छत्तीसगढ़ के कंपनी मालिक क्यों इनसे डरते हैं?

  • 20 फरवरी 2017
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सूती साड़ी और हवाई चप्पल पहनने वाली सुधा भारद्वाज के बारे में अगर आप नहीं जानते तो पहली मुलाकात में आप उन्हें कोई घरेलू महिला मान लेने की भूल कर सकते हैं.

यह सादगी उनके घर से दफ़्तर तक हर कहीं पसरी हुई नज़र आती है. लेकिन इस सादगी से परेशान लोगों की फ़ेहरिस्त लंबी है.

अभी कुछ ही महीने पहले की बात है.

छत्तीसगढ़ में एक बहुराष्ट्रीय सीमेंट कंपनी के प्रबंधक ने बातों ही बातों में धीरे से कहा- "नाम मत लीजिए सुधा भारद्वाज का. उनके कारण हमारे यहां काम करने वाले मज़दूर हमारे सिर पर चढ़ गए हैं."

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बस्तर में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक टीम को पुलिस के आला अधिकारी ने चेतावनी दी, "अगर आप सुधा भारद्वाज को जानते हैं तो तय मानिए कि आप हमारे नहीं हो सकते."

लेकिन ऐसी राय रखने वालों से अलग छत्तीसगढ़ में कोंटा से रामानुजगंज तक ऐसे हज़ारों लोग मिल जाएँगे जिनके लिए वो सुधा दीदी हैं. शिक्षिका सुधा दीदी, वकील सुधा दीदी, सीमेंट मज़दूरों वाली सुधा दीदी, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा वाली सुधा दीदी.

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अर्थशास्त्री रंगनाथ भारद्वाज और कृष्णा भारद्वाज की बेटी सुधा का जन्म अमरीका में 1961 में हुआ था.

1971 में सुधा अपनी मां के साथ भारत लौट आईं. जेएनयू में अर्थशास्त्र विभाग की संस्थापक कृष्णा भारद्वाज चाहती थीं कि बेटी वह सब करे, जो वह करना चाहती है.

सुधा कहती हैं, "वयस्क होते ही मैंने अपनी अमरीकन नागरिकता छोड़ दी. पांच साल तक आईआईटी कानपुर से पढ़ाई के दौरान ही दिल्ली में अपने साथियों के साथ झुग्गी और मज़दूर बस्तियों में बच्चों को पढ़ाना और छात्र राजनीति में मज़दूरों के सवाल की पड़ताल की कोशिश शुरू की."

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शायद यही कारण है कि आईआईटी टॉपर होने के बाद भी किसी नौकरी के बजाय 1984-85 में वे छत्तीसगढ़ में शंकर गुहा नियोगी के मज़दूर आंदोलन से जुड़ गईं.

कुछ दिनों तक छत्तीसगढ़ आना-जाना लगा रहा लेकिन जल्दी ही बोरिया-बिस्तर समेटकर वे स्थायी रुप से छत्तीसगढ़ आ गईं.

दल्ली राजहरा के शहीद अस्पताल में एक मरीज़ को लेकर पहुंचे कोमल देवांगन बताते हैं, "सुधा और उनके साथियों ने मज़दूरो के बच्चों को पढ़ाने से लेकर उनके कपड़े सिलने तक का काम किया. नियोगी जी ने संघर्ष और निर्माण का जो नारा दिया था, सुधा भारद्वाज जैसे लोग उसे धरातल पर लाने वालों में से हैं."

जुझारू मज़दूर नेता शंकर गुहा नियोगी की 1991 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

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Image caption शंकर गुहा नियोगी की सचिव रही हैं सुधा भारद्वाज

छत्तीसगढ़ में मज़दूरों के हक़ की लड़ाई में सुधा भारद्वाज उतरीं तो फिर पलट कर नहीं देखा.

शंकर गुहा नियोगी के छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा को जब एक राजनीतिक दल की शक़्ल दी गई, तब सुधा भारद्वाज उसकी सचिव थीं.

लेकिन उसके बाद सुधा भारद्वाज अलग-अलग किसान और मज़दूर संगठनों में काम करते हुए भी पद संभालने से बचती रहीं.

