांप्रदायिकता और सुनियोजित बहिष्कार का शिकार है. इसलिए 'मुसलमानों की शिकायत' को दूर किया जाना चाहिए और उन्हें राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में 'शामिल' किया जाना चाहिए.

कोई भी इस बात से शायद इनकार नहीं कर सकता कि 1947 में भारत के आज़ाद होने के बाद से मुस्लिम समुदाय दूसरे समुदायों की तुलना में काफ़ी पिछड़ा हुआ है.

लेकिन इन दोनों दावों के साथ मुश्किल ये है कि ये दोनों नज़रिए भारत के सारे मुसलमानों को एक इकाई के रूप में देखते हैं.

इन दोनों ही दावों में इस बात का ज़िक्र नहीं होता कि भारत के मुसलमान भी जाति, वर्ग, और क्षेत्र के आधार पर बंटे हुए हैं.

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इसका नतीजा ये है कि मुसलमानों को या तो सरकार( ख़ासकर कांग्रेस सरकार) के बेहद चहेते समुदाय के तौर पर देखा जाता है या फिर कोई उन्हें देशद्रोही और अलगाववादी के रुप में देखता है. ख़ुद मुसलमानों का एक हिस्सा ख़ुद को पीड़ित और दूसरे दर्जे के नागरिक के रुप में देखता है.

लेकिन अगर हमें ये जानना है कि मुसलमान भारतीय गणराज्य को किस तरह से देखते हैं तो सबसे पहले ज़रुरत इस बात की है कि मुसलमानों के बारे में जिन आम धारणाओं का ज़िक्र उपर किया गया है हम उनसे बाहर निकलें.

इसके लिए लोगों को राष्ट्रवाद के नारों और गणतंत्रवाद की हक़ीक़त का फ़र्क़ समझना होगा.

तीन तलाक पर क्या सोचते हैं मुसलमान

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फ़राह ख़ान के पति से पूछा: आपके बच्चे हिंदू हैं या मुसलमान?'

सुप्रीम कोर्ट ने विख्यात केशवानंद भारती मामले (4SCC225/1973) में गणतंत्रवाद को भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे का प्रतीक बताया था, जिसे बहुमत से चुनी हुई सरकार भी न तो बदल सकती है न उसमें संविधान संशोधन के ज़रिए सुधार कर सकती है.

भारतीय गणतंत्र की पांच विशेषताओं की बात की जाए तो -संविधान की प्रभुसत्ता, लोकतांत्रिक सरकार, धर्मनिरपेक्षता, शक्तियों का विभाजन और संघवाद सबसे अहम हैं. कोर्ट के मुताबिक़ गणतंत्र की य़े ख़ासियत इस बात से निकलकर आती है कि क़ानून की नज़र में सभी नागरिक बराबर हैं.

इसी समझ के साथ इस बात की जांच की जा सकती है कि मुसलमानों की नज़र में भारतीय गणराज्य का सपना आख़िर क्या है.

दूसरे शब्दों में हम सीधे सवाल पूछ सकते हैं- 'क्या मुसलमान भारत गणराज्य की संस्थाओं पर भरोसा रखते हैं? अगर हां, तो फिर सवाल ये उठता है कि मुसलमान अपनी राजनीतिक मांगों को कैसे उठाते हैं?

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67 साल बाद भी दलितों को क्या मिला है?

हाल ही में सीएसडीएस-लोकनीति रिपोर्ट 'डेमक्रैसी इन इंडिया: अ सिटिज़ंस पर्सपेक्टिव' (2015) से हमें 'संस्थाओं में उनके इस भरोसे' के बारे में कुछ दिलचस्प बातें पता चलती हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक़ मुसलमान दूसरे सामाजिक समुदायों की तरह न सिर्फ़ लोकतंत्र को ख़ूब पसंद करते हैं (कुल के 62 प्रतिशत) बल्कि संसद, प्रशासन, पुलिस, और कोर्ट जैसी राजनीतिक संस्थाओं में मज़बूत भरोसा (कुल के 66 प्रतिशत) रखते हैं.

