क्यों राहुल-अखिलेश को यह साथ पसन्द है?

  • 30 जनवरी 2017
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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी और समाजवादी पार्टी के गठबंधन के बाद दोनों पार्टी के नेता लखनऊ में पहली बार रोड शो में एक साथ नज़र आए.

रविवार को राहुल गांधी और अखिलेश यादव के साझा रोड शो के कुछ राजनीतिक संदेश हैं और बड़े स्पष्ट संदेश हैं.

पहला, यह महज़ उत्तर प्रदेश का चुनावी गठबंधन नहीं है बल्कि 2019 का विपक्षी राजनीति का रोडमैप है. यानी गठबंधन को लम्बा चलना है. दूसरा, दांव पर सिर्फ़ एक चुनाव की हार-जीत नहीं है. दांव पर सिर्फ़ दो पार्टियों का तात्कालिक नफ़ा-नुक़सान नहीं है बल्कि दो युवा नेताओं का अपना ख़ुद का राजनीतिक भविष्य दांव पर है.

तीसरा संदेश ये है कि राहुल और अखिलेश को चुनाव के बाद अगर ज़रूरत पड़ी तो मायावती के साथ भी हाथ मिलाने में कोई गुरेज़ नहीं होगा. चौथे, बीजेपी की तीखी आक्रामक राजनीति और हिन्दुत्व के छुहारे छींटने की रणनीति के मुक़ाबले वह प्रगति, समृद्धि और शान्ति की बात करेंगे.

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राहुल-अखिलेश की केमिस्ट्री

और भी कई बातें थीं, जो इस रोड शो में साफ़ दिख रही थीं.

दोनों पार्टियों के गठबंधन में कसैलेपन को लेकर जितनी बातें अब तक हवा में तैर रही थीं, जिस तरह हिचकोले खाते-खाते मुश्किलों से जोड़-पैबंद लगा कर यह गठबंधन बन पाया था और 22 जनवरी को जैसे तने-ठने चेहरों के साथ राज बब्बर और नरेश उत्तम ने गठबंधन की घोषणा की थी, उस सबको राहुल-अखिलेश ने जी भर कर काफ़ूर करने की कोशिश की.

मतलब दोनों पार्टियों के छोटे-बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं को सन्देश साफ़ था कि इस गठबंधन के पीछे दोनों युवा नेताओं की निजी केमिस्ट्री है. इसलिए वह इसे गम्भीरता से लें और गठबंधन को ज़मीन तक ले जायें.

आख़िर क्यों राहुल-अखिलेश ने रविवार को हर तरीक़े से यह जताने की कोशिश की कि यह साथ सिर्फ़ यूपी को ही नहीं, बल्कि ख़ुद उन दोनों को पसन्द है. दरअसल अखिलेश के लिए इस गठबंधन को करना, सफल बनाना और चुनाव में उसे सीटों में बदल कर दिखाना नाक का सवाल है.

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मुलायम-अखिलेश का मतभेद

समाजवादी पार्टी जिन कुछ कारणों से टूट के कगार पर पहुँच गई थी, उनमें काँग्रेस के साथ गठबंधन का सवाल भी एक बड़ा मुद्दा था. मुलायम सिंह काँग्रेस से गठबंधन के पूरी तरह ख़िलाफ़ थे, जबकि अखिलेश को इस गठबंधन में बड़ा फ़ायदा नज़र आ रहा था. बाप-बेटे में इस पर काफ़ी ठनाठनी थी.

अब जब समाजवादी पार्टी की सारी कमान अखिलेश के हाथ में है तो वह पूरा ज़ोर लगा कर किसी भी क़ीमत पर इस गठबंधन को फ़ायदे का सौदा साबित ही करना चाहेंगे.

वरना चुनाव के बाद वह राजनीति में उस्ताद अपने पिता के पास क्या मुँह लेकर जाएंगे. इसीलिए 'अखिलेश को यह साथ पसन्द है!'

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राहुल और 2019 चुनाव

उधर 2014 की नासपीटी हार के बाद से लगातार विफलताओं का मुंह देख रहे राहुल गांधी के चेहरे पर रविवार को पहली बार ग़ज़ब का आत्मविश्वास दिखा.

राहुल और कांग्रेस दोनों के लिए यह बड़ा मौक़ा है क्योंकि काँग्रेस को उसकी हैसियत से कहीं ज़्यादा 105 सीटें मिली हैं.

गठबंधन के बाद अगर कांग्रेस कुछ बेहतर प्रदर्शन कर पाती है और देश को सबसे ज़्यादा सांसद देने वाले प्रदेश में 27 साल बाद सरकार में शामिल हो पाती है, तो काँग्रेस में बहुत दिनों से लटकी राहुल की ताजपोशी कुछ चमकदार हो सकेगी.

