नज़रिया: ये चुनावी नतीजे तय करेंगे 2019 की दशा-दिशा

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हमारे जैसे लोकतंत्र में हर चुनाव का अपना महत्व होता है. मगर फ़रवरी से मार्च 2017 के बीच हो रहे पांच राज्यों के चुनाव कई दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण हैं.

ये चुनावी नतीजे सिर्फ़ उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में नई सरकार के गठन का रास्ता ही साफ नहीं करेंगे, उनसे 2019 के संसदीय चुनावों के भावी राजनीतिक-समीकरण की दिशा भी तय होगी.

इसकी वजह है- उत्तर प्रदेश, जो आबादी के हिसाब से देश का सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से सबसे प्रभावकारी राज्य है. यहां विधानसभा की 403 और लोकसभा की 80 सीटें हैं. इसलिए 403 विधानसभा सीटों के लिये हो रहे चुनाव के नतीजे राष्ट्रीय राजनीति का भावी स्वरूप भी निश्चित करेंगे.

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2014 के संसदीय चुनाव में महज 44 सीटों पर सिमट कर रह गई देश की सबसे पुरानी और सबसे लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी को बीते तीन बरसों के दौरान लगभग हर मुकाम और ज़्यादातर सूबों में विफलता मिली. असम, अरुणाचल, हरियाणा, महाराष्ट्र और केरल जैसे अहम राज्य उसके हाथ से निकल गए.

2015 में उसे सिर्फ़ बिहार में सत्ता की हिस्सेदारी मिली लेकिन वहां की चुनावी जीत का सेहरा लालू-नीतीश की जोड़ी को पहनाया गया. उसे सिर्फ़ अपेक्षाकृत छोटे और केंद्रशासित राज्य पुड्डुचेरी में कामयाबी मिली. लेकिन राष्ट्रीय राजनीति पर उसका कोई असर नहीं पड़ना था.

इस वक्त जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, वे सभी अलग-अलग कारणों से भावी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने वाले हैं.

कांग्रेस-सपा गठबंधन के मायने

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केंद्रीय राजनीति में विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस ने आगे बढ़कर अखिलेश यादव की अगुआई वाली समाजवादी पार्टी के साथ यूपी में गठबंधन किया है.

उसने राज्य के लिये अपनी तरफ़ से मुख्यमंत्री के लिए घोषित अपनी उम्मीदवार शीला दीक्षित को मैदान से हटाते हुए अखिलेश की अगुआई में चुनाव लड़ना तय किया.

इस गठबंधन को अमली जामा पहनाने में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका वाड्रा की ख़ास भूमिका मानी जा रही है.

सपा अध्यक्ष अखिलेश तो बहुत पहले से इस गठबंधन की वकालत कर रहे थे. कुछ माह पहले उन्होंने दिल्ली में एक मीडिया कॉन्क्लेव में कहा था, "चुनाव के बाद अपने बल पर हमारी सरकार बनेगी. अगर कांग्रेस से सपा का गठबंधन हो गया तो दोनों मिलकर 300 से भी ज़्यादा सीटें जीतेंगे."

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ज़ाहिर है, दोनों दलों ने इस गठबंधन को बहुत सोच-समझकर बनाया है. वे इसके जरिये भावी राष्ट्रीय राजनीति के मौजूदा समीकरणों को बदलना चाहते हैं.

अगर उत्तर प्रदेश में गठबंधन को सफलता मिली तो राहुल-अखिलेश की जोड़ी भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री मोदी के सामने बड़ी चुनौती खड़ा कर सकती है.

निस्संदेह, यह गठबंधन केंद्रीय स्तर पर भी आजमाया जायेगा और इसके साथ अन्य सेक्युलर दलों-संगठनों को जोड़ने की कोशिश होगी.

यूपी में गठबंधन को अगर अल्पसंख्यकों का भरपूर समर्थन मिला तो इस बात का फैसला अभी हो जायेगा कि अल्पसंख्यक समुदाय लोकसभा के आगामी चुनाव में कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन को ही सर्वोच्च प्राथमिकता देगा. वह सेकुलर खेमे के अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ जुड़कर अपने वोटों में बेवजह विभाजन नहीं करेगा.

नोटबंदी के बाद मोदी-अमित जोड़ी की अग्निपरीक्षा

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चंडीगढ़ नगर निगम के चुनावों में शानदार जीत दर्ज करने के बाद भाजपा के बड़े नेताओं ने दावा किया कि शहर की जनता ने नोटबंदी पर मोदी सरकार के फैसले का अनुमोदन कर दिया है.

जो लोग चंडीगढ़ शहर की आबादी और सामाजिक संरचना से वाकिफ़ हैं, निश्चय ही वे सत्ताधारी दल के इस दावे पर हंसे होंगे. लेकिन यूपी और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण सूबों के चुनाव में वाकई नोटबंदी पर लोगों की राय का अंदाज़ मिल सकता है.

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2014 के संसदीय चुनाव के दौरान यूपी में भाजपा को अभूतपूर्व सफलता मिली थी. उसने 80 में 71 सीटें जीत लीं. इस बार के विधानसभा चुनाव में मोदी-लहर की 2014 वाली सफलता भाजपा को मुंह चिढ़ाती नजर आ रही है.

स्वयं भाजपा के बड़े रणनीतिकार भी अनौपचारिक बातचीत में मानते हैं कि उतनी बड़ी सफलता दोहराना अब संभव नहीं. इसकी वजह सिर्फ नोटबंदी नहीं है.

