नोएडा लाइक घोटाला, सोशल ट्रेड के सीईओ गिरफ़्तार, साइट बंद

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'घर बैठे कुछ वेबसाइट लिंक्स पर क्लिक करें और बदले में अच्छे पैसे कमाएं'. इस वादे के साथ करीब साढ़े छह लाख लोगों को अपने सर्वर पर जोड़ चुकी ऑनलाइन कंपनी 'सोशल ट्रेड' के निदेशक, सीईओ और तकनीकी प्रमुख को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है.

कंपनी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के बाद नोएडा स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने आरोप लगाया कि कंपनी ने लोगों को 'मल्टी लेवल मार्केटिंग' और 'डिजिटल मार्केटिंग' का झांसा देकर करीब 3,700 करोड़ रुपये का घोटाला किया है.

बीबीसी के बात करते हुए एसटीएफ के एसएसपी अमित पाठक ने बताया कि कंपनी के दफ़्तर से करीब ढाई सौ पासपोर्ट ज़ब्त किए गए हैं, जो कंपनी के मुलाज़िमों और कंपनी के लिए बढ़िया परफॉर्म करने वाले लोगों के हो सकते हैं. पाठक ने बताया कि कंपनी के सभी ख़ातों को मिलाकर कुल 525 करोड़ रुपये भी पुलिस ने ज़ब्त कर लिए हैं.

पाठक ने बताया, "करीब 3,200 करोड़ रुपये का हमें पता करना है. इस जांच में एसटीएफ के साथ आईटी, सर्विस टैक्स, कॉर्पोरेट मंत्रालय, आरबीआई और सेबी के अधिकारी भी शामिल हैं."

पुलिस इस घोटाले को 'लाइक स्कैम' का नाम दे रही है. कंपनी की ओर से इस मामले में अभी तक कोई बयान जारी नहीं किया गया है.

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साढे छह लाख में महिलाएं और किसान भी

पेशे से दुकानदार 46 साल के छुटन सिंह बताते हैं कि बेहद कम वक्त में इस कंपनी की लोकप्रियता बढ़ी. कंपनी के लिए काम करना आसान था, इसलिए शहरों समेत गांवों में भी इनके यूज़र बने हुए थे. रिटायर्ड लोगों, महिलाओं और किसानों ने ख़ासकर इस कंपनी में पैसा लगा रखा था.

छुट्टन सिंह सोशल ट्रेड से आठ महीना पहले ही जुड़े थे और उन्होंने अपने साथ कई लोगों को कंपनी से जोड़ा था.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अमरोहा से नोएडा आए 43 वर्षीय किसान अरुण कुमार ने भी कंपनी में एक लाख़ रुपये का निवेश किया था. एक निवेशक की नज़र से अरुण ने बीबीसी को कंपनी के काम करने का तरीका बताया.

  • कंपनी निवेशकों को 5,750 रुपये से लेकर 57,500 रुपये तक के पैकेज देती थी.
  • बदले में निवेशकों को रोज़ाना पैकेज के मुताबिक़ 25 से 125 वेब लिंक मिलते थे.
  • उन लिंक्स पर क्लिक करना होता था. जिस पर वेबपेज खुलता था, जो करीब 3 सेकेंड बाद बंद हो जाता था.
  • कंपनी हर क्लिक के 5 रुपये देती थी. भुगतान शुरूआत में रोज़ होता था, जिसे बाद में साप्ताहिक कर दिया गया.
  • वेबपेज एप्पल, फ़ेसबुक, फ़्लिपकार्ट जैसी बड़ी कंपनियों के होते थे तो कुछ पॉर्न साइट के लिंक भी होते थे.
  • निवेशकों को बताया गया था कि ये कंपनियां सोशल ट्रेड को क्लिक करवाने का पैसा देती हैं.

शुक्रवार को अरुण कुमार के गांव में कंपनी पर छापा पड़ने की ख़बर आते ही खलबली मच गई. उनके गांव में करीब 15 लोगों ने कंपनी में निवेश किया था, जिनमें कई के पास दो से तीन अकाउंट भी थे.

गांव में मौजूद भीम शर्मा भी किसान हैं और कंपनी के साथ उनके भी दो अकाउंट थे. वो बताते हैं, "कंपनी ने बीते बीस दिनों में करीब चार बार नाम बदला. सोशल ट्रेड से बदलकर इसे फ्री हब डॉटकाम, फिर इंटमार्ट डॉट कॉम और बाद में थ्री डब्ल्यू डॉट कॉम कर दिया गया. पहली बार नाम बदलते ही निवेशकों में डर पैदा हो गया था."

बाद में कंपनी ने पैसा जमा करवाने और लोगों को पेमेंट करने के लिए भी एक्सेस बैंक, येस बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक समेत कैनरा बैंक में अपना अकाउंट खोल लिया. भीम शर्मा बताते हैं, "अकाउंट चेंज होने का बाद सभी किसान भाई दुआ कर रहे थे कि किसी तरह मूल धन भी वापस मिल जाए, तो नुकसान नहीं होगा."

हालांकि कुछ निवेशक कंपनी की वापसी को लेकर निश्चिंत लगते हैं और मान रहे हैं कि कंपनी कागज़ पेश करेगी और संकट के बादल छट जाएंगे.

इस बीच शुक्रवार दोपहर बाद कंपनी की साइट को भी बंद कर दिया गया.

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घोटाला कैसे हुआ?

एसएसपी अमित पाठक ने बताया कि कंपनी ने निवेशकों को गलत बयानी करके फंसाया. कंपनी दावा करती थी कि लिंक विज्ञापनदाता से समझौता होने का बाद भेजा गया, जबकि ऐसा नहीं था. इसमें कोई थर्ड-पार्टी (विज्ञापनदाता) शामिल नहीं था. सभी लिंक फर्जी हुआ करते थे. कंपनी सिर्फ़ पैसा बनाने के लिए लोगों से मल्टी लेवल मार्केटिंग करवा रही थी और अपने खाते भर रही थी.

वहीं डिजिटल मार्केटिंग के विशेषज्ञ रवि चोपड़ा बताते हैं कि मनी सर्कुलेशन एक्ट, 1978 के तहत 'मल्टी लेवल मार्केटिंग' भारत में बैन है. और ऐसा नहीं है कि भारत में मल्टी लेवल मार्केटिंग में फ्रॉड का यह पहला मामला है. इससे पहले स्पीक एशिया और क्यू नेट जैसी कंपनियां लोगों को चूना लगा चुकी हैं. भारत में सोशल ट्रेड के अलावा कई अन्य कंपनियां अब भी ऐसी स्कीमों पर काम कर रही हैं.

मल्टी लेवल मार्केटिंग को सफल ढंग से पेश करने के लिए कंपनियां अक्सर कोई न कोई वर्किंग मॉडल बना लेती हैं. चाहें वो क्लिक के ज़रिए हो या फिर स्पीक एशिया की तरह ऑनलाइन सर्वे भरवाकर.

रवि बताते हैं कि मल्टी लेवल मार्केटिंग में अक्सर लोगों के पैसे मारे जाते हैं लेकिन इस मामले में संभवत: कंपनी को और भी ज्यादा आमदनी इसलिए हो रही होगी, क्योंकि कंपनी सिर्फ लोगों से फीस ले रही थी, जिसके बदले में उन्हें कोई वस्तु या सेवा नहीं मुहैया कराई जा रही थी.

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