केवल चुनावी वादा है- 'गंगा को साफ़ कर देंगे'

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"हमने टीवी पर देखा कि नमामि गंगे परियोजना शुरू हुई है, लेकिन बस टीवी पर ही. गंगा का तो वही हाल है. खुलेआम नाले गिर रहे हैं, कचरा बह रहा है."

चुनाव और गंगा के बारे में सवाल पूछने पर तीर्थपुरोहित मधुसूदन कौशिक आवेश में आ जाते हैं. लेकिन ये सिर्फ़ अकेले उन्हीं की राय नहीं है.

हरिद्वार में हर की पैड़ी पर गंगा-आरती के बाद पुरोहितों के बीच भी चुनाव चर्चा शुरू हो जाती है. आख़िर ये मुख्यमंत्री हरीश रावत का क्षेत्र है. लोकसभा सीट पर बीजेपी के रमेश पोखरियाल निशंक हैं.

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गंगा से ज़्यादा प्रदूषण किस नदी में है?

"जब भी चुनाव आता है नेता आकर वादा करते हैं कि हम गंगा को साफ़ कर देंगे. प्रदूषण ख़त्म होगा. गंगा निर्मल और अविरल बहेगी, लेकिन फिर गंगा की सुध कोई नहीं लेता." ये कहना है तीर्थपुरोहित अनुज प्रधान का.

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"गंगाजी की साफ़-सफ़ाई की बात तो सभी राजनैतिक पार्टियां करती हैं, लेकिन जो काम बेसिक स्तर पर होना चाहिए वो कहां होता है."

गंगा सभा से जुड़े मधुसूदन कौशिक कहते हैं कि, "नमामि गंगे में दावा किया गया कि गोमुख से लेकर गंगा सागर तक गंगा को साफ़ कर दिया जाएगा. उमा जी आईं और कहकर चली गईं. उसके बाद से हम इंतज़ार ही कर रहे हैं कि यहां कोई ट्रीटमेंट प्लांट लगेगा."

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गंगा के पुनरुद्धार के लिए केंद्र ने 1500 करोड़ की लागत से एक अत्यंत महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की है जिसका नाम है 'नमामि गंगे'. जुलाई 2016 में उमा भारती हरिद्वार आईं और इस परियोजना के तहत एक अति भव्य समारोह में उत्तराखंड में 250 करोड़ रुपयों की योजनाओं का उद्घाटन किया था.

वहां मौजूद एक श्रद्धालु विनय जैन की राय है कि गंगा की सफ़ाई अकेले सरकार का मसला नहीं है, "सरकार की तरफ़ से जो परियोजना आती है उसके साथ ही आम आदमी का कर्त्तव्य भी बनता है कि वो गंगा को स्वच्छ रखे."

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हरिद्वार में भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, भेल में एक्ज़ीक्यूटिव विनोद अग्निहोत्री का कहना है, "ये तो मुख्यमंत्री का क्षेत्र है वो यहां से सांसद रहे और अभी भी यहीं से चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन उन्होंने गंगा के लिए क्या किया. अवैध खनन को खुली छूट दी और दोनों हाथों से ठेके बांटे."

गंगा से अवैध खनन एक बड़ा मसला है. बड़े-बड़े कट आउट्स में बीजेपी नेता निशंक की फ़ोटो लगी है और अपील है कि अवैध खनन को रोकने के लिये बीजेपी को वोट दें.

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2500 किलोमीटर लंबी गंगा भारत की सबसे बड़ी नदी होने के साथ-साथ सबसे अधिक प्रदूषित भी है. इसका उद्गम उत्तराखंड के गोमुख ग्लेशियर से होता है और यहां की अर्थव्यवस्था में इसका बड़ा योगदान है.

गंगा और उसकी सहायक नदियों पर यहां छोटी-बड़ी कई बिजली परियोजनाएं हैं और धार्मिक महत्त्व की वजह से देवप्रयाग, ऋषिकेश और हरिद्वार आदि स्थानों में धार्मिक पर्यटन से आय का ये एक बड़ा स्रोत भी है. क्या दोष सिर्फ नेताओं का है?

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ऋषिकेश में ठेकेदार घनश्याम शर्मा का कहना है, "राजीव गांधी ने भी तो गंगा मिशन (गंगा एक्शन प्लान) शुरू किया था. करोड़ों रुपए ख़र्च कर दिए गए, लेकिन गंगा तो मैली ही रही और भ्रष्टाचार की जो गंगा बही उसमें सबने हाथ धोए. उस प्रोजेक्ट से जुड़े लोग मालामाल हो गए. अभी भी जैसे ही 'नमामि गंगे' की परियोजना शुरू हुई है लोगों ने इसमें पोस्टिंग लेने के लिए जुगाड़ लगाना शुरू कर दिया है. इसमें पैसा आता है न."

गंगा पर बन रही बांध परियोजनाएं भी विवादों के घेरे में रही हैं. कभी संवेदनशील पर्यावरण के नाम पर तो कभी गंगा से जुड़ी धार्मिक भावनाएं और गंगा को अविरल बहने देने के नाम पर उनका विरोध होता रहा है.

किसानों से भी है गंगा को ख़तरा!

गोमुख से उत्तरकाशी के बीच गंगा के रास्ते में उस पर बन रही बिजली परियोजनाओं को फिलहाल रोक दिया गया है. इसके लिए केंद्र ने गंगा बेसिन प्राधिकरण भी बनाया है और अदालत में भी मामले लंबित हैं. लेकिन इस पर किसी भी पार्टी की नीति स्पष्ट नहीं है.

राजनीतिक पार्टियां इस संवेदनशील मुद्दे को हाथ नहीं लगाना चाहतीं क्योंकि गंगा से जुड़ी धार्मिक भावनाओं का अपना एक वोट बैंक है. याद रहे कि बनारस से लोकसभा के लिए अपनी उम्मीदवारी दाख़िल करते हुए नरेंद्र मोदी ने यही कहा था, "मां गंगा ने मुझे बुलाया है."

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लेकिन धार्मिक आख्यानों में "मोक्षदायिनी" कही जाने वाली गंगा को ख़ुद अपनी मुक्ति की तलाश है.

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