नज़रिया: राहुल की मदद के लिए कुछ भी करेंगी प्रियंका

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प्रियंका गांधी ने 24 अप्रैल 2009 में बरखा दत्त से कहा था, "सच कहूं तो मैं यक़ीनी तौर पर ये नहीं कह सकती कि मैंने ख़ुद के बारे में सब कुछ जान लिया है, लेकिन इस बात पर मेरी समझदारी साफ़ है कि मैं राजनीति में नहीं जाना चाहती. मैं जैसी हूं मैं अपनी ज़िंदगी में बहुत ख़ुश हूं. मुझे लगता है कि राजनीति के कुछ ऐसे पहलू हैं जिनके लिए मैं नहीं बनी हूं."

कांग्रेसी इस बात को लेकर निश्चित नहीं थे कि प्रियंका अपने बयान पर क़ायम रहेंगी या नहीं.

सपा के साथ गठबंधन में प्रियंका का हाथ

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आज जब उत्तर प्रदेश के समर के लिए प्रियंका का नाम स्टार प्रचारकों की आधिकारिक सूची में आ गया है तो उनके चेहरे पर एक मुस्कान दौड़ गई है.

ये घटनाक्रम उस ट्वीट के तुरंत बाद देखने को मिला जिसे लिखा था कांग्रेस के कद्दावर नेता अहमद पटेल ने, जो अपनी सधी हुई प्रतिक्रिया और पार्टी में बड़े ओहदे के लिए जाने जाते हैं.

जब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीटों को लेकर बातचीत खटाई में पड़ गई तब पटेल ने ट्वीट किया था, "ये कहना ग़लत है कि सीटों पर बातचीत के लिए कांग्रेस की तरफ से हल्के लोग शामिल थे. वार्ता उच्च स्तर पर हो रही थी, जिसमें सीएम (यूपी), कांग्रेस महासचिव और प्रियंका गांधी थे."

लखनऊ के मॉल एवेन्यू, नेहरू भवन में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमिटी के दफ़्तर और नई दिल्ली में 24 अकबर रोड पार्टी के मुख्यालय में कई लोगों को पटेल के शब्दों से राहत और तसल्ली मिली.

पटेल के ट्वीट ने आधिकारिक तौर पर ये संदेश दिया कि प्रियंका गांधी आख़िरकार सक्रिय राजनीति में आ गईं हैं और उन सबके बीच मौजूद हैं.

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पहली नज़र में ऐसा लगता है कि प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ हुए गठबंधन की कर्ताधर्ता के तौर पर पेश करना कांग्रेस की एक रणनीति है, जिसका मक़सद ये है कि अगर 11 मार्च को यूपी में प्रयोग विफल हो जाता है तो अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के नामित अध्यक्ष राहुल गांधी का बचाव किया जा सके.

ये सच जगज़ाहिर है कि सपा के साथ हुए गठबंधन से कांग्रेस में हर कोई सहज महसूस नहीं कर रहा है.

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन दोनों पार्टियों के लिए कभी भी फ़ायदेमंद नहीं रहा है. इसलिए एक योजनाबद्ध रणनीति के तहत प्रियंका को पेश किया जा रहा है.

दूसरे स्तर पर देखें तो ऐसा करना उत्तर प्रदेश में एक तरह से हतोत्साहित और निर्जीव हो चुकी कांग्रेस को ख़ुश होने की कुछ वजह दे रही है. अगर यूपी में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहता है और पंजाब या उत्तराखंड में जीत का स्वाद चखने को मिलता है, तो प्रियंका और राहुल की जोड़ी चर्चा में आ जाएगी.

कांग्रेस का एक समृद्धशाली इतिहास है जिसमें नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों ने एक "जोड़ी" की तरह काम किया है.

अगर प्रियंका राजनीति में आ भी गईं तो, तो ये ऐसी पहली बार नहीं होगा कि दोनों परिवार के लोग एक साथ पार्टी के बड़े पदों पर होंगे.

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1959 में इंदिरा कांग्रेस अध्यक्ष बनीं जब पिता जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे, जिससे पार्टी में कई लोगों को आश्चर्य हुआ.

नेहरू के आलोचकों ने इस घटना को इस तौर पर देखा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री ने एक प्रतिष्ठित पद के लिए अपनी बेटी के नाम को आगे बढ़ाया है.

लेकिन उस दौर के कांग्रेसियों के एक बड़े वर्ग ने ऐसा महसूस किया कि इंदिरा ने अपनी योग्यता के दम पर पद पाया. ऐसा कहने के लिए उनके पास तर्क थे.

