नज़रिया: मायावती पर मुसलमानों को कितना भरोसा?

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में हमेशा की तरह मुस्लिम वोटों को लेकर राजनीतिक दलों में जबरदस्त रस्साकशी जारी है.

सवाल ये उठ रहा है कि क्या मुसलमानों का वोट पिछले सूबाई चुनावों की तरह इस बार भी समाजवादी पार्टी (अब उसका कांग्रेस के साथ गठबंधन है) की झोली में जाएगा या फिर कई पार्टियों में बंट जाएगा?

कांग्रेस से गठबंधन कर समाजवादी पार्टी शायद उस नुक़सान की भरपाई की कोशिश कर रही है जिसका डर उसे चुनावी वादे पूरे न कर पाने की वजह से था.

यह गठबंधन 'सेक्यूलर वोटों' के बंटवारे को रोकने के लिए किया गया है लेकिन इसमें बड़ा पेंच बहुजन समाज पार्टी ने डाला है - उत्तर प्रदेश चुनावों में सबसे ज़्यादा 97 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतार कर.

समझा जा रहा है कि ये मायावती की ख़ुद को मुसलमानों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की कोशिश का हिस्सा है.

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सूबे की जिन सीटों पर मुस्लिम वोटों की तादाद ज़्यादा है, वहाँ असदउद्दीन ओवैसी की मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और डॉक्टर अय्यूब की पीस पार्टी ने भी अपने-अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुस्लिम बहुल सीटों पर अजीत सिंह के लोकदल ने भी मुस्लिमों को टिकट दिए हैं.

मुस्लिम बाहुल्य इलाक़ों में इतने ज़्यादा मुस्लिम उम्मीदवारों की मौजूदगी ने मुस्लिम मतदाताओं को बड़ी उलझन में डाल दिया है कि वह अपने मत का प्रयोग किसके हक़ में करें, क्योंकि सभी उनके हितैषी हाने का दावा कर रहे हैं.

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समाजवादी पार्टी विकास के नारे पर वोट मांग रही है. उसके चुनावी घोषणा पत्र में इस बार मुसलमानों के लिए 18 फ़ीसद आरक्षण जैसा कोई दिलकश नारा नहीं है. न ही इस बार मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के मुखिया हैं जो हर चुनाव में कारसेवकों पर गोलियां चलवाने का क्रेडिट लेकर मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं.

लेकिन समाजवादी पार्टी को इस बार मुस्लिम हलकों में मुज़फ्फ़रनगर दंगे और दादरी की घटना का जवाब देना होगा. इन दोनों का उसके पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं है.

मायावती को भरोसा है कि उनकी सबसे अधिक मुस्लिम उम्मीदवारों की रणनीति अपना असर दिखाएगी.

ख़ास बात यह है कि बहुजन समाज पार्टी की मुखिया ने पहली बार मुसलमानों को सीधे तौर पर संबोधित करने की कोशिश की है.

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मायावती दलितों के 22 फ़ीसद वोट के साथ मुसलमानों के 19 प्रतिशत वोटरों को जोड़कर अपना बेड़ा पार करना चाहती हैं.

पूर्वांचल के मुस्लिम वोटरों को अपनी तरफ ख़ींचने के लिए मायावती ने अंसारी बंधुओं से हाथ मिलाया है और उनकी पार्टी क़ौमी एकता दल का बहुजन समाज पार्टी में विलय हो गया है.

इसका फ़ायदा उन्हें पूर्वांचल की कुछ सीटों पर मिल सकता है.

मुसलमान किसे वोट दें, इस सवाल पर ग़ाज़ीपुर के अधिवक्ता अनवार आलम ख़ां कहते हैं, "मुसलमानों के सामने बीजेपी की शक्ल में आगे खाई और समाजवादी गठबंधन की शक्ल में पीछे कुंआ है."

उनके मुताबिक़ यही वक़्त है जब मायावती को खुले दिल व दिमाग़ से मुसलमानों को अपना लेने की ज़रूरत है.

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मायावती अपनी चुनावी सभाओं में ये आश्वासन दे रही हैं कि अगर उनकी सरकार बनी तो वे दंगे नही होने देंगीं.

मायावती जब-जब उत्तर प्रदेश में सरकार में रही हैं तो सांप्रदायिक हालात क़ाबू में रहे हैं और कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ है.

मुज़फ्फ़रनगर दंगे और दादरी प्रकरण अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार के दौर में ही हुए.

और समाजवादी पार्टी ने इन मामलों में मुसलमानों को मुआवज़े के अलावा और कुछ नहीं दिया है.

लेकिन मायावती के ख़िलाफ़ जो बात मुस्लिम वोटरों के मानस में है वो है उनका भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से दो बार सरकार बनाना.

कुछ लोग कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार इसलिए घोषित नही किया है क्योंकि बहुमत ना मिलने की सूरत में वो बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनवा सकती है.

चुनाव के इस मौसम में कुछ बुद्धिजीवी दलित-मुस्लिम एकता के महत्व को उजागर करने का प्रयास भी कर रहे हैं.

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नेशनल कमीशन फ़ॉर माइनरटीज़ एजूकेशनल इंस्टीट्यूशन के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस सुहेल एजाज़ सिद्दीक़ी का कहना है कि समय की मांग है कि मुसलमान दलितों के साथ मिलकर अपनी समस्याओं का समाधान तलाश करें.

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मुसलमान पिछड़ेपन का शिकार हैं उसी प्रकार दलित भी हैं. मुसलमानों की बहुत सारी समस्याओं का समाधान दलितों के साथ गठबंधन में है.

उन्होंने कहा कि हमें दलितों के पास जाना चाहिए और उनका यक़ीन हासिल करना चाहिए.

हालांकि फ़िलहाल उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों का रूझान सपा-कांग्रेस गठबंधन की तरफ़ अधिक नज़र आ रहा लेकिन मायावती इस 'वोट बैंक' में अपना हिस्सा पाने के लिए ज़बरदस्त प्रयास कर रही हैं.

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