ग्राउंड रिपोर्ट: ‘नेतृत्वशून्य’ क्यों हो गया यूपी का पूर्वांचल?

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कुशीनगर के एक सरकारी स्कूल में शिक्षक प्रभाकर श्रीवास्तव से जब गोरखपुर में हमारी मुलाक़ात हुई तो कहने लगे कि इस शहर का जो भी विकास हुआ है, वो वीर बहादुर सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुआ है.

विकास का नाम सुनकर थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि गोरखपुर में विकास जैसी चीज़ बहुत ढूंढने से भी कहीं दिख नहीं रही थी.

हालांकि विकास के तमाम आधुनिक प्रतीक मसलन, मॉल, प्लाज़ा, रेस्टोरेंट, मोबाइल की दुकानें ज़रूर वहां थीं लेकिन सड़कें, नालियाँ जैसी आधारभूत चीज़ें लगभग नदारद थीं.

प्रभाकर श्रीवास्तव मेरी इस जिज्ञासा को भांप गए और फिर उन्होंने विकास के साथ 'जो भी हुआ है' शब्द पर ज़ोर दिया.

उनका कहना था कि इसके पहले यहाँ की दशा और दयनीय थी.

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गोरखपुर ही नहीं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश की ओर जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे लगभग हर ज़िले में विभिन्न पार्टियों के बड़े नेताओं का ज़िक्र होगा.

1990 से पहले प्रदेश के कई मुख्यमंत्रियों का भी संबंध इसी इलाक़े से रहा.

प्रभावी भूमिका में नहीं हैं नेता

वाराणसी और चंदौली से कमलापति त्रिपाठी, चंदौली से ही राजनाथ सिंह, जौनपुर से श्रीपति मिश्र, आज़मगढ़ से रामनरेश यादव और गोरखपुर से वीर बहादुर सिंह जैसे मुख्यमंत्री तो कल्पनाथ राय, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, राजमंगल पांडेय जैसे तमाम नेताओं के बारे में लोग चर्चा करते मिलेंगे.

लेकिन पिछले ढाई-तीन दशक से राजनाथ सिंह को छोड़कर न तो यहां का कोई नेता मुख्यमंत्री बना और न ही प्रदेश या देश की राजनीति में प्रभावी भूमिका निभा पाया.

यही नहीं, मौजूदा समय में भी किसी भी पार्टी की ओर से इस इलाक़े से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की संभावना कम ही दिख रही है.

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ये अलग बात है कि बीजेपी में कलराज मिश्र, राजनाथ सिंह, मनोज सिन्हा और योगी आदित्यनाथ की चर्चा बड़े नेताओं में होती है लेकिन पार्टी तमाम कोशिशों के बावजूद इनमें से किसी को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर आगे नहीं किया गया है.

वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय कहते हैं, "पहली बात तो ये कि इनमें से वीरबहादुर सिंह और कमलापति त्रिपाठी को छोड़कर कोई भी मुख्यमंत्री बहुत प्रभावी नहीं था और न ही किसी को बहुत ज़्यादा काम करने का मौक़ा मिला. और पूर्वांचल में कोई क्षेत्रीय पार्टी भी नहीं बनी जो इस ओर ध्यान देती."

एक ही नेता के भरोसे पार्टी

उनका ये भी कहना है कि अब तो बीजेपी और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों में भी सिर्फ़ एक ही नेता हैं.

उन्होंने कहा, "बीएसपी और सपा की बात छोड़ दीजिए अब तो भाजपा में भी सिर्फ़ नरेंद्र मोदी नेता और कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी. वामपंथी दलों का कोई मतलब अब रह ही नहीं गया है."

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दयानंद पांडेय के मुताबिक राष्ट्रीय पार्टियों ने जानबूझकर जनाधार वाले नेताओं को मुख्यमंत्री नहीं बनाया और क्षेत्रीय पार्टियों में उसकी संभावना ही नहीं है.

इसलिए पूर्वांचल में नेतृत्वशून्यता जैसी स्थिति बनी हुई है.

स्थानीय लोगों के मुताबिक विकास की दौड़ में भी पूर्वांचल के पिछड़ने के पीछे एक बड़ा कारण नेतृत्व संकट है.