लेकिन संस्थाओं में मुसलमानों का भरोसा पूरी तरह से बिना शर्त नहीं है.

हाशिये पर खड़े सामाजिक समुदाय, ख़ासतौर से ग़रीब मुसलमान, अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय लोकतंत्र को वह तरीक़ा मानते हैं, जिनके ज़रिए वो अपनी राजनीतिक मांगें बयां कर सकते हैं. शायद यही वजह है कि इस रिपोर्ट में ये पाया गया कि लोगों के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी लोकतंत्र की सबसे मज़बूत पहचान है.

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इससे हम मुस्लिम राजनीति की भाषा तक पहुँचते हैं. अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर बहस आज़ादी के बाद से मुस्लिम राजनीति की शक्लो-सूरत तय करती दिखती है.

ऊंचे तबक़े के मुसलमान अपनी राजनीतिक मांग को क़ानून की भाषा में समझते हैं.

बाबरी मस्जिद विवाद पर उनका रवैया इसका अच्छा उदाहरण है. ऑल इंडिया बाबरी मस्जिद कांफ्रेंस ने 1986 में दिल्ली घोषणा के तहत कहा था कि बाबरी मस्जिद भारत की राष्ट्रीय विरासत का हिस्सा है और इसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जोड़ा था.

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हाशिये पर मौजूद (पसमांदा) मुसलमान भी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए इसी तरह का हवाला देते हैं . मुसलमानों और ईसाइयों की 'दलित' जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग भी यही बताती है कि जाति आधारित शोषण केवल किसी एक धार्मिक समुदाय का मामला नहीं है.

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इस बाबत कुछ पसमांदा मुस्लिम समुदायों का घोषणापत्र 'द पॉलिटिकल एजेंडा ऑफ़ पसमांदा मुस्लिम्स इन लोकसभा इलेक्शंस, 2014' यहां काफ़ी मौजूं है.

इस घोषणा पत्र में सरकार से मांग रखी गई कि केंद्र और राज्य के स्तर पर अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के भीतर आरक्षण का प्रावधान हो, जिसमें बेहद पिछड़े मुस्लिम समुदाय को भी हिंदू समुदाय के ऐसे ही पिछड़े जाति वर्गों के बराबर रखा जा सके. ये मांग कांग्रेस पार्टी की ओर से लोकसभा चुनाव में ओबीसी अल्पसंख्यकों के लिए 4.5 फ़ीसदी आरक्षण मांगने के मुक़ाबले ज़्यादा न्यायिक और ग़ैर-सांप्रदायिक है.

पिछड़ी जातियों में से अत्यंत पिछड़ी जातियों के लिए कोटे की मांग सांप्रदायिकता और पिछड़ेपन के बीच अहम कड़ी है. मुसलमानों के पिछड़ेपन से निपटने के लिए ये एक धर्मनिरपेक्ष मांग है.

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संस्थाओं में मुसलमानों का भरोसा, क़ानूनी तौर पर मुस्लिम राजनीतिक मांगों का सामने आना और सकारात्मक पहल को धर्मनिरपेक्ष बनाना, ये तीन उदाहरण मुस्लिम समुदाय की भारतीय गणतंत्रवाद से जटिल रिश्तों की ओर ध्यान दिलाते हैं.

ये उदाहरण भारतीय गणतंत्र और मुसलमानों के बीच रिश्ते को दर्शाते ज़रूर हैं लेकिन इसको बहुत बढ़ा-चढ़ा कर भी नहीं देखा जा सकता है.

लेकिन इससे मोटे तौर पर इस बात का अंदाज़ा तो लगाया ही जा सकता है कि मुस्लिम समाज भारतीय गणतंत्र को कैसे देखता है.

अगर भारतीय गणतंत्र और मुसलमानों के रिश्ते को इस तरह से समझने की कोशिश की जाएगी तो मुझे यक़ीन है कि इसके बाद शायद कोई ये सवाल नहीं पूछेगा कि 'आप भारतीय हैं या मुसलमान?'

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