'अकबर या महाराणाः महान तो एक ही था'

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राजस्थान की स्कूली किताबों में स्थानीय सांस्कृतिक प्रथाओं और मान्यताओं को बढ़ावा देने के नाम पर बदलाव किए जाने की कोशिश को लेकर विवाद हो रहा है.

वहाँ हिन्दी, इंग्लिश और समाज विज्ञान की किताबों में भारतीय मुसलमानों और ब्रिटिश लेखकों के लेखों की जगह कम जाने-माने स्थानीय लेखकों के काम को शामिल किया जा रहा है.

आलोचक कह रहे हैं, केंद्र और राज्य में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी शिक्षा व्यवस्था में हिंदू एजेंडा शामिल करवाने की कोशिश कर रही है.

राज्य सरकार ने पिछले साल दो उच्चस्तरीय निकायों, राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान को पहली से आठवीं और राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को नवीं से बारहवीं कक्षा के पाठ्यक्रम को फिर से तैयार करने के लिए कहा.

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स्थानीय नायकों को स्थान

मीडिया में आ रही ख़बरों से ऐसा लगता है कि ये ख़याल राज्य के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने दिया और उनकी 'लोकल टू ग्लोबल' की सोच को पुस्तक पुनर्निर्धारण समिति को बता दिया गया जिसे उन्होंने गठित किया था.

पिछले साल टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी एक ख़बर में एक समिति सदस्य को ये कहते बताया गया, कमिटी किताबों का गहनता से अध्ययन कर रही है जिससे कि ऐसे भारतीय लेखकों के लेखों को सामने लाया जा सके जो हमारी मातृभूमि के क़रीब हैं.

ऐसा बताया जा रहा है कि इस कमिटी को ऐसे निर्देश दिए गए थे कि वो ऐसे अध्यायों को निकाल दें जो "स्थानीय संस्कृति और मूल्यों" के साथ मेल नहीं खाते.

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तो ऑनलाइन उपलब्ध नई किताबों में मुस्लिम लेखकों - सफ़दर हाशमी और इस्मत चुगताई की कहानियाँ या कविताएँ शामिल नहीं हैं जो मुस्लिम किरदारों के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं.

कहा जा रहा है कि कमिटी सदस्यों का मानना है कि उनकी कहानियाँ और कविताएँ उर्दू शब्दों से भरी हैं जिन्हें समझना छात्रों के लिए मुश्किल है.

उनका कहना है कि उन्हें ऐसे अध्यायों को हटाने के लिए कहा गया है जिनमें एक "ख़ास मज़हब" के बारे में बात कही गई है.

यही नहीं, जॉन कीट्स, टॉमस हार्डी, विलियम ब्लेक, टी एस इलियट और एडवर्ड लियर जैसे कवियों की कविताएँ भी इंग्लिश की नई किताबों से बाहर कर दी गई हैं.

उनकी जगह बच्चों को स्थानीय लेखकों की कविताएँ - "द ब्रेव लेडी ऑफ़ राजस्थान", "संगीताः द ब्रेव गर्ल" और "चित्तौड़" जैसी कविताएँ पढ़ाई जा रही हैं.

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ना मंडेला, ना नेहरू

ऐसे ही दक्षिण अफ़्रीकी नेता नेल्सन मंडेला पर एक लेख की जगह भारत के आदिवासी समुदायों के बारे में एक लेख डाल दिया गया है.

जाने-माने पत्रकार पी साईनाथ के एक बहुचर्चित लेख 'जहाँ पहिया है' लेख को भी हटा दिया गया है जिसमें बताया गया है कि कैसे साइकिल महिलाओं की आज़ादी का प्रतीक है.

एनसीईआरटी की किताबें तय करनेवाली कमिटी के एक पूर्व सदस्य राजीव गुप्ता कहते हैं, "ऐसा लगता है उनकी दिलचस्पी सामाजिक विभेद को संस्थागत बनाने में है, इससे हमारा देश एक सांप्रदायिक देश बनता जाएगा."

किताबों में भारत के आधुनिक इतिहास पर जो एक नया चैप्टर आया है उसमें भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का ज़िक्र तक नहीं है.

मगर जान-बूझकर नेहरू के क़द को कम किए जाने के किसी आरोप को ग़लत बताते हुए कमिटी के एक सदस्य के एस गुप्ता ने कहा है कि उन्हें सरकार से "कुछ स्थानीय नायकों से जुड़ी कुछ ख़ास बातों को जगह देने" का निर्देश दिया गया था.

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अकबर-महाराणाः कौन है महान?

ऐसे ही महान की उपाधि जो मुग़ल बादशाह अकबर के साथ लगा करती थी, अब उसे उन्हीं के समय के हिंदू राजा महाराणा प्रताप के लिए इस्तेमाल की जाने लगी है.

देवनानी कहते हैं, "चूँकि महाराणा प्रताप ने अकबर से लड़ाई की थी, दोनों महान नहीं हो सकते. तो महान राणा प्रताप ही थे."

मगर विपक्षी पार्टियाँ बीजेपी-शासित राज्यों और केंद्र सरकारों पर आरोप लगाती हैं कि वो "भगवा ब्रिगेड को ख़ुश करने के लिए" कई बड़े शैक्षिक संस्थानों में अपना एजेंडा ठेलने की कोशिश कर रहे हैं.

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Image caption वसुंधरा राजे सरकार ने इतिहास से छेड़छाड़ के आरोप को ग़लत बताया है

इस बीच इंडियन एक्सप्रेस ने ख़बर दी है कि नागरिक अधिकारों के लिए काम करनेवाले संगठन पीयूसीएल ने एक खुला पत्र लिखकर पाठ्यपत्र को दुरुस्त करने की माँग की है.

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने भी कहा है कि आरएसएस के प्रभाव वाले पाठ्यक्रम में महात्मा गांधी की हत्या के बारे में कुछ नहीं कहा गया है.

गहलोत ने कहा, "इतिहास गवाह है कि जिनलोगों ने भी इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश की, वो ख़ुद इतिहास बन गए."

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