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अन्य कारण भी भाजपा की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं. इनमें प्रमुख हैं-किसानों की नाराजगी, मोदी सरकार के 'विकास-एजेंडे' पर भरोसा न बनना, यूपी में अखिलेश-राहुल के गठबंधन का आकर्षण, बसपा के दलित-जनाधार में जो बिखराव 2014 में देखा गया, उसका फिर से नीले झंडे के नीचे आना और अभी तक यूपी में किसी जहरीले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का आकार न लेना, जिसका फायदा उठाने में भाजपा अक्सर आगे रहती है!

पार्टी के कुछ नेताओं के प्रयासों के बावजूद राममंदिर जैसा मसला चुनावी-मुद्दा नहीं बन पाया.

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नोटबंदी ज़रूर एक मसला है. मोदी सरकार इसे अर्थव्यवस्था के लिये बहुत 'बड़ी क्रांति' या 'सुधार' बताती आ रही है. लेकिन भाजपा ने पूरे यूपी में नोटबंदी की 'क्रांति' या 'महासुधार' का एक भी पोस्टर-बैनर इस चुनाव में नहीं लगाया. इस तथ्य से नोटबंदी को लेकर सरकार के दावे की पोल ही नहीं खुलती, भाजपा की मौजूदा चुनौतियों का भी खुलासा होता है.

शायद, इन्हीं कारणों से यूपी का चुनावी परिदृश्य अभी तक भाजपा के लिये कोई बड़ा सकारात्मक संकेत नहीं दे रहा है.

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अगर नतीजे वाकई भाजपा के पक्ष में नहीं गये तो भाजपा-संघ की राजनीति में मोदी-अमित जोड़ी का आकर्षण निश्चय ही कम होगा. हाशिये पर पड़े भाजपाइयों को सिर उठाने का मौक़ा मिलेगा. पार्टी और संघ की कतारों में नोटबंदी और सरकार के अन्य फैसलों पर खुलेआम सवाल उठाने शुरू हो जायेंगे.

पंजाब-उत्तराखंड-गोवा

राष्ट्रीय राजनीति के लिये यूपी की तरह ज़बरदस्त प्रभावकारी न होने के बावजूद 117 सीटों वाले पंजाब, 70 सीटों वाले उत्तराखंड और 40 सीटों वाले गोवा की चुनावी लड़ाइयां कुछ कम दिलचस्प नहीं.

इन सबका प्रांतीय-राजनीति के अलावा राष्ट्रीय राजनीति पर भी कुछ न कुछ असर पड़ना लाज़मी है.

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पंजाब और गोवा के नतीजे दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय-राजनीति में हस्तक्षेप की महत्वाकांक्षा का भविष्य तय करेंगे.

आम आदमी पार्टी बीते तीन बरसों से पंजाब में लगातार काम कर करती आ रही है. उसने अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार के खिलाफ पंजाब में फैलते नशे के सवाल को प्रमुखता से उठाया. लेकिन कांग्रेस की मजबूत दावेदारी के चलते उसका रास्ता उतना निरापद नहीं.

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पंजाब और गोवा, दोनों राज्यों में त्रिकोणीय मुक़ाबला है.

'आप' की गोवा में भी असरदार मौजूदगी है. पर यही एक राज्य है, जहां भाजपा को सर्वाधिक उम्मीद है. संघ के बागी सुभाष वेलिंगकर ने अपनी नई पार्टी के साथ महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी और शिव सेना को भी जोड़ा है.

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Image caption भाजपा से नेता रहे नवजोत सिंह सिद्धू ने हाल ही में कांग्रेस का दामन थाम लिया है

देखना है, क्या वे गोवा में भाजपा के जनाधार में सेंध लगा पाते हैं या नहीं!

जहां तक उत्तराखंड का सवाल है, सत्ता के दोनों प्रबल दावेदारों-कांग्रेस और भाजपा के पास किसी तरह की नैतिक आभा नहीं है. कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर से जूझ रही है तो भाजपा के पास 'दलबदलुओं' की भरमार है.

मणिपुर का समर

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Image caption मणिपुर के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी बीते 15 साल से राज्य के मुख्यमंत्री हैं

राजनीतिक हलकों और मुख्यधारा मीडिया में मणिपुर के चुनावों के कोई खास चर्चा नहीं है. वैसे भी भारत का मुख्यधारा मीडिया पूर्वोत्तर के कवरेज में ज़्यादा रूचि नहीं दिखाता.

इस बार मणिपुर जिस हालात में अपनी नई विधानसभा का चयन करने की तैयारी कर रहा है, वह काफ़ी कुछ असामान्य है. नगा-संगठनों के आह्वान पर नाकेबंदी से मणिपुर में अफ़रा-तफ़री मची हुई है.

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केंद्र सरकार की यह बड़ी विफलता है कि मणिपुर का चुनाव आज सामान्य परिस्थितियों में नहीं हो रहा है. 60 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव में राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री इबोबी सिंह सरकार बनाने की चौथी बार कोशिश कर रहे हैं.

मणिपुर की चुनावी जंग में सिर्फ इबोबी सिंह ही नहीं, पूर्वोत्तर की मशहूर आंदोलनकारी इरोम शर्मिला चानू की राजनीति का भविष्य भी तय होना है. वह इबोबी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं.

माना जा रहा है कि शर्मिला मणिपुर की सियासत में भविष्य की नेता हैं.

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