कश्मीरी लड़कियों में सिविल सेवा का बढ़ता क्रेज़

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Image caption कश्मीरी युवतियां सेहर, इक़रा, समरीन और फ़ौज़िया सिविल सेवा की तैयारियों में जुटी हैं

सेहर, इक़रा, समरीन और फ़ौज़िया साल भर से सिविल सर्विसेज़ इम्तिहान की तैयारी कर रही हैं.

कश्मीर में सिविल सर्विसेज़ के लिए ज़्यादातर मर्द ही आगे आते रहे हैं, लेकिन अब न सिर्फ़ औरतें सामने आ रही हैं बल्कि अब गांवों से आनेवाली महिलाओं की तादाद भी बढ़ रही है.

पहलगाम की रहनेवाली 22 साल की सेहर कहती हैं कि लोग बेटियों को बोझ समझते हैं और मैं उस नज़रिये को बदलना चाहती हूं.

उन्होंने कहा, "माँ बाप को नहीं लगना चाहिए कि बेटियां नहीं होनी चाहिए."

सेहर को लगता है कि सिविल सर्विसेज़ में आने के बाद वो महिलाओं की बेहतरी के लिए बहुत कुछ कर सकती हैं.

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सेहर के पिता एक निजी स्कूल में काम करते हैं और आईएएस टॉपर शाह फैसल उनके रोल मॉडल हैं. पिछले साल भी सिविल सर्विसेज़ में एक कश्मीरी लड़के को चुना गया था.

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Image caption सोपोर निवासी इक़रा पहले पत्रकारिता में आना चाहती थीं लेकिन अब सिविल सेवा में जाना चाहती हैं

सोपोर निवासी इक़रा जो पहले पत्रकार बनना चाहती थीं, लेकिन अब वो बीटेक करने के बाद सिविल सर्विसेज़ की तैयारी कर रही हैं.

इक़रा को घर वालों से पैसे माँगना अच्छा नहीं लगता तो उन्हें लगा कि वो नौकरी के लिए इस रास्ते को आज़मा सकती हैं और अधिकारी बनकर महिलाओं के लिए कुछ कर सकती हैं.

इलाके में आठ कोचिंग सेंट

कुपवाड़ा की 20 साल की समरीन को लगता है कि महिलाओं को हर जगह ख़ौफ़ में जीना पड़ता है और वो उसके ख़िलाफ़ जंग करना चाहती हैं. समरीन की रोल मॉडल रोहिदह सलाम हैं जो कुछ सालों पहले आईपीएस के लिए चुनी गई थीं.

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Image caption कुपवाड़ा की 20 साल की समरीन महिलाओं को सुरक्षा देना चाहती हैं

साल 2011 में दक्षिणी कश्मीर के बिजबिहाड़ाह इलाके की रहने वाली नाज़िया जान ने जेकेएएस (जम्मू कश्मीर की राज्य प्रशासनिक सेवा) परीक्षा पास की थी.

नाज़िया अब एक एक्साइज अफ़सर हैं. श्रीनगर में इस समय सिविल सर्विसिेज़ के आठ कोचिंग सेंटर हैं जिनमें 30 प्रतिशत महिलाएं सिविल सर्विसेज़ की कोचिंग कर रही हैं.

महिलाओं को मिलती मदद

सिविल सर्विसेज़ कोचिंग एसोसिएशन के मुखिया जी. एन. वार कहते हैं कि पहले लोगों को यहां सिविल सर्विसेज़ परीक्षा के बारे में मालूम ही नहीं था.

इनमें से एकने तो इस साल से सिवाए मामूली रजिस्ट्रेशन फ़ीस के किसी और तरह के पैसे लेना बंद कर दिया है जिससे महिलाओं को मदद मिल रही है.

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अनंतनाग में कुछ स्थानीय अधिकारियों ने सिविल सर्विसेज़ कोचिंग की शुरुआत की है जहां किसी तरह का कोई पैसा नहीं देना पड़ता है. वहां भी लगभग 25 फ़ीसद महिलाएं हैं जो इन क्लासेज़ को अटेंड कर रही हैं.

श्रीनगर के बाग़ात में कोचिंग सेंटर चलाने वाले उमर जान कहते हैं कि उनके सेंटर में लड़कियों की तादाद अभी 28 के क़रीब हैं जिनमें से 25 ग्रामीण कश्मीर की हैं. उमर के मुताबिक़ ये संख्या हाल के सालों में बढ़ती जा रही है.

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