'यूपी चुनाव में बीजेपी तो लड़ाई में है ही नहीं'

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2017 का यूपी का चुनाव अजित सिंह और उनकी पार्टी के लिए बेहद अहम.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी मुक़ाबले में ही नहीं है. ये दावा है राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह का.

उन्होंने एक ख़ास बातचीत में बीबीसी से कहा, "अब तक चुनाव अभियान के दौरान मैंने जितनी यात्रा की है, उसके आधार पर कह सकता हूं कि बीजेपी तो लड़ाई में ही नहीं है."

उनके इस दावे की क्या वजहें हो सकती हैं, इस बारे में अजित सिंह कहते हैं, "नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी की आलोचना ख़ुद बीजेपी वाले कर रहे हैं, मन ही मन. जनता की जुबान पर इनकी आलोचना भरी हुई है. लोग देख रहे हैं कितना अहंकार है इनके तौर तरीकों में."

यूपी चुनाव का वो फैक्टर जो बदल सकता है सारे समीकरण

अजित के दावों पर अगर भरोसा करें तो यूपी चुनाव में मुक़ाबला अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले गठबंधन और मायावती की बहुजन समाज पार्टी के बीच होने वाला है.

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वो कहते हैं, "अब चुनाव चेहरे पर फोकस होता जा रहा है- अखिलेश का चेहरा या फिर मायावती अच्छी लगती हैं, लेकिन एक आदमी कुछ भी नहीं कर रहा है, पार्टी किन मुद्दों पर खड़ी है, मतदाताओं को इस पर ध्यान देना चाहिए."

सांप्रदायिकता को बढ़ावा

वहीं उनके मुताबिक भारतीय जनता पार्टी राज्य में एक बार फिर से सांप्रदायिकता को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने कहा, "चुनाव प्रचार में बीजेपी मानवतावादी सोच की बात कर रही है, लेकिन ये सोच कहां ग़ायब थी, जब नोटबंदी से 150 लोग लाइन में खड़े होकर मर गए. कहां होती ये सोच जब योगी जी कहते हैं कि पश्चिम उत्तर प्रदेश को कश्मीर मत बनने दो. थाना भवन के विधायक कहते हैं कि मुझे विधायक बनाओ मुरादाबाद-देवबंद में कर्फ़्यू लगेंगे. कैराना को इन लोगों ने बदनाम किया."

सीटों के बंटवारे को लेकर रूठा आरएलडी

भारतीय जनता पार्टी का इतना विरोध करने के बाद भी राष्ट्रीय लोकदल, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन में क्यों शामिल नहीं हुई?

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इस सवाल पर अजित सिंह कहते हैं, "इसका जवाब तो वही लोग दे सकते हैं. हमने सबसे पहले विपक्ष को एक मंच पर लाने की कोशिश की, सारी पहल की, लेकिन कुछ तो स्वार्थ टकराए होंगे जिसके चलते हम गठबंधन में शामिल नहीं हैं. इससे ज़्यादा टिप्पणी नहीं करूंगा. लेकिन मैं मेहनत कर रहा हूं, लोगों का साथ मिल रहा है."

मुसलमानों मतदाताओं का डर

दरअसल, समाजवादी पार्टी से जुड़े लोगों का मानना है कि राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन की सूरत में मुस्लिम लोगों का समर्थन छिटक सकता था, क्योंकि मुजफ़्फ़रनगर दंगे के बाद पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाट और मुस्लिम एक साथ नहीं हो सकते.

लेकिन अजित सिंह बिलकुल इससे उलट दावा करते हैं, "मुस्लिम समुदाय का साथ हमें जिस तरह से मिल रहा है, उससे हमारा उत्साह बढ़ा है. जाटों के अलावा दूसरे समुदाय के लोग भी हमारे साथ आ रहे हैं."

यही वजह है कि अजित अखिलेश सरकार के कामकाज पर सवालिया निशान भी उठाते हैं, "आज अखिलेश अपनी छवि साफ़ बता रहे हैं, लेकिन पांच साल तक तो यही मुख्यमंत्री रहे. राज्य में दंगे हुए, हर साल दो हज़ार रेप और 5000 मर्डर होते हैं. इनकी एकमात्र उपलब्धि है लखनऊ में मेट्रो बनाई, 50 करोड़ रुपए प्रति किलोमीटर लागत वाली एक सड़क बनाई. पूरे राज्य को उन्होंने क्या दिया?"

अजित सिंह के 'इतने बुरे दिन कभी ना थे'

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2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान जाट समुदाय ने भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में वोट दिया था, लेकिन जाट समुदाय ने कई धड़े ने महापंचायत करके इस बार बीजेपी को वोट नहीं देने की बात कही है. यही वो पहलू है जो अजित सिंह के लिए उम्मीद जगा रहा है.

इस बार का यूपी चुनाव अजित सिंह और उनकी पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन चुका है, इसका अंदाजा अजित सिंह को भी है. उन्होंने जहां एक ओर पश्चिम उत्तर प्रदेश में अपनी पूरी ताक़त झोंकी हुई है, वहीं अकेले पड़ने के बावजूद नए लोगों को साथ में लाने की कोशिश भी जारी है.

300 से ज़्यादा सीटों पर मैदान में

अजित बताते हैं, "बीते दस सालों में ये पहला मौका है जब हम पूर्वांचल, बुंदेलखंड, मध्य उत्तर प्रदेश जैसी जगहों से भी चुनाव लड़ रहे हैं. 300 से ज़्यादा सीटों पर हम चुनाव लड़ने जा रहे हैं."

2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी का कांग्रेस के साथ गठबंधन था. रालोद ने 46 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें नौ सीटों पर उन्हें जीत मिली थी. हालांकि इस बार अजित सिंह के खेमे में वो लोग ज़्यादा आए हैं, जिनको उनकी पार्टी ने टिकट नहीं दिया है. पर अजित सिंह को भरोसा है कि इस बार उनकी स्थिति बेहतर होगी.

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ऐसे में अगर किसी दल या गठबंधन को बहुमत नहीं मिला तो अचानक से अजित सिंह की भूमिका बेहद अहम हो सकती है. हालांकि वो यह भी कहते हैं कि चुनाव के बाद चाहे जो तस्वीर उभरे वे भारतीय जनता पार्टी के साथ नहीं जाएंगे.

अजित सिंह की पार्टी पूरे राज्य में अकेले चुनाव लड़ रही है, लेकिन उसका जनाधार पश्चिम उत्तर प्रदेश में मज़बूत रहा है. 11 फरवरी को राज्य में पहले चरण के चुनाव में पश्चिम उत्तर प्रदेश के 15 ज़िलों में 73 विधानसभा सीटों पर मतदान होना है.

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