मऊ ज़िले के पत्रकार वीरेंद्र चौहान कहते हैं, "पिछले पंद्रह-बीस साल से तो सपा और बसपा ही सरकार में हैं. इनके नेताओं का पूर्वांचल से कोई लेना-देना नहीं है. दूसरे इन लोगों ने इस इलाक़े में कोई बड़ा नेता बनने भी नहीं दिया."

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Image caption कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में कमलापति त्रिपाठी की धाक हुआ करती थी

प्रदेश का नेतृत्व जब यहां के नेताओं के हाथ में था तो विकास के कई कार्यक्रम भी यहां चले लेकिन नेतृत्व चले जाने के चलते विकास कार्य लगभग बंद से हो गए.

हालांकि कहा ये जाता है कि वीर बहादुर सिंह, कमलापति त्रिपाठी और कल्पनाथ राय ने भी विकास कार्यों को सिर्फ़ अपने चुनावी क्षेत्रों तक ही सीमित रखा, पूरे पूर्वांचल पर उनकी नज़र नहीं जा सकी.

हालांकि संसाधनों की दृष्टि से भी यह इलाक़ा कोई ग़रीब नहीं है. खेती अच्छी होती है और जगह-जगह तमाम कुटीर उद्योग भी फलते-फूलते रहे हैं.

लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक़ मशीनीकरण और सरकारी समर्थन और सहायता न मिलने के कारण उनका काफी नुक़सान हुआ है.

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यही नहीं, पर्यटन के लिहाज़ से भी ये क्षेत्र काफी अहम है, ख़ासकर बौद्ध धर्म से जुड़े स्थानों के चलते तमाम एशियाई देशों के पर्यटक लाखों की संख्या में यहां आते हैं. बावजूद इसके बुनियादी सुविधाओं से ये पूरा इलाक़ा वंचित है.

वंचित क्यों है इलाका?

गोरखपुर में रहने वाले वरिष्ठ साहित्यकार और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉक्टर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कहते हैं, "अब राजनीति पूरी तरह से जातियों और संप्रदायों में बँट गई है. महापुरुषों तक को जातीय खांचे में बाँट दिया गया है. ऐसे में स्वच्छ राजनीति और सम्यक विकास की कल्पना ही बेमानी हो जाती है."

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Image caption हिंदी अकादमी के अध्यक्ष और साहित्यकार विश्वनाथ प्रसाद तिवारी गोरखपुर में ही रहते हैं

ग़ाज़ीपुर के पूर्व सांसद और बीएसपी नेता अफ़ज़ाल अंसारी कहते हैं कि इस इलाक़े का विकास कभी नहीं हुआ, नेता चाहे जितने यहां से हुए हों.

वे कहते हैं, "बलिया-ग़ाज़ीपुर देश की आज़ादी में चाहे जितना कुर्बानी का इतिहास बता लें लेकिन आज़ादी के सत्तर साल बाद भी यहां के लोगों को कुछ नहीं मिला. लेकिन अब ये चिंगारी आग़ बन रही है. जब तक पूर्वांचल को अलग राज्य नहीं बनाया जाएगा, विकास नहीं होगा."

117 विधासभा सीटों पर नज़र

पूर्वांचल, उत्तर प्रदेश का सबसे ज़्यादा पिछड़ा इलाक़ा कहा जाता है बावजूद इसके कि यहां की ज़मीन काफी उपजाऊ है और लंबे समय तक देश और प्रदेश की राजनीति में इस इलाक़े के नेताओं का दबदबा रहा है.

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इस इलाक़े में 23 लोकसभा और 117 विधान सभा सीटें आती हैं. यही नहीं, पिछले दिनों चारों प्रमुख पार्टियों ने इसी इलाक़े से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की.

यानी वोटों और सीटों की दृष्टि से इस इलाक़े का राजनीतिक महत्व कहीं से कम नहीं है.

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बावजूद इसके यदि नेतृत्व और विकास का संकट है तो उसके पीछे कुछ कारण होंगे.

ग़ाज़ीपुर के वरिष्ठ समाजसेवी उमेश श्रीवास्तव का ये कथन ऐसे कई सवालों के उत्तर दे देता है, "विकास क्षेत्र का भले न हुआ हो, नेताओं का ज़रूर हुआ है. इस क्षेत्र में नेतृत्व संकट भले ही हो लेकिन जो नेता बन गए उनके परिवार राजनीति में फल-फूल रहे हैं."

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