मार्शल आर्ट में चैंपियन कश्मीरी बच्चे

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Image caption महविश मंज़ूर

भारत प्रशासित कश्मीर के छह स्कूली बच्चे कामयाबी की उंचाइयां छू रहे हैं.

ज़िला बडगाम के नरकारा गांव में ये पहली बार नहीं है जब इतने सारे बच्चों ने मार्शल आर्ट में तमगे जीते हैं.

इससे पहले भी गांव के कई लोग मार्शल आर्ट में लोहा मनवा चुके हैं.

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महविश मंज़ूर सातवीं की छात्रा हैं. बीते चार सालों से वो मार्शल आर्ट में कामयाबी के झंडे गाड़ रही हैं.

महविश के भीतर अपने भाई की वजह से मार्शल आर्ट का जज़्बा पैदा हुआ.

वह बताती हैं, "मेरे भाई भी मार्शल आर्ट के दंगील मदो के राष्ट्रीय खिलाड़ी रहे हैं. उनकी वजह से मेरे भीतर भी मार्शल आर्ट खेलने का शौक़ पैदा हुआ."

दंगील मदो मार्शल आर्ट का एक हिस्सा है जो असल में कोरियाई खेल है.

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मार्शल आर्ट में तमगे जीतते ये कश्मीरी बच्चे

महविश बताती हैं कि जब उन्होंने मार्शल आर्ट की प्रैक्टिस शुरू की तब गांव के लोगों ने कई तरह की बातें करनी शुरू कर दीं.

ज़िला स्तर से दक्षिण एशियाई चैंपियनशिप के सफर तक कई मेडल हासिल करने वाली महविश को उनके परिवार ने काफी हौसला दिया.

महविश के अलावा उनके गांव की और भी लड़कियां मार्शल आर्ट से जुड़ी हैं.

हाल ही में जम्मू-कश्मीर से 35 बच्चे दक्षिण एशियाई चैंपियनशिप में हिस्सा लेने गए थे जिनमें श्रीनगर के 10 और बडगाम के 10 बच्चों ने गोल्ड जीते.

नरकारा के छह बच्चों ने गोल्ड जीते जबकि एक ने सिल्वर जीता.

पांचवीं में पढ़ाई करने वाले फ़ाज़िल अहमद ने आज तक पांच गोल्ड हासिल किए हैं.

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Image caption फ़ाज़िल

फ़ाज़िल बहुत छोटी उम्र से मार्शल आर्ट का खेल खेलते आए हैं. उन्होंने कहा, "मुझे बचपन से मार्शल आर्ट का शौक़ था. यहाँ तक आने के लिए मैंने काफी मेहनत की है. मैं इस खेल में बहुत आगे बढ़ना चाहता हूं."

18 वर्ष के आदिल अहमद नरकारा गांव के एक और उभरते खिलाड़ी हैं जो पिछले नौ सालों से मार्शल आर्ट खेल रहे हैं.

कई सारे तमग़ों के मालिक आदिल हाल ही में भूटान में दक्षिण एशियाई चैंपियनशिप में गोल्ड जीत कर आए हैं.

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Image caption आदिल

आदिल एक ही गांव से छह खिलाड़ियों के गोल्ड जीतने का क्रेडिट अपने कोच को देते हैं.

वह कहते हैं, "गांव या घर में हमें कभी मदद नहीं मिली लेकिन कोच ने हमारा हौसला बढ़ाया."

15 साल के आकिब मुजाफर ब्रूस ली और जेट ली के फ़ैन थे.

ब्रूस ली अकीब के पसंदीदा खिलाड़ी हैं जबकि अपने चाचा से भी उनको मार्शल आर्ट खेलने की प्रेरणा मिली.

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Image caption आकिब मुजाफर

वह कहते हैं, "मेरे चाचा भी मार्शल आर्ट के खिलाड़ी रहे हैं. वह मुझे कहते थे कि आप भी इसी में अपना करियर बनाइए."

गोल्ड जीतने के अलावा आकिब ने कई सारे चैंपियनशिप्स में तमगे हासिल किए हैं.

जम्मू -कश्मीर मार्शल आर्ट टीम में क़रीब सौ खिलाड़ी हैं.

दसवीं क्लास में पढ़ने वाले नरकारा गांव के ज़ीशान दर भी बीते सात सालों से मार्शल आर्ट के गुर सीख रहे हैं.

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Image caption ज़ीशान

ज़ीशान ने भी हाल में भूटान में आयोजित दक्षिण एशिया चैंपियनशिप में गोल्ड जीता है.

उनका कहना था, "एक दो बार मैंने मन बनाया कि मैं अब नहीं खेलूंगा. मुझे कई बार चोट लगी लेकिन फिर मेरे कोच ने मुझसे कहा कि नहीं, आपको खेलना है जिसके बाद मैंने फिर खेलना शुरू कर दिया."

ज़ीशान कहते हैं कि घर से बेहतर आमदनी का ज़रिया न होने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

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Image caption कोच बिलाल माजिद

15 साल के अरसलान आकिब कहते हैं कि जब शुरू में वह खेलने लगे तो घर वालों की सहायता नहीं मिली थी.

अरसलान भी दक्षिण एशिया चैंपियनशिप में तमग़ा जीत कर आए हैं.

कोच बिलाल माजिद कहते हैं कि सरकार की तरफ से उनके गांव के खिलाड़ियों के लिए इंडोर स्टेडियम नहीं है जिसकी वजह से उन्हें करीब 15 किलोमीटर दूर जाकर प्रैक्टिस करनी पड़ती है.

बिलाल भी मानते हैं कि उनके गांव में पहले भी मार्शल आर्ट के कई खिलाड़ी रहे हैं जिसकी वजह से भी वह इस परंपरा को आगे ले जा रहे हैं.

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