सरकारों के 'चहेते' कल्लूरी किसके लिए खलनायक?

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मध्य प्रदेश से अलग होकर जब छत्तीसगढ़ राज्य बना और अजीत जोगी ने मुख्यमंत्री की कमान संभाली, उस समय राज्य के कई अफ़सरों की चर्चा इसलिए होती थी क्योंकि वो अजीत जोगी को सार्वजनिक तौर पर 'डैडी' कहकर बुलाते थे.

भारतीय पुलिस सेवा के 1994 बैच के अफसर शिवराम प्रसाद कल्लूरी भी पहली बार उसी समय चर्चा में आए थे.

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कहा गया कि वो जोगी के खास हैं. बिलासपुर शहर में पुलिस अधीक्षक रहते हुए उन पर आरोप लगे कि वो मुख्यमंत्री अजीत जोगी की कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के लिए भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं पर दबाव बना रहे हैं.

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लेकिन सच कहा जाए तो करीने से संवारे गए बाल और माथे पर सफेद भभूत का टीका लगाने वाले कल्लूरी पहली बार सरगुजा में 'नायक' और 'खलनायक' बन कर एक साथ उभरे.

प्लानिंग के मास्टर

'प्लानिंग' के मास्टर कहे जाने वाले कल्लूरी ने सरगुजा में जाति और धर्म में बंटे माओवादियों के संगठन में सेंध लगाई. वहां एक के बाद एक कई मुठभेड़ हुई. माओवादी मारे जाने लगे या पकड़े जाने लगे. जो बचे, उन्होंने हमेशा के लिए झारखंड और बिहार का रुख़ कर लिया.

राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैंकरा कहते हैं, "कल्लूरी ने माओवादियों की कमर तोड़ दी और पूरी तरह से सरगुजा से माओवादियों का सफाया कर दिया. माओवादियों के आतंक से उन्होंने मुक्ति दिलाई."

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शिवराम प्रसाद कल्लूरी को 2006 में भारत सरकार ने वीरता के लिए पुलिस मेडल से नवाजा.

लेकिन यही वह दौर था, जब आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी धीरज जायसवाल को कथित तौर पर एक थाने का प्रभारी बनाने की ख़बरें सामने आईं.

इसी दौर में आरोप लगा कि कल्लूरी ने रमेश नगेशिया नामक कथित माओवादी को समर्पण के नाम पर थाने बुलाया और फिर उसे फ़र्जी मुठभेड़ में मार डाला.

नगेशिया की पत्नी लेधा के साथ कल्लूरी और दूसरे पुलिसकर्मियों द्वारा कथित बलात्कार का मुक़दमा हाई कोर्ट तक पहुंचा. लेकिन बाद में यह मुक़दमा वापस ले लिया गया.

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कल्लूरी रमन सिंह सरकार की पसंद बने रहे. वो नक्सल ऑपरेशन के डीआईजी के तौर पर दंतेवाड़ा में नियुक्त हुए तो उनसे सरकार को बड़ी उम्मीदें थीं.

कल्लूरी और विवाद

लेकिन 6 अप्रैल 2010 को ताड़मेटला में माओवादियों ने सीआरपीएफ के 76 जवानों को मारा तो बस्तर में पुलिस की मौजूदगी को लेकर सवाल खड़े होने लगे.

इसके बाद कल्लूरी ने गांव-गांव में अपनी पैठ बढ़ानी शुरू की. दंतेवाड़ा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और फिर डीआईजी के पद पर रहते हुए जंगल के इलाके में उनका दखल बढ़ता चला गया.

आज आम आदमी पार्टी की नेता सोनी सोरी कल्लूरी के ख़िलाफ़ प्रश्नवाचक चिह्न की तरह खड़ी हैं. उनसे मैंने पूछा था कि आपने कल्लूरी को पहली बार कब देखा था?

सोनी सोरी का जवाब था, "दंतेवाड़ा में रहते हुए कल्लूरी हमारे घर गांव में आते थे, मेरे पिता जी को पापा कहते थे. गांव में उनका आना-जाना लगा रहता था."

गांव-गांव में अपने समर्थकों का जाल और सलवा जुड़ूम के पुराने लोगों को लेकर काम करने की रणनीति से कल्लूरी ने माओवादियों पर कितना काबू पाया, यह कह पाना तो मुश्किल है लेकिन उसी समय ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुरम में सुरक्षाबलों द्वारा तीन महिलाओं की हत्या, बलात्कार और 252 घरों को जलाए जाने की घटना ने फिर से कल्लूरी की मुश्किलें बढ़ा दीं.

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हालांकि कल्लूरी ने इस घटना को माओवादियों द्वारा अंजाम दिेए जाने का दावा किया लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर की गई जांच के बाद सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में सुरक्षाबलों को ही इसके लिए ज़िम्मेवार ठहराया.

ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुरम के आदिवासियों के लिए राहत सामग्री लेकर पहुंचे स्वामी अग्निवेश पर जब दोरनापाल में सलवा जुड़ूम समर्थकों ने हमला बोला तो कल्लूरी फिर निशाने पर आ गए.

मुठभेड़ों का लंबा सिलसिला

आख़िरकार कल्लूरी का तबादला कर दिया गया. पुलिस मुख्यालय में आईजी रहते उनकी चर्चा केवल पुराने मुक़दमों को लेकर ही होती रही.

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कल्लूरी को 2014 में एक बार फिर बस्तर की कमान सौंपी गई. इस बार वो बस्तर के आईजी बनाए गए थे. इस बार मैदानी स्तर पर बस्तर को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया. आत्मसमर्पण और मुठभेड़ों का सिलसिला एक बार फिर शुरू हुआ.

दूसरी ओर बस्तर में सामाजिक संगठनों का समूह बनाकर प्रोपेगेंडा सेल तैयार किया कर माओवादियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला गया.

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सामाजिक कार्यकर्ता डी सुरेश कहते हैं, "यह सलवा जुड़ूम का शहरी संस्करण था, जिसमें धीरे-धीरे सामाजिक लोगों के बजाए अपराधियों ने कब्जा किया. जिसने भी पुलिस ज्यादती के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, आईजी कल्लूरी के संरक्षण वाले संगठनों ने उस पर हमला बोल दिया."

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हालाँकि लंबी छुट्टी पर जाने से पहले कल्लूरी ने कहा, "मेरा सभी से निवेदन है कि मेरी पोस्टिंग पर चर्चाएं ख़त्म करें और माओवाद की समस्या सुलझाने के लिए भविष्य में एक्शन लिया जाए. इस पर ध्यान केंद्रित करें क्योंकि हम इस फ़िज़ूल हिंसा और बड़े पैमाने पर होने वाली हत्याओं के ख़िलाफ़ लड़ाई को जीतने की दहलीज पर हैं."

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