निर्भया कांड के बाद बढ़े फ़र्जी बलात्कार के मामले?

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दिल्ली में दिसंबर 2012 में हुए निर्भया बलात्कार कांड के बाद बलात्कार के मामले दर्ज होने में तेज़ी आ गई थी.

दिल्ली में 2013-2014 में हुए एक सर्वे से पता चला कि इनमें से आधे से ज़्यादा मामले फ़र्ज़ी थे.

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पुरुषों के अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं के मुताबिक़ महिलाएं पुरुषों से पैसे ऐंठने के लिए बलात्कार के मामले दर्ज करा रही हैं.

दिल्ली में रियल एस्टेट एजेंट योगेश गुप्त ने एक कर्मचारी को पैसा गबन के आरोप में पकड़ा. उन्होंने उसे पुलिस में जाने की धमकी दी.

इस कर्मचारी ने एक महिला को इस बात के लिए तैयार किया कि वो ख़ुद को घर की खरीदार की तरह पेश करे.

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Image caption निर्भया कांड के ख़िलाफ़ 2012 में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे.

घर देखने के बाद इस महिला ने योगेश गुप्त से उसे नज़दीकी मेट्रो स्टेशन तक छोड़ने का अनुरोध किया. बाद में इस महिला ने योगेश गुप्त पर एक मकान की चौथी मंजिल पर ले जाकर बलात्कार की कोशिश करने का आरोप लगाया.

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योगेश यह जानते थे कि उनके पास मौजूद सबूत उन्हें बेगुनाह साबित करेंगे. उन्हें लगता था कि पुलिस भी उन्हें बेगुनाह बताएगी.

वो कहते हैं, "शुक्र है कि मेरे दफ़्तर में सीसीटीवी लगा हुआ था. जिसमें पूरा घटनाक्रम रिकॉर्ड हुआ था."

लेकिन जब महिला ने केस दर्ज करा दिया तो उन्हें लगा कि वो सिस्टम में जकड़ गए हैं, जिसे सबूतों की बहुत परवाह नहीं है. उसकी रुचि उन्हें अपराधी की तरह पेश करने में है.

वो कहते हैं, "किसी ने यह नहीं सुना कि मेरे पास कहने को क्या है. मुझसे पुलिस ने संपर्क भी नहीं किया."

पुलिस ने आठ महीने तक जांच-पड़ताल की. इसके बाद मामला अदालत में गया.

जहां उस महिला ने स्वीकार किया कि उसने झूठा आरोप लगाया है. इसके बाद योगेश बलात्कार के आरोपों से बरी हुए. लेकिन तब तक उनका बहुत ज्यादा नुक़सान हो चुका था.

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बलात्कार के झूठे मामले दर्ज कराने के बढ़ते मामलों को सामाजिक कार्यकर्ता एक बढ़ती हुई समस्या के रूप में देख रहे हैं.

निर्भया केस के बाद मीडिया में बलात्कार ख़ासकर निर्मम मामलों की रिपोर्टिंग बढ़ गई. सरकार ने बलात्कार की परिभाषा में बदलाव किया. पुलिस के लिए इसके हर मामले को दर्ज करना अनिवार्य बनाया गया. फ़ास्ट ट्रैक अदालतें बनाई गईं.

इसने महिलाओं को यौन उत्पीड़न के मामलों के रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए प्रेरित किया. दिल्ली में 2012 के सामूहिक बलात्कार के मामले के बाद मामले दर्ज कराने में सौ फ़ीसद से भी अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई.

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सरकार के क़दमों को सकारात्मक क़दम बताया गया. लेकिन दिल्ली महिला आयोग ने 2014 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की. इसके मुताबिक़ पिछले साल दर्ज हुए बलात्कार के मामलों में 53 फ़ीसद मामले फ़र्ज़ी थे.

पुरुष अधिकारों के लिए काम करने वालों ने इसे सबूत के रूप में लिया.

ऐसे ही एक कार्यकर्ता पार्थ साधूखान कहते हैं, ''आज बलात्कार की परिभाषा बहुत अधिक बदल गई है, किसी भी चीज को बलात्कार बताया जा सकता है.''

योगेश गुप्त के वकील विनय शर्मा कहते हैं, "बलात्कार के जितने भी मामले दर्ज होते हैं, उनमें से केवल एक फ़ीसद ही सही होते हैं. बाकी के मामले या तो बदला लेने की नीयत से दर्ज कराए जाते हैं या पैसे ऐंठने के लिए."

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Image caption विनय शर्मा

अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' की पत्रकार रुक्मणि श्रीनिवासन का तबादला मुंबई से दिल्ली हुआ. दिल्ली पहुंचकर उन्होंने यह पता लगाने की कोशिश की कि दिल्ली को रेप की राजधानी क्यों कहा जाता है.

उन्होंने 2013 में दिल्ली की अदालतों में चले 460 मामलों का अध्ययन किया. इनमें से केवल 12 मामलों में ही किसी अनजान पर बलात्कार का आरोप था.

एक तिहाई से अधिक मामले जिनमें युवा शामिल थे. उन्होंने अपनी मर्जी से सेक्स किया. लेकिन जब यह बात उनके परिजनों को पता लगी तो उन्होंने इस रिश्ते को तोड़ने के लिए बलात्कार के मामले दर्ज कराए. इनमें से बहुत से मामले अंतर्जातीय और अलग-अलग धर्मों के थे.

वहीं एक चौथाई मामले ऐसे थे जिसमें पुरुष के शादी से इनकार के बाद महिला ने बलात्कार का मामला दर्ज कराया था. हालांकि कई देशों में इस तरह के मामलों को बलात्कार नहीं माना जाता है. लेकिन भारत में इस तरह की परिस्थितियों में बलात्कार के आरोप का सामना करना पड़ता है.

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ऐसे मामलों में अभिभावकों को लगता है कि लड़की का कौमार्य भंग हो गया है, इसलिए उसकी शादी में दिक्कत होगी.

उनको लगता है कि बलात्कार का मामला दर्ज कराने से पुरुष डर जाएगा और उनकी लड़की से शादी कर लेगा.

लेकिन श्रीनिवासन को ऐसा कोई मामला नहीं मिला, जैसा योगेश गुप्त के साथ हुआ था.

श्रीनिवासन के इस अध्ययन से यह पता चलता है कि दिल्ली में बलात्कार के फर्ज़ी मामले दर्ज कराने की दर अंतरराष्ट्रीय स्तर से अधिक है.

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शोधकर्ताओं के मुताबिक़ कई देशों में बलात्कार के कुल मामलों में केवल आठ फ़ीसद मामले ही फ़र्ज़ी होते हैं.

वहीं एकैडमिशियन नित्या नागरत्नम इसे कई दूसरे ज़रूरी मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश मानती हैं.

नागरत्नम ने नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों के आधार पर 2014 में एक अध्ययन किया. इसके मुताबिक़ यौन हिंसा के केवल छह फ़ीसद मामले ही पुलिस के पास पहुंचते हैं.

वो कहती हैं कि इस समस्या की प्रकृति और पैमाने को समझने के लिए भारत को और बेहतर आंकड़ों की ज़रूरत है.

वो कहती हैं कि अगर आपके पास बेहतर आंकड़े नहीं होंगे तो बहस महिला और पुरुष अधिकारों की ओर चली जाएगी, जैसा कि आजकल हो रहा है.

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