'लीची से मौत' को लीची अनुसंधान केंद्र ने ख़ारिज किया

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राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र यानी कि एनआरसीएल ने विज्ञान पत्रिका लैंसेट ग्लोबल में छपे रिसर्च के नतीजों को ख़ारिज किया है.

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इस रिसर्च में यह बताया गया था कि 2014 में बिहार के मुजफ्फरपुर में खाली पेट ज्यादा लीची खाने के कारण बच्चे बीमारी हुए और फिर इससे उनकी मौत हो गई.

2014 में मुजफ्फरपुर में सौ से अधिक बच्चों की मौत एक संदिग्ध बीमारी से हुई थी.

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एनआरसीएल के निदेशक विशाल नाथ ने बीबीसी को बताया, ''हम इस रिसर्च से कोई इत्तेफाक नहीं रखते हैं. इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च की ओर से अनुशंसित मात्रा में लीची या किसी फल का सेवन करने से किसी तरह की समस्या नहीं आती है.''

एनआरसीएल निदेशक के मुताबिक रिसर्च में यह नहीं बताया गया है कि जहरीले तत्व की कितनी मात्रा बच्चों में पाई गई और इसके कितने ज्यादा सेवन से मौत होती है. रिसर्च में केवल कारणों का पता लगाया है.

उन्होंने सवाल किया कि अगर लीची खाने से बच्चों की मौत होती तो बीते साल 2016 में एक भी मौत क्यों नहीं हुई?

विशाल नाथ के मुताबिक हर एक व्यक्ति को साल में कम से कम 450 ग्राम लीची खानी चाहिए. लेकिन पूरी तरह तैयार लीची ही खानी चाहिए.

मुजफ्फरपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर गोपाल शंकर सहनी भी लैंसेट ग्लोबल के रिसर्च नतीजों पर सवाल खड़े करते हैं.

उन्होंने बीबीसी को फोन पर बताया, "रिसर्च नतीजों में बच्चों की मौत की एक मात्र वजह शरीर में ग्लूकोज की कमी (हाइपोग्लेसेमिया) बताई गई है और इसके लिए लीची को जिम्मेदार ठहराया गया है."

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डॉक्टर गोपाल आगे कहते हैं, "बीते एक दशक से अधिक समय में मैंने पाया है कि बच्चों की मौत शरीर में कई तरह के लवणों के उतार-चढ़ाव के कारण होती है और इसके लिए किसी भी रूप में केवल लीची को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता."

उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि कई बार बच्चों की मौत तब हुई है जब या तो लीची का मौसम शुरु ही नहीं हुआ था या फिर इसका मौसम बीत चुका था.

डॉक्टर गोपाल के मुताबिक इस बीमारी का संबंध गर्मी और आर्दता बढ़ने और घटने से साफ तौर पर देखा गया है.

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