चुनावी फंडिंग पर कस सकेगी नकेल?

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एनडीए सरकार ने बुधवार को पेश हुए आम बजट में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को लेकर नियम बदल दिए हैं. जिसके बाद अब इस पर बहस छिड़ गई है.

अभी तक के नियमों के तहत राजनीतिक दलों को किसी भी व्यक्ति या संस्था से प्राप्त हुए 20,000 रुपये से कम का स्रोत बताने की आवश्यकता नहीं थी.

2017 के बजट में अरुण जेटली ने इस रक़म को घटाकर 2,000 कर दिया है और इसे 'राजनीतिक दलों के काम-काज में पारदर्शिता बढ़ाने' वाला क़दम बताया है.

हाल ही में नेशनल इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रैटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने आंकड़े जारी किए थे जिसके मुताबिक़ पिछले 11 वर्षों में राजनीतिक दलों को 69 फ़ीसद आय 'अज्ञात स्रोतों' से हुई थी.

रिपोर्ट में बताया गया था कि वर्ष 2004 से लेकर मार्च 2015 तक सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की कुल आय 11,367 करोड़ रुपये रही जिसमें से सिर्फ़ 31 फ़ीसद आय के ही स्रोत का पता है.

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हालांकि रकम घटाने वाले फ़ैसले को वित्त मंत्रालय ने चुनाव आयोग के सुझावों के तहत लिया गया बताया है लेकिन जानकरों को लगता है इससे फ़र्क नहीं पड़ेगा.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और राजनीति में काले धन के प्रयोग के खिलाफ मुहिम छेड़ने वाले प्रशांत भूषण के मुताबिक़ ये 'आँख में धूल झोंकने वाली बात हुई.'

उन्होंने बताया, "पार्टियों को कैश से आने वाले चंदों का स्रोत तो बताना नहीं होता. अगर आज भाजपा या कांग्रेस पार्टी कहती है कि इस वर्ष हमें 1,000 करोड़ रुपए कैश में मिले जो 20,000 रुपए के प्रति व्यक्ति चंदे से कम के थे. कल भी कहेंगे कि इतने ही पैसे 2,000 प्रति व्यक्ति के चंदे से मिले. जब तक कैश चंदा देने वालो का नाम बताना अनिवार्य नहीं होगा, कुछ नहीं बदलेगा."

लेकिन भारतीय जनता पार्टी अपनी सरकार के इस फैसले को ऐतिहासिक बता रही है.

पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, "पहली बात तो ये कि चुनाव आयोग ने पूरी रिसर्च करके ऐसा प्रस्ताव रखा होगा जिस पर फ़ैसला लिया गया है. दूसरे, सरकार ने बड़ी रक़म दने के तरीके को भी डिजिटल कर दिया है. पहले चेक से बड़ी रकम देने वाले घबराते थे कि दूसरे दलों को पता न चल जाए. अब सभी बड़े लेन-देन बॉन्ड या सरल भाषा कहें तो बैंकों के ज़रिए ही होंगे."

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भारत में राजनीतिक दलों को 'अज्ञात स्रोतों' से मिलने वाले करोड़ों रुपये के चंदे का ख़ासा विरोध होता रहा है.

जानकारों की राय भी रही है कि इस नियम में तुरंत बदलाव लाने की ज़रूरत थी जिससे चुनावी खर्चों और राजनीतिक दलों के काम-काज में पारदर्शिता बढे.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने इस तरह की मिसाल पर अपने कार्यकाल में कड़ी टिप्पणियां भी दी थी.

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रैटिक रिफॉर्म के प्रमुख अनिल वर्मा को लगता है कि नया नियम 'पारदर्शिता, जवाबदेही और जुर्माने के मापदंडों पर विफल साबित होता है.

उन्होंने कहा, "ये भी नहीं तय किया गया कि एक आदमी कुल कितनी बार चंदा दे सकता है. 2,000 से ज़्यादा का चंदा देने वालों का नाम अभी भी उजागर नहीं किया जाएगा. बजट में कहा गया सभी पार्टियों को इनकम टैक्स भरना पड़ेगा वो भी कोई नई बात नहीं और ये चुनाव आयोग की गाइडलाईन रही है."

इस बीच सरकार के इस फ़ैसले पर राजनीतिक दलों की राय भी बँटी लग रही है.

जहाँ सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि कदम से बड़ी पार्टियों की कॉरपोरेट फंडिंग और काले धन के प्रयोग पर कोई असर नहीं पड़ेगा वहीँ कांग्रेस के राहुल गाँधी ने कदम का स्वागत किया है.

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