एआईसीसी अध्यक्ष के तौर पर इंदिरा ने केरल संकट को सुलझाया. उन्होंने महाराष्ट्र और गुजरात बनाने का सुझाव दिया जिससे वहां की भाषाई समस्या को ख़त्म किया जा सके.

जब 1960 में उनका कार्यकाल ख़त्म हुआ, तो कांग्रेस कार्यसमिति ने इंदिरा को दोबारा अध्यक्ष पद के लिए खड़ा करने की बहुत कोशिशें की लेकिन उन्होंने दृढ़ता से इंकार कर दिया.

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संजय गांधी के 1974 से 1980 के दौरान एआईसीसी के महासचिव के रूप में एक संक्षिप्त कार्यकाल के अलावा वो कांग्रेस में किसी औपचारिक पद के लिए नहीं खड़े हुए, लेकिन कई संगठनात्मक और प्रशासनिक मामलों में उनका कद इंदिरा के बराबर माना जाता था.

वास्तव में जून 1980 में एक जानलेवा हवाई दुर्घटना में उनकी मौत से कई हफ़्ते पहले उनके सहयोगी राम चंद्र रथ, संजय को पार्टी अध्यक्ष के रूप में देख रहे थे.

रथ कहा करते थे, "सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू बहुत कम उम्र में एआईसीसी के अध्यक्ष बने.

इसलिए अगर पार्टी उन्हें अध्यक्ष चुनती है तो ये पूरी तरह से लोकतांत्रिक है. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है."

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संजय के भाई राजीव गांधी 1983 में एआईसीसी के महासचिव बने जब इंदिरा प्रधानमंत्री थीं.

उन्हें 24 अकबर रोड में इंदिरा के बगल में एक कमरा दिया गया.

राजीव की बात की अहमियत सबसे ज़्यादा थी और इंदिरा मंत्रिमंडल के ज़्यादातर मंत्री अक्सर उनके दफ़्तर के बाहर इंतज़ार करते हुए देखे जाते थे.

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2006 से 2014 तक काम के मामले में सोनिया के ख़ुद के संबंध राहुल के साथ साफ़तौर पर अगल देखे गए, जब यूपीए सरकार में राहुल की टीम के लोगों (जैसे अजय माकन, आर.पी.एन सिंह, मिलिंद देवड़ा, सचिन पायलट जैसे युवा लोगों के) अलावा किसी भी अन्य मंत्रियों को राहुल से मिलने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता था.

तो इसके बाद आगे क्या होगा?

अब तक प्रियंका ने अपनी तरफ से एक सधी हुई चुप्पी क़ायम कर रखी है. हालांकि उनका ट्विटर एकांउट उन्हें सही मायनों में एक "राजनेता" करार देता है, वे एक मां हैं, घर को संजोकर रखने वाली गृहणी हैं और कांग्रेस की एक शुभचिंतक हैं. उन्होंने बार बार सक्रिय राजनीति से दूर रहने की वजहों के बारे में बताया है.

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यूपीए के 10 सालों के शासनकाल (2004-14) में राहुल के सियासी कद में इज़ाफ़ा नहीं हुआ. बल्कि इस समय ने कुछ हद तक एक होनहार राजनेता को भ्रमित, अनिच्छुक और अक्सर अगंभीर दिखनेवाला व्यक्ति बना दिया.

इन अर्थों में राहुल का पहला काम होना चाहिए कि वे एक विश्वसनीय और चौबीसों घंटे वाले राजनेता के आभामंडल को दोबारा हासिल करें.

संक्षेप में कहें तो राहुल के सामने मौजूद कार्य चुनौतीपूर्ण और कठिन है. इस वक़्त उन्हें अपने पार्टी के साथियों का सम्मान हासिल करने और इस सबसे पुरानी पार्टी के सामने मौजूद नेतृत्व के मुद्दे को सुलझाने की ज़रूरत है.

11 मार्च 2017 के फ़ैसले के बाद भी सफलता हासिल करने के लिए हर पड़ाव पर राहुल को प्रियंका की ज़रूरत पड़ेगी.

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प्रियंका लगातार कहती रहीं हैं, "मैं अपने भाई की मदद के लिए सब कुछ करूंगी... मैं कुछ भी करूंगी जिसकी उन्हें ज़रूरत हैं."

मेरी समझ से प्रियंका की पूरी राजनीति राहुल को सफल बनाने के ईर्द-गिर्द घूमती है. अगर इसके लिए उन्हें औपचारिक रूप से राजनीति में आना पड़ा, तो छोटी बहन ऐसा करने के लिए बिल्कुल तैयार हैं इसे भुलाकर भी कि उन्होंने बरखा दत्त से आठ सालों पहले क्या कहा था.

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