वे आज भी अपने को एक सामान्य सामाजिक कार्यकर्ता ही मानती हैं.

छत्तीसगढ़ में सामाजिक संगठनों के समूह 'छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन' के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं, "सुधा दीदी, हमारे जैसे लोगों की प्रेरणास्रोत हैं. वे चुपचाप अपना काम करती चली जाती हैं."

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भिलाई में मज़दूरों की लड़ाई हो या एसीसी, लाफार्ज़-होलसिम कंपनी के विदेशी प्रबंधकों से लड़ाई और वार्ता का दौर; सुधा भारद्वाज का कहना है कि अधिकांश अवसरों पर सत्ता प्रतिष्ठान की पहली कोशिश हर तरह के आंदोलन को कुचलने की ही होती है. इसके लिए सारे उपक्रम अपनाये जाते हैं.

पूरे छत्तीसगढ़ में मज़दूर आंदोलन के दौरान सबसे बड़ा खर्चा मुक़दमों पर होता था. मज़दूरों के लिए मुक़दमों की तैयारी में पैसा भी जाता था और मेहनत भी.

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40 की उम्र में अपने मज़दूर साथियों की सलाह पर वक़ालत की पढ़ाई कर डिग्री ली और फिर आदिवासियों, मज़दूरों का मुक़दमा ख़ुद ही लड़ना शुरु किया.

मज़दूरों से जुड़े मामलों में फ़ैसले भी पक्ष में आने लगे क्योंकि मज़दूर संगठनों के भीतर काम करने के कारण उसके सारे दाँव पेंच जाने-समझे हुए थे. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ऐसे कई मुक़दमे लड़े गए.

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कुछ सालों बाद 'जनहित' नाम से वकीलों का एक ट्रस्ट बनाया और तय किया कि समाज के वंचित अलग-अलग समूहों के मुक़दमे मुफ़्त में लड़ेंगे.

बिलासपुर के अपने कार्यालय में फ़ाइलों के बीच उलझी सुधा भारद्वाज का अनुमान है कि उनके ट्रस्ट ने पिछले कुछ सालों में कोई 300 से अधिक मुक़दमे लड़े हैं, ज़िला अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक.

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मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ इकाई की महासचिव होने के नाते मानवाधिकार हनन के अलग-अलग मोर्चे पर सुधा भारद्वाज ने कई लड़ाइयां लड़ी.

बस्तर के फ़र्जी मुठभेड़ों की पड़ताल और फिर उसके मुक़दमों ने राज्य सरकार को कई अवसरों पर मुश्किल में डाला.

अवैध कोल ब्लॉक, पंचायत क़ानून का उल्लंघन, वनाधिकार क़ानून, औद्योगिकरण के मसले पर भी सुधा भारद्वाज की ज़मीनी लड़ाई की अपनी पहचान है.

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अपनी पूरी संपत्ति मज़दूर आंदोलन में लगा देने वाली सुधा भारद्वाज के पास संपत्ति के नाम पर दिल्ली में मां के हिस्से का एक मकान है, जिसका किराया मज़दूर यूनियन को जाता है.

सुधा भारद्वाज कहती हैं, "संगठन में आर्थिक तंगी तो बनी रही लेकिन हमने बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था की, अपना मज़दूरों का अस्पताल खोला."

मज़दूरों के मुक़दमें लड़ने वाली 'जनहित' भी समान विचारधारा वाले साथियों के चंदे से चलती है. मुक़दमों की ख़्याति ऐसी कि मुंबई हाईकोर्ट ने भी हाल ही में छह लाख रुपये 'जनहित' को दिए.

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सुधा भारद्वाज कहती हैं, "पीछे मुड़ कर देखती हूं तो मैं ख़ुश होती हूं कि मैंने मज़दूरों और आदिवासियों की लड़ाई में थोड़ा-सा साथ दिया. ऐसे लोग, जिनके जीवन में तमाम दुखों के बाद भी मनुष्य होने को बनाए और बचाए रखना पहली प्राथमिकता थी. मैं फिर से ऐसे ही जन्म लेना चाहूंगी, इन्हीं के बीच."

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