'किन्नरों ने धमकाया था, मैं सर्जरी न कराऊं'

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Image caption अंकिता कनवरे

मैं अपनी ज़िंदगी के बारे में हमेशा सोचती थी कि मैं तो एक ट्रांसजेंडर हूं, क्या कभी मैं लड़की बन पाउंगी ? मुझको हमेशा आधा-अधूरा जैसा लगता था.

आठ साल की थी मैं, जब मुझे पहली बार समझ में आया कि मैं एक लड़के की तरह तो हूं, लेकिन मेरे भीतर की सारी भावनाएं लड़कियों जैसी थी. आप इसे इस तरह कह सकते हैं कि मेरा शरीर लड़के जैसा था और आत्मा लड़कियों जैसी.

लड़कियों के साथ खाना-पीना, उनके साथ नहाना, उठना-बैठना मुझे पसंद था. लड़कियों की तरह कपड़े पहनना मुझे अच्छा लगता था.

घर वाले मेरी स्थिति को समझ रहे थे, यही कारण है कि उन्होंने मुझे लड़कियों की तरह ही रहने की इजाज़त दे दी. यहां तक कि मेरा दाखिला भी लड़कियों वाले स्कूल में ही हुआ.

14-15 साल की उम्र हुई तो लगने लगा कि किसी लड़के के साथ घूमूं. किसी लड़के से प्यार करूं, उसके साथ शादी करूं.

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लेकिन यह सब केवल सोचने तक ही रहा. आठवीं के बाद पढ़ाई छूट गई और उसके बाद मैं घर के भीतर रहने लग गई.

मैं दूसरे किन्नरों की तरह बधाई मांगने नहीं जाती थी. ट्रेनों में भी दूसरे किन्नरों की तरह यात्रियों से पैसा मांगने का काम भी मैंने नहीं किया.

थर्ड जेंडर को लोग हिजड़ा, किन्नर, मामू, छक्का जैसे नामों से पुकारते हैं और उन पर हंसते भी हैं. लेकिन उनको कभी इंसानों की तरह देखने-समझने की कोशिश नहीं की गई. वे समाज में आज भी अकेले हैं.

मैं भी घर में सिमट कर रह गई थी. कहीं बाहर आना-जाना नहीं होता था. हां कभी-कभार रिश्तेदारों के यहां और कभी-कभी किन्नर समाज के आयोजनों में जाती थी.

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Image caption अंकिता कनवरे पति के साथ

किन्नर समुदाय के लिए काम करने वाली मितवा संगठन के ऐसे ही एक आयोजन में मेरी मुलाकात संपत (बदला हुआ नाम) से हुई. संपत वहां बतौर दर्शक पहुंचे थे.

आंखों ही आंखों में एक-दूसरे को समझने की कोशिश हुई.

हम दोनों का मिलना-जुलना शुरू हुआ, लेकिन मैंने संपत को पहले ही साफ़-साफ़ बता दिया कि मैं एक ट्रांसजेंडर हूं, लड़की नहीं हूं.

संपत सच में मुझे चाहते थे.

हम अपने परिवार वालों और ज़माने की नज़रों से बचकर छुपते-छुपाते एक दूसरे से मिलते रहे. कभी गार्डन में, कभी मॉल में. एकाध बार साथ में फ़िल्म भी देखी.

अंततः मैंने और संपत ने मंदिर में शादी कर ली. मैंने घर वालों को बताया और फिर अपने पति के साथ अलग घर में रहने चली आई.

कुछ पारिवारिक कारणों से संपत ने अभी सामाजिक रूप से इस विवाह को सार्वजनिक नहीं किया है. लेकिन हम दोनों के परिवार के लोग हमारे रिश्ते को स्वीकार कर चुके हैं.

मन की ज़रूरतें अपनी जगह हैं, शरीर की अपनी जगह. जब हम पति-पत्नी की बात करते हैं तो वहां देह ज़रूरी होता है. मेरे लिये इस उलझन को सुलझा पाना आसान नहीं था.

इस बीच छत्तीसगढ़ में सरकार ने एसआरएस यानी सेक्स री-असाइनमेंट सर्जरी को लेकर काम करना शुरू किया तो मुझे उम्मीद जगी. कई महीनों तक तरह-तरह की प्रक्रिया से गुजरी. मेरी काउंसिलिंग हुई, मुझे विस्तार से सब कुछ बताया गया.

मैं और मेरे पति संपत ख़ुश थे कि अब हमारी दुनिया बदलने वाली है. लेकिन यह सब इतना आसान नहीं थी.

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9 दिसंबर 2016 को रायपुर के डॉक्टर भीमराव अंबेडकर अस्पताल में जब मेरे ऑपरेशन की तैयारी शुरु हुई तो वहां किन्नरों का एक बड़ा समूह पहुंच गया.

उन्होंने मुझे धमकाया कि मैं अपनी सर्जरी नहीं करवाऊं. उन्होंने डॉक्टरों और नर्सों को भी जान से मारने की धमकी दी. बाद में जब पुलिस को ख़बर की गई तब कहीं जाकर वे अस्पताल से भागे.

अगले दिन ऑपरेशन से कुछ ही घंटे पहले फिर से किन्नरों का एक दल अस्पताल पहुंचा और हंगामा शुरू हुआ. मुझे लगा कि अब शायद मैं कभी भी अपनी सर्जरी नहीं करवा पाउंगी.

लेकिन पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति संभाली और फिर कहीं जाकर मेरा ऑपरेशन हुआ.

इस ऑपरेशन का एक महीने पूरा हो चुका है और मैं जानती हूं कि अब मैं पूरी तरह से एक औरत बन चुकी हूं.

मैं और मेरे पति अब बहुत ख़ुश हैं. मैं अपने मुहल्ले में ही एक घर में रसोइए का काम करती हूं और चाहती हूं कि काम के बाद पूरे समय अपने घर में, अपने परिवार के साथ रहूं. मेरे पति भी यही चाहते हैं.

हां, मां बनना हर औरत का एक सपना होता है.

मैं मां नहीं बन पाउंगी लेकिन मैंने और मेरे पति ने तय किया है कि हम एक बच्चा गोद लेंगे.

आख़िर पैदा करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है किसी बच्चे की ठीक-ठीक परवरिश. हम ऐसा कर पायेंगे, इसका मुझे पूरा विश्वास है.

(पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल से बातचीत पर आधारित)

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