उनके नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर उठ रहे सवाल भी कुछ थमेंगे. 2019 के लिए राहुल और काँग्रेस दोनों अपने आप को कुछ बेहतर 'पोज़ीशन' कर पाएंगे.

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नीतीश की कवायद

2019 का यह संकेत राहुल और अखिलेश ने लखनऊ की अपनी साझा प्रेस कान्फ़्रेंस में बार-बार दिया.

यह सवाल काफ़ी दिनों से उठ रहा है कि 2019 में नरेन्द्र मोदी के सामने विपक्ष की चुनौती क्या होगी? अभी तक किसी के पास इसका जवाब नहीं है.

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद काँग्रेस के निश्चेष्ट पड़े रहने के कारण राष्ट्रीय विपक्ष के शून्य को भरने के लिए दो साल पहले नीतीश कुमार ने सारे समाजवादी धड़ों को एक कर पुराने जनता दल को ज़िन्दा करने की कोशिश की थी.

तब समझा जा रहा था कि यह नीतीश की 'स्मार्ट क़वायद' है ताकि अगले लोकसभा चुनाव के लिए वह ख़ुद को विपक्ष के मज़बूत दावेदार के तौर पर पेश कर सकें.

लेकिन जनता दल बन भी नहीं सका और हाल के दिनों में लालू को अरदब में रखने के लिए नीतीश ने जिस तरह मोदी के साथ पींगें बढ़ाई हैं, उससे वह विपक्ष की राजनीति में फ़िलहाल उस मुक़ाम पर नहीं हैं, जहाँ कुछ समय पहले तक थे.

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कांग्रेस बनेगी विपक्ष की धुरी?

तो फिर कौन? वह धुरी क्या होगी जिसके इर्द-गिर्द 2019 में विपक्ष इकट्ठा हो. ऐसी सर्वस्वीकार्य धुरी की स्थिति में फ़िलहाल काँग्रेस ही नज़र आती है जैसा कि अभी नोटबंदी के मुद्दे पर बनी विपक्षी एकजुटता के समय दिखाई दी थी.

लेकिन इसके लिए शर्त यह है कि कांग्रेस अब से लेकर लोकसभा चुनाव तक के सवा दो सालों में अपनी कुछ लय, कुछ दिशा हासिल कर ले. इस लिहाज़ से उत्तर प्रदेश में उसका मज़बूत आधार बनाना ज़रूरी है क्योंकि 80 सांसद वहीं से आते हैं.

अखिलेश के साथ गठबंधन कांग्रेस को ऐसा आधार दे सकता है, ऐसी उम्मीद राहुल गांधी को है. तो अगर बिहार और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस 'जिताऊ' गठबन्धनों का हिस्सा बनी रहे तो उसके लिए बड़े फ़ायदे की बात होगी.

फिर वह पश्चिम बंगाल में लेफ़्ट फ़्रंट के बजाय पुरानी कांग्रेसी ममता के साथ तालमेल की सम्भावनाएं भी टटोल सकती है और जयललिता के निधन के बाद अगर तमिलनाडु में डीएमके का दोबारा उभार होता है, तो उससे हाथ मिलाने का गणित भी बैठा सकती है.

लेकिन कोई भी गणित तो तभी बैठेगा, जब गुणा-भाग के लिए हाथ में कुछ गिनतियां हों. इसीलिए राहुल को उम्मीद है कि 'यूपी को यह साथ पसन्द आएगा' और इसीलिए 'राहुल को यह साथ पसन्द है!'

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नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी

राहुल-अखिलेश की जोड़ी को पता है कि नरेन्द्र मोदी-अमित शाह के 'फ़ायर पावर' का सामना वह नहीं कर सकते. इसलिए खेल के नियम बदलने की रणनीति भी उन्होंने अपनाई है.

राम मन्दिर, कैराना, तीन तलाक़, पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक जैसे ध्रुवीकरण के लट्टुओं के ख़िलाफ़ वह तीन 'पी' यानी प्रदेश में 'प्रोग्रेस' (प्रगति), ' प्रॉसपैरिटी' (समृद्धि) और 'पीस' (शान्ति) की ढाल ले कर मैदान में उतरेंगे.

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और हाँ, कम से कम राहुल ने यह कह कर कि मायावती बीजेपी की तरह 'देश-विरोधी' राजनीति नहीं करतीं, यह साफ़ इशारा तो कर ही दिया कि बदक़िस्मती से अगर नतीजे मनमाफ़िक़ नहीं आए तो सरकार बनाने के लिए मायावती की मदद भी ली जा सकती है.

इतने दिनों में पहली बार लगा कि राहुल ने कुछ आगे की भी सोचना सीख लिया है! अच्छी बात है.

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