क्या आदिवासी नक्सल कमांडरों का मोहभंग हो रहा है?

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha
Image caption डिंबा पाहन आत्मसमर्पण के बाद पुलिस अधिकारियों के साथ.

"वो दिन नहीं रहे, जब निचले स्तर के कैडरों का मोल हो. साथ ही गांवों के लोगों का नक्सली दस्ते से भरोसा टूट रहा है. ग़रीब अगर साथ देते हैं, तो मारे जाने के डर से. फिर हमारे सामने हर पल पुलिस के साथ मुठभेड़ का डर. पत्ते भी खड़कते हैं, तो बंदूकें तन जातीं हैं- जंगलों में बेमौत मरने से अच्छा है हथियार डालना."

पिछले महीने खूंटी पुलिस के सामने आत्मसपमर्पण करने के बाद माओवादियों के ज़ोनल कमांडर डिंबा पाहन की यह पहली प्रतिक्रिया थी. उम्र पचास पार, चेहरे पर रौब, लेकिन आंखों में नई ज़िंदगी की चाहत.

वो गोरी मेम जो ब्रिटेन से आकर झारखंड की हो गई

खदान हादसा: 'हमारा तो सबकुछ ख़त्म हो गया'

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha
Image caption डिंबा पाहन के ऊपर 15 लाख का इनाम था.

पंद्रह लाख के इनामी डिंबा आदिवासी कमांडरों में अकेले नहीं, जिन्होंने हथियारों से नाता तोड़ा है.

साल 2014 से अब तक झारखंड में 66 नक्सलियों ने आत्मसमपर्ण किया है. इनमें 45 चेहरे आदिवासी हैं, जिनके ओहदे गुरिल्ला दस्ते के सदस्य से लेकर स्पेशल एरिया कमिटी ( सैक) मेंबर तक थे.

नोटबंदी से कितने क़ाबू में आए नक्सली

क्या नक्सली सचमुच कमज़ोर हो रहे हैं?

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha
Image caption बालकेश्वर उरांव आत्मसमर्पण करते हुए.

इसी कड़ी में बिहार-झारखंड और उत्तरी छत्तीसगढ़ एरिया कमेटी के मेंबर बालकेश्वर उरांव ऊर्फ़ बड़ा विकास ने भी पिछले साल सरेंडर किया था, उन पर 25 लाख रुपए का इनाम था.

आधे दर्जन नामी नक्सलियों के हथियार डलवाने में अहम भूमिका निभाने वाले लातेहार के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अनूप बिरथरे का दावा है कि विकास, माओवादियों के बड़े आदिवासी लीडर रहे हैं और संगठन में धन जुटाने में उन्हें महारत हासिल थी.

उन पर 60 से ज़्यादा ज्यादा मामले दर्ज थे. वे बताते हैं कि विकास के तुरंत बाद बालेश्वर उरांव, सूरज कोरबा का सरेंडर इसके संकेत हैं कि आदिवासी इलाकों में माओवादियों की पैठ लगातार कमज़ोर पड़ रही है. इसके कई कारण हैं, जिनमें पुलिस की तरफ से थका देने वाली घेराबंदी और तलाशी भी शामिल है.

नक्सली कमज़ोर हुए हैं या सुरक्षा मज़बूत है?

सलवा जुडूम: निशाने पर नक्सली या आदिवासी?

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha

बालेश्वर उरांव ने कहा था कि वो लोग आंध्रप्रदेश के माओवादी नेता सुधाकरण को अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं, वो चाहते हैं कि उनका नेता उनके राज्य से हो. पुलिस भी मानती है कि झारखंड में माओवादियों को लामबंद करने की ज़िम्मेदारी सुधाकरण को दी गई है.

हालांकि जानकार बताते हैं कि सुधाकरण धन का हिसाब मांगने लगे हैं, लिहाजा कई माओवादी दस्ते छोड़ रहे हैं.

जबकि खूंटी में आत्मसमर्पण करने वाले पीपुल्स लिब्रेशंस के रूबेन केरकेट्टा कहते हैं कि मुखबिरी के आरोप में नक्सलियों के ग्रामीणों की हत्या करने के अलावा पुलिस मुठभेड़ में लगातार आदिवासी कमांडरों के मारे जाने से वे विचलित थे.

एरिया कमांडर सोनिया मुंडा समेत चार नक्सलियों के रांची में आत्मसमर्पण से पुलिस की उम्मीदें बढ़ी हैं.

