नज़रिया- 'इसलिए हमारे इतिहास का हिस्सा है पद्मावती'

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Image caption पद्मावती का किरदार - कल्पना या ऐतिहासिक हक़ीकत?

संजय लीला भंसाली की आने वाली फ़िल्म पद्मावती के कारण इस किरदार के होने और न होने पर खूब बहस हो रही है.

जहाँ कुछ इतिहासकारों का ये मानना है कि पद्मावती एक साहित्यिक किरदार है, वहीं कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि साहित्य इतिहास से बिल्कुल अलहदा नहीं होता है.

इसी मुद्दे पर दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफ़ेसर रज़ीउद्दीन अक़ील से बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन ने बात की.

प्रोफ़ेसर रज़ीउद्दीन अक़ील के अनुसार-

1540 ईस्वी में शेरशाह का ज़माना था और उसी वक़्त मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत की रचना की थी. तब शेरशाह उत्तर भारत में अफ़गानों का एक बड़ा साम्राज्य स्थापित कर रहे थे. बाबर के बाद हुमायूं को खदेड़ते हुए ईरान की सीमा तक पहुंचाकर शेरशाह ने अपने साम्राज्य की स्थापना की थी.

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जायसी चिश्ती सूफी थे. चिश्तियों ने हिन्दुस्तान के लोगों को जोड़ने का काम किया था. उन्होंने ऐसी जुबान में बोलना और लिखना शुरू किया था, जिसे आम लोग समझ सकते थे. जायसी ने पद्मावत ठेठ अवधि भाषा में लिखी थी. अवधि भाषा उस ज़माने के हिन्दू, मुसलमान सभी समझते थे.

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Image caption पद्मावती की किरदार में हैं दीपिका पादुकोण

राजा रतनसेन और पद्मावती में था प्रेम

पद्मावत में राजा रतनसेन और पद्मावती का जो प्रेम प्रसंग है, उसको जायसी ने सूफ़ियों के तरीके से लिखा था. ख़ुदा के लिए सब कुछ न्योछावर कर देना सूफ़ियों का तरीका रहा है. पद्मावत में इसी कोशिश की झलक मिलती है.

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फ़िल्म पद्मावती के सेट पर संजय लीला भंसाली के साथ मारपीट

अलाउद्दीन ख़िलज़ी ने 1303 ईस्वी में चित्तौड़ को जीता था और जायसी ने पद्मावत में ख़िलज़ी को ख़लनायक की तरह दिखाया है. जायसी ने इसमें अलाउद्दीन ख़िलजी के साम्राज्य को दुनिया के रूप में दिखाया है. वहीं रतनसेन और पद्मावती के बीच जो प्रेम है वो सूफ़ी की आत्मा है और ख़ुदा के लिए समर्पित है. दोनों एक दूसरे में मिलकर ख़त्म हो जाते हैं.

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Image caption इस फ़िल्म के कारण विवाद में हैं फ़िल्मकार संजय लीला भंसाली

वाचिक परंपरा में जिक्र

पद्मावत सूफियों के लिए प्रेमाख्यान है. इन्हीं प्रेमाख्यानों में एक चंदायन है, जिसे मुल्ला दाऊद ने लिखा था. इसके बाद मधुमालती और मृगावती जैसे आख्यान भी लिखे गए.

इन सभी में पद्मावत की हैसियत सबसे ज़्यादा है. इस कहानी का ज़िक्र वाचिक परंपरा में रहा होगा. भारतीय परंपराओं में जो कहानियां अस्तित्व में थीं उन्हें सूफियों ने अपने अंदाज़ में और अपनी ज़रूरत के हिसाब से लिखा है.

यह सही है कि पद्मावती किसी एक मुकम्मल ऐतिहासिक किरदार के रूप में नहीं है. हमें ऐसा कहीं नहीं मिलेगा कि अलाउद्दीन ने चितौड़ पर आक्रमण किया और पद्मावती बचने की कोशिश कर रही थी. पद्मावती की कहानी जायसी से शुरू ज़रूर होती है, लेकिन इसके बाद रुकती नहीं है.

पद्मावती का ज़िक्र 15वीं, 16वीं, 17वीं और 18वीं शताब्दी में भी मिलता है. अलाउद्दीन और पद्मावती को लेकर लोगों की अलग-अलग व्याख्या रही है और इस तरह यह कहानी हमारे इतिहास का हिस्सा बन जाती है.

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