नज़रिया: 'कभी इधर तो कभी उधर क्यों हो रहे हैं मुलायम'

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मुलायम सिंह यादव राजनीतिक टीकाकारों के लिए एक पहेली की तरह हो चुके हैं.

लोग अब तक भ्रम में हैं कि वह बेटे अखिलेश यादव से सचमुच नाराज़ हैं या बेटे की राजनीतिक मदद के लिए स्वांग कर रहे हैं.

रविवार को लखनऊ से दिल्ली जाते हुए फ़्लाइट में एकोनोमिक टाइम्स के पत्रकार से बातचीत में उन्होंने कहा कि नामांकन पूरे होने के बाद 12 फ़रवरी से समाजवादी पार्टी के लिए प्रचार करेंगे.

लेकिन दिल्ली पहुँचकर एक वीडियो न्यूज़ एजेंसी को बुलाकर लिखित बयान में कांग्रेस से गठबंधन का खुलकर विरोध करते हुए कहा कि वह उसके पक्ष में प्रचार नही करेंगे.

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अख़बार से बातचीत में मुलायम ने सिर्फ़ यह कहा था कि, "सपा अकेले जीत सकती थी, कांग्रेस से गठबंधन की ज़रूरत नहीं थी."

लेकिन वीडियो एजेंसी को पढ़े गए लिखित बयान में उन्होंने याद दिलाया कि, "कांग्रेस से हमारा कई मुद्दों पर विरोध रहा है. चाहे वह मस्जिद का मामला हो, चाहे फ़र्ज़ी एनकाउंटर का, हमें उसके ख़िलाफ़ संघर्ष करना पड़ा है".

मुलायम ने इस बयान में यह भी आशंका जताई कि 'कांग्रेस ने केवल सत्ता हथियाने के लिए यह समझौता किया है'.

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दोनों बयानों में साफ़ है कि मुलायम अंदर से काफ़ी आहत हैं, लेकिन एक में वह दर्द के रूप में प्रकट होता है और दूसरे में विरोध के रूप में.

अब तक माना जाता था कि मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के मतदाता मुलायम की वजह से समाजवादी पार्टी को वोट देते रहे हैं.

लेकिन कांग्रेस से हाथ मिलाकर अखिलेश इस धारणा को बदल सकते हैं. अगर गठबंधन कामयाब हुआ तो माना जाएगा कि यादवों के सबसे बड़े नेता अखिलेश स्वयं हैं और मुस्लिम वोट कांग्रेस की वजह से गोलबंद हुआ.

एक तरह से यह मुलायम का राजनीति से अप्रासंगिक हो जाना होगा.

उनके लिए यह सबसे बड़ी क्षति होगी. इस समय उनकी सबसे बड़ी चिंता शायद यही है.

दोनो बयानों में एक ख़ास अंतर यह है कि फ़्लाइट में अख़बार से बातचीत में मुलायम अकेले थे, जबकि बताया जाता है कि दिल्ली में उन्होंने लिखित बयान पढ़ा.

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यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव यह आरोप लगाते रहे हैं मित्र अमर सिंह और भाई शिवपाल यादव उनसे जैसा चाहते हैं वैसे काग़ज़ पर दस्तखत करा लेते हैं.

तो क्या मुलायम ने वीडियो एजेंसी को जो बयान दिया उसकी स्क्रिप्ट किसी और ने लिखी थी?

मैंने जब फ़ोन पर उनसे पूछा कि प्रचार करने जाएँगे या नहीं तो वे यह कहकर टाल गए कि, "कल लखनऊ आऊँगा तो बैठकर बात करेंगे".

वास्तव में मुलायम को अंदर से इस बात का पछतावा है कि 2012 में जनादेश मिलने के बाद वह मुख्यमंत्री स्वयं क्यों नही बने. अगर वह मुख्यमंत्री रहते तो पार्टी अध्यक्ष पद उनसे इस तरह कोई नहीं 'छीन' सकता था.

इस सिलसिले में वह प्रकाश सिंह बादल का उदाहरण देते हैं, जो 89 साल की उम्र में भी कमान अपने हाथ में रखे हुए हैं.

दूसरे, पार्टी का संरक्षक बनाने के बावजूद उनसे किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर राय नही ली जा रही. उन्होंने जो राय दी उस पर भी अमल नहीं किया गया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है मुलायम के तमाम क़रीबी मित्रों को विधान सभा में टिकट न मिलना.

ये लोग अब या तो लोकदल अथवा बहुजन समाज पार्टी के टिकट से अथवा निर्दलीय चुनाव लड़ने जा रहे हैं.

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पहले अटकलें थीं कि मुलायम स्वयं लोक दल का नेतृत्व करेंगे, पर वैसा नहीं हुआ. अब अटकलें हैं कि अब वह सिर्फ़ वहाँ जाएँगे जहाँ उनका मन करेगा.

मुलायम की दुविधा और धर्म संकट की सबसे बड़ी वजह हैं उनके भाई शिवपाल यादव.

मुलायम की दिली इच्छा है शिवपाल पार्टी न छोड़ें. शिवपाल चले गए तो समाजवादी पार्टी के अंदर उनकी बची-खुची ताक़त भी ख़त्म हो जाएगी.

अखिलेश ने शिवपाल को जसवंत नगर से टिकट तो दिया है, लेकिन पार्टी के कामकाज से वह पूरी तरह किनारे कर दिए गए हैं. इसके बावजूद शिवपाल ने अभी तक पार्टी नहीं छोड़ी है.

लेकिन उन्होंने अपने समर्थकों को मंच देने के लिए शिवपाल यूथ ब्रिगेड का गठन कर दिया है. इसका सम्मेलन बुधवार पहली फ़रवरी को इटावा में होने जा रहा है. देखना है कि इस सम्मेलन में शिवपाल अपने समर्थकों को क्या राजनीतिक दिशा देते हैं.

अखिलेश और शिवपाल इन दो पाटन के बीच फँसे मुलायम का क्या होगा, कहना मुश्किल है.

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