40 किलोमीटर का सफ़र तय करने में लगे 4 घंटे, 'भाई यहां काम बोलता है'

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ग़ाज़ीपुर के पूर्व सांसद और पूर्व विधायक अफ़ज़ाल अंसारी से जब उनके घर पर मुलाक़ात हुई तो वो हमारे मोहम्मदाबाद में पहुंचने के अनुभव पर चुटकी लेते हुए बोले, ''भाई यहां काम बोलता है.''

'काम बोलता है' सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी का प्रमुख चुनावी नारा है और अफ़ज़ाल अंसारी कुछ ही दिन पहले बहुजन समाज पार्टी में शामिल हुए हैं.

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समाजवादी पार्टी में शामिल होने के लिए उनकी कई दौर की वार्ताएं सिर्फ़ इसलिए विफल हो गईं क्योंकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तैयार नहीं थे.

गहमर से मोहम्मदाबाद का सफ़र

ऐसे में अफ़ज़ाल अंसारी की इस टिप्पणी के पीछे राजनीतिक पूर्वाग्रह से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन उनका ये अंदाज़ शायद हमसे पुष्टि की अपेक्षा कर रहा था.

गहमर से मोहम्मदाबाद के बीच महज़ 40 किलोमीटर की दूरी है. लेकिन ये सफर तय करने में हमें चार से ज़्यादा घंटे लग गए.

रास्ते में ऐसी कोई जगह नहीं मिली, जहां गाड़ी की रफ्तार 20 किलोमीटर से ज़्यादा रही हो.

गोरखपुर से मऊ का कैसा रहा अनुभव?

ऐसा ही कुछ अनुभव गोरखपुर से मऊ और फिर मऊ से ग़ाज़ीपुर वाली सड़क का रहा. हालांकि पूर्वांचल के विकास को लेकर सवाल हमेशा खड़े होते हैं. चिंता जताई जाती है लेकिन वास्तविक स्वरूप यहां पहुंचने पर ही दिखता है.

हालांकि ये ज़मीनी विकास की हक़ीक़त थी. रास्ते में खाने-पीने से ज़्यादा मोबाइल फ़ोन और रिचार्ज करने वाली दुकानें वैसे ही ज़्यादा दिखेंगी जैसे कि देश के दूसरे हिस्सों में.

ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति दिखा हो, जिसके हाथ में मोबाइल फ़ोन न हो लेकिन लोगों की निग़ाह में सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी है.

जहां होने हैं आखिरी चरण के चुनाव

यहां चुनाव आख़िरी चरण यानी चार और आठ मार्च को होने हैं. चुनावी माहौल की बात करें तो नेताओं के जनसंपर्क अभियान के अलावा न तो गाड़ियों का शोर-गुल सुनाई पड़ रहा है और न ही पोस्टर, बैनर या होर्डिंग दिख रहे हैं. कहीं-कहीं छोटी-मोटी जनसभाएं ज़रूर दिख जाती हैं.

क्या अब भी है नोटबंदी का असर?

चुनाव आयोग की सख़्ती और नोटबंदी ने प्रचार के परंपरागत स्वरूप को ज़रूर प्रभावित किया है लेकिन सोशल मीडिया पर चुनावी चर्चाएं ज़ोर पकड़े हुए हैं.

केंद्र सरकार नोटबंदी के चाहे जितने फ़ायदे गिनाए और दावा करे कि बैंक और एटीएम अब नोटों से भरे हुए हैं, लेकिन ऐसी कई जगह हमें देखने को मिलीं जहां एटीएम और बैंकों के बाहर वैसी ही क़तारें दिखीं जैसी कि नौ नवंबर के बाद देश के हर हिस्से में दिख रही थीं.

अपनी बात किससे कहें?

नोटबंदी की वजह से हुए नुक़सान की चर्चा लोग बिना ज़िक्र किए ही करने लगते हैं. किसानों का दर्द इस लिहाज़ से ख़ासतौर पर दिखता है.

नेताओं के लिए विकास सिर्फ़ मुद्दा है तो स्थानीय नागरिक शायद विकास के इसी स्वरूप को अपनी नियति मान चुके हैं. बातचीत के दौरान ज़्यादातर लोगों का यही कहना था कि वो अपनी बात किससे कहें?

ऐसा नहीं है कि ख़राब सड़कें, स्कूलों की स्थिति, कॉलेजों की गुणवत्ता को लेकर उन्हें चिंता नहीं है लेकिन उनके मुताबिक नेता चुनाव जीतने के बाद नहीं सुनते हैं, चाहे वो जिस पार्टी से हों.

यही नहीं, यहां कुछ ऐसा भी देखने को मिला जो लोकतंत्र के लिए कुछ हद तक चिंता का विषय भी हो सकता है. चुनाव को लेकर लोगों में कोई बहुत दिलचस्पी नहीं है, जबकि पूर्वांचल का इलाक़ा राजनीतिक रूप से काफी जागरूक माना जाता है.

'चुनाव और नेताओं में कोई दिलचस्पी नहीं'

हद तो तब हो गई जब आज़मगढ़ के एक नामी कॉलेज के बाहर कुछ छात्रों से हमने बात करने की कोशिश की. छात्रों ने बड़ी बेरुख़ी से जवाब दिया, ''छोड़िए, इन सब बातचीत से किसी को क्या मिलेगा? हमें चुनाव और नेताओं में कोई दिलचस्पी नहीं है.''

ऐसा तब है जबकि प्रशासनिक अमले के साथ मिलकर कुछ सामाजिक संगठन जगह-जगह मतदाताओं को जागरूक करने के लिए जुलूस निकाल रहे हैं और पोस्टरों के ज़रिए अपील कर रहे हैं.

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