कश्मीरी महिलाओं की आफ़त में ज़िंदगी

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कश्मीर में बीते छह महीने के दौरान भारत-विरोधी प्रदर्शनों में 90 से ज़्यादा आम लोग सुरक्षा बलों और पुलिस की कार्रवाई में मारे गए और हज़ारों लोग घायल हुए हैं.

हज़ारों युवकों के जेल में बंद होने के अलावा कश्मीर के उद्योग पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ा है. इन हालात से कश्मीर के लोगों की मानसिक उलझनें बढ़ गई हैं.

कश्मीरी महिलाओं को भी कई तरह की मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसी महिलाओं की संख्या हाल के दिनों में बढ़ी है.

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ऐसे लोगों की हालत और भी ख़राब है जो अपनों को खो चुके हैं या फिर जिनके अपने गिरफ्तार किए जा चुके हैं, या फिर जिनके ख़्वाब आंखों में छर्रे लगने से बिखर गए हैं. उनके परिवार भी मानसिक रूप से जूझ रहे हैं.

जानकार मानते हैं कि कश्मीर में पिछले 28 वर्षों के ख़राब हालात के कारण आम लोग मानसिक रूप से परेशान हैं और इस परेशानी ने चिंता की शक्ल अख्तियार कर ली है.

जानकार ये भी कहते हैं कि बीते छह महीनों के हालात ने अब इसमें इज़ाफ़ा कर दिया है, और महिलाएं सबसे ज़्यादा शिकार हैं.

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कश्मीर के ज़िला कुलगाम के दमहाल हांजी पोरह की रहने वाली नसीम बेगम की 16 वर्षीया बेटी यास्मीन जान की 9 जुलाई को प्रदर्शनों के दौरान अपने घर के बाहर सुरक्षा बलों की गोली लगने से मौत हो गई.

उस दिन से लेकर आज तक नसीमा सदमे में हैं. नसीमा के घर के बाहर सन्नाटा है. नसीमा घर के कमरे के कोने में बैठी शून्य में घूरती रहती हैं. पति भी साथ ही बराबर में बैठे ग़म में डूबे रहते हैं.

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रोते बिलखते हुए उन्होंने कहा, "मैं उस लम्हे को कैसे भूल सकती हूँ जब मेरी बेटी की लाश को घर लाया गया. वह तो अपने भाई को ढूंढने निकली थी, और वापस उसकी लाश आई. यहाँ हर तरफ गोलियों और आंसू गैस की बौछार हो रही थी. हर तरफ़ ख़ौफ़ था. कुछ दिन पहले उनकी 12वीं जमात का रिजल्ट आया तो वह पास हो गई थी. नींद आने के लिए दवा खानी पड़ती है. वह ख़ौफ़ और मेरी बेटी की मौत मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा है."

नसीमा एक ही सवाल पूछती है कि उनकी बेटी को किस जुर्म में मारा गया. नसीमा के पति अब्दुल रहमान वानी बेटी की मौत से निढाल और पत्नी के मानसिक उलझाव की वजह से काफ़ी परेशान हैं.

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वह कहते हैं, "मेरी पत्नी उस दिन से सिर्फ रो रही हैं. अब ये दिल की मरीज़ बन चुकी हैं."

श्रीनगर के बेमिना की रहने वाली 48 साल की शमीम भी अपने बेटे की जुदाई और बेटे की गिरफ़्तारी के बाद सँभल नहीं पा रही हैं. जब से पुलिस और सुरक्षाबलों ने उनके बेटे को गिरफ्तार किया, हंगामाख़ेज़ हालात उनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं.

उनका 18 साल का बेटा बीते तीन महीनों से जम्मू के कोट बिलवाल जेल में पत्थरबाज़ी के इल्ज़ाम में पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत बंद है.

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वह कहती हैं, "जिस दिन से मेरा बेटा गिरफ़्तार किया गया मैं सो नहीं पाती हूँ. हर वक़्त मुझे दवा का सहारा लेना पड़ता है, खासकर दिल की दवा. बेटे की गिरफ़्तारी से पहले मैं ठीक थी. अब कई बीमारियों ने मुझे घेर लिया है. जिस रात पुलिस आई और बेटे को ले गई, पूरे मोहल्ले में ख़ौफ़ था. मेरे दिमाग में अब भी वह चीख़-पुकार गूंज रही है. मुझे कई डॉक्टरों के पास इलाज के लिए ले जाया गया."

मनोचिकित्सक और सरकारी साइकियाट्रिस्ट हॉस्पिटल के पूर्व मुखिया डॉक्टर मुश्ताक़ मरगूब कहते हैं कि पिछले 28 वर्षों में पहले ही जो मानसिक उलझनें महिलाओं में थीं, वह बढ़ गई हैं.

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वह कहते हैं, "पिछले चार या पाँच महीनों में जो कश्मीर के हालात रहे उनमें कर्फ्यू भी था, हड़ताल भी थी, मारामारी थी. कारोबार ठप होकर रह गया. ऐसे में कश्मीरी महिलाएं में मानसिक दबाव बढ़ने की आशंका ज़्यादा है,"

डॉक्टर मरगूब ये भी कहते हैं कि वह तो अब मरीज़ को देखने की बजाए कम्युनिटी में जाते हैं जहाँ उनको ये देखना पड़ता है कि मरीज़ कौन नहीं है.

उनका कहना था, "यक़ीनन इनमें महिलाएं ज़्यादा हैं. जिन महिला मरीजों को मैंने दैखा, वह बीते छह महीनों के हालात की दास्तानें ले कर आईं."

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लोग साइकियाट्रिस्ट हॉस्पिटल या डॉक्टर्स के पास इसलिए भी नहीं जाते, क्योंकि उन्हें बदनामी का का डर रहता है.

श्रीनगर के साइकियाट्रिस्ट हॉस्पिटल के मुखिया डॉक्टर मक़बूल अहमद कहते हैं वो बीते कुछ महीनों से जिन मरीजों को देख रहे हैं, उनमें 60 प्रतिशत महिलाएं रही हैं.

डॉक्टर मक़बूल के आंकड़ों के मताबिक़ अप्रैल 2016 से अक्तूबर 2016 तक उनके दो अस्पतालों में क़रीब 46,000 मरीज़ आए हैं.

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