जब 60 साल के मांगिया ने पहली बार पहना जूता

झारखंड के इस गांव की हर लड़की खेलती है हॉकी

पुलिस का दावा है कि इनमें हरिसिंह मुंडा और लखन सिंह मुंडा पिछले साल अगस्त महीने के उस मुठभेड़ में शामिल थे, जिनमें रांची के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रहे प्रभात कुमार घायल हो गए थे, जबकि उसी मुठभेड़ में एक माओवादी और एक जवान मारा गया था.

सिमडेगा में नक्सलियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई किस्म के अनूठे प्रयोग में जुटे पुलिस अधीक्षक राजीव रंजन कहते हैं कि नक्सलियों को इसका अहसास होने लगा है कि जिन सिद्धातों पर उन्होंने हथियार थामे थे, वो अब दिशाविहीन हो गया है. लेवी वसूलने की होड़ में ओहदे के क्रम टूट रहे है.

पंचायत चुनावों के होने से नक्सली कमज़ोर पड़े हैं, साथ ही सरकार की पॉलिसी - नई दिशा का भी असर है, जिसके तहत सरेंडर करने के साथ ही नक्सली को इनाम की पूरी राशि सौंप दी जाती है.

झारखंड के चिरुडीह में पसरा है मातमी सन्नाटा

'नक्सली' हमले में तीन ग्रामीणों की मौत

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha
Image caption सूरज कोरबा और उनकी पत्नी सुशीला कोरबा

आत्मसमपर्ण करने वाले सूरज कोरबा और उनकी पत्नी सुशीला कोरबा कहती हैं कि वे लोग चैन की ज़िंदगी जीना चाहते हैं. सरेंडर पॉलिसी के तहत सरकार उन लोगों के पुनर्वास की व्यवस्था मुकम्मल करें, तो अच्छा.

जबकि रामपोदो लोहरा की टीस है कि आत्मसमर्पण के बाद अधिकतर लोगों के गांव छूट जाते हैं. क्योंकि माओवादियों की नज़रों में वे पुलिस के आदमी हो जाते हैं.

एक नक्सली के पिता ने नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया कि सरेंडर कराने में पुलिस दिलचस्पी तो दिखाती है, लेकिन सरेंडर के बाद जेल से निकलने के लिए कानूनी मदद तथा नीति के तहत आवास निर्माण के लिए ज़मीन और पैसे मिलने में तेज़ी नहीं होती.

जबकि बदली परिस्थितियों में हाथों में पुलिस से मिले चेक रहने के बाद भी मुश्किलों भरा दौर होता है.

झारखंड: उपायुक्त पर 1.16 करोड़ का जुर्माना

इमेज कॉपीरइट Niraj sinha

हालांकि आत्मसमर्पण को लेकर पुलिस की कार्रवाइ पर सवाल भी उठते रहे हैं.

नक्सली मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार सुरजीत सिंह कहते हैं कि पिछले साल 17 अक्तूबर को चाईबासा के नौ कथित नक्सलियों को रांची में बड़े तामझाम से पुलिस ने सरेंडर कराया था, आठ लोगों के ख़िलाफ़ कोई नक्सली रिकॉर्ड नहीं होने पर पूरा मामला जांच के घेरे में है. आदिवासियों में अब भी दर्जन भर बड़े नक्सली पुलिस के लिए चुनौती बने हुए हैं.

वो बताते हैं कि बेशक पुलिस की तलाशी तेज़ है, पर लाखों के इनामी नक्सली बिना हथियार के सरेंडर करे, तो संदेह की गुंजाइश होती है. झारखंड में वैसे चेहरे भी सरेंडर कर रहे हैं, जो सालों से संगठन से अलग-थलग पड़े हैं. लेकिन इन चेहरों के सर पर इनाम है, तो पुलिस भी उपलब्धियां गिना रही हैं.

झारखंड में भक्तों ने गुरू की बलि दी

झारखंड: डायन के नाम पर हत्याएं थम नहीं रही

तीन सालों से नक्सलियों के सरेंडर को लेकर पुलिस यहां नई दिशा कार्यक्रम चला रही है. साथ ही लगभग पौने दो सौ नक्सलियों की सूची जारी की गई है जिन पर 20.48 करोड़ का इनाम है.

पोलित ब्यूरो के मेंबर पर एक करोड़ तक के इनाम हैं. जबकि इनाम और पुनर्वास पर पुलिस ने अब तक साढ़े तीन करोड़ खर्च किए हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे