ड्रग्स के आगे हवा हुए पंजाब में बाकी चुनावी मुद्दे!

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पंजाब के आम लोग नई सरकार चुनने के लिए शनिवार को वोट डाल रहे हैं. ऐसे में ये जानना दिलचस्प है कि इस चुनाव में पंजाब के लोगों के सामने क्या-क्या बड़े मुद्दे हैं?

दरअसल, पंजाब में ना तो नौकरी और ना ही भ्रष्टाचार कोई मुद्दा है, इस बार सबसे बड़ा मुद्दा ड्रग्स है, क्योंकि एक पूरी पीढ़ी को ड्रग्स ने अपने चपेट में ले रखा है.

ड्रग्स की वजह से पंजाब का कितना नुकसान हो रहा है, इसे आप मुख्तियार सिंह के दर्द से समझ सकते हैं.

वे अपने पारिवारिक एलबम से अपने बेटे मंजीत की तस्वीर को दिखाते हुए कहते हैं, "ये तब की तस्वीर है जब उसने स्कूली प्रतियोगिता जीती थी. मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि उसके साथ क्या होगा?"

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ड्रग्स के ओवरडोज की वजह से 28 साल के मंजीत की मौत बीते साल जून में हो गई थी. मुख़्तियार सिंह राज्य सरकार के बिजली विभाग में लाइनमैन हैं.

बेटे के शव को कांधा

उन्होंने अपने बेटे के शव के साथ अपने पूरे गांव में मार्च किया. उसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री को संबोधित एक ख़त भी लिखा.

इस पत्र के बारे में उन्होंने कहा, "मैंने उन्हें खत लिखा कि पंजाब के युवाओं को ड्रग्स से बचाने की ज़रूरत है. हमारे बच्चे मर रहे हैं और कुछ भी नहीं किया जा रहा है."

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इसके सात महीने बाद मुख़्तियार सिंह पंजाब में ड्रग्स की समस्या के बारे में अकेले ही मुहिम चला रहे हैं.

हाल ही में हुए एक सरकारी अध्ययन के मुताबिक़ राज्य में 15 से 35 साल के युवाओं में 8.60 लाख लोग किसी ना किसी रूप में ड्रग्स का सेवन कर रहा है.

इनमें से 53 फ़ीसदी युवा हेरोइन का सेवन करते हैं. इसके अलावा अफीम, गांजा और कृत्रिम ड्रग्स आईसीई और क्रिस्टल मेथ का इस्तेमाल भी युवा धड़ल्ले से कर रहे हैं.

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दो कमरों के अपने घर की छत पर बैठे मुख़्तियार बताते हैं, "पंजाब के युवाओं को बचाना मेरा मिशन है. मैंने अपने कंधे पर बेटे का शव ढोया है, मैं नहीं चाहता कि किसी दूसरे पिता को ऐसे दुख का सामना करना पड़े."

दो तिहाई परिवार पर असर

एक अनुमान के मुताबिक पंजाब के दो तिहाई घरों में कम से कम एक सदस्य ड्रग्स की लत का शिकार है.

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पूरे राज्य के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी क्षेत्र तक, आप युवाओं को समूहों में बैठकर ड्रग्स लेते देख सकते हैं, चाहे वो खेत का मैदान हो या कोई खाली पड़ा मैदान या फिर कब्रिस्तान.

पाकिस्तान की सीमा से सटे ज़िले तरनतारन में स्थिति और भी भयावह है. ज़िले के सरकारी अस्पताल में ड्रग्स की लत छुड़ाने का केंद्र भी है. यहां किसी भी वक्त ड्रग्स की लत वाले युवाओं को देखा जा सकता है.

हर जगह उपलब्ध है ड्रग्स

और इन युवाओं को ड्रग्स की खुराक बेचने वाला शख्स भी यहां तक पहुंच जाता है. 20 मिनट के समय में मैंने कई युवाओं को ड्रग्स की खेप ख़रीदते ख़ुद देखा.

इस अस्पताल से सटी दीवार के पास सैकड़ों इस्तेमाल की गई सिरींज और बोतलें देखी जा सकती हैं.

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तरनतारन निवासी जसप्रीत पहले ड्रग्स की लत के शिकार थे, चार साल तक ड्रग्स की लत छुड़ाने की कोशिशों के बाद अब जाकर वो सामान्य हुए हैं.

उन्होंने बताया, "बहुत आसानी से मिल जाती है, आप नाम लीजिए, जो चाहिएगा वो उपलब्ध है. जब मैंने पहली बार लिया था तो मुझे बहुत अच्छा लगा था. मुझे लगा था कि जीवन में अब तक यही चीज़ मिसिंग थी."

अब जसप्रीत दूसरों को ड्रग्स की लत से मुक्त कराने के अभियान से जुड़े हैं. वे ड्रग्स की चपेट में आए युवाओं की काउंसलिंग करते हैं.

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उन्होंने बताया, "मैं उनसे कहता हूं कि जब मैं ड्रग्स छोड़ सकता हूं तो कोई भी छोड़ सकता है."

पिछले कुछ सालों में राज्य के अंदर सैकड़ों ऐसे सेंटर बन गए हैं, जो ड्रग्स की लत से लोगों को छुटकारा दिलाने का दावा करते हैं.

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ऐसा एक सेंटर हर्मेटिज रीहैब सेंटर है. इसकी दो मंजिले इमारत के अंदर कई युवा हैं, जिन्हें मरीज नहीं छात्र कहते हैं, जिन्हें मनोचिकित्सीय और चिकित्सीय काउंसलिंग दी जाती है.

इनमें सभी तरह की पृष्ठभूमि के लोग शामिल हैं. जज, पुलिस अधिकारी, पॉप संगीतकार, छात्र और महिलाएं.

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केंद्र के निदेशक डॉ. जेपीएस भाटिया कहते हैं, "महिलाओं का इलाज करना मुश्किल होता है. कई को उनके परिवार वाले छोड़ चुके होते हैं. वे जिनसे मदद मांगती हैं, उन्हीं लोगों के द्वारा उनका यौन उत्पीड़न भी किया जाता है, जिसमें काउंसलर, डॉक्टर और पुलिस वाले भी शामिल होते हैं."

क्या है इसकी वजह?

पंजाब, पाकिस्तान की सीमा से सटा है, ऐसे में यहां ड्रग्स की तस्करी भी ख़ूब होती है. यही वजह है कि यहां हेरोइन आसानी से मिल जाती है.

लेकिन बड़ा सवाल यही है कि पंजाब के युवा इतनी आसानी से ड्रग्स की चपेट में क्यों आते हैं?

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दरअसल पंजाब में खेती-किसानी का विकास थम गया है. थोड़ा बहुत औद्योगिकीकरण भी हुआ है. इससे बेरोजगारी बढ़ी है.

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इसके अलावा 1980 के दशक में पंजाब चरमपंथी हिंसा की चपेट में भी रहा. इन सबके चलते ही युवाओं में ड्रग्स की लत तेजी से बढ़ी.

डॉ. भाटिया कहते हैं, "चरमपंथी हिंसा तो ख़त्म हो गई. लेकिन उसकी जगह ड्रग्स वाली हिंसा ने ले ली है. मुश्किल ये है कि इस हिंसा से निपटने की कोई तैयारी भी नहीं दिखती है.''

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