यूपी चुनाव में इसलिए दांव पर है मोदी की साख

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उत्तर भारत के सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश में 11 फ़रवरी से सात चरणों में नई सरकार चुनने के लिए चुनाव शुरू हो गया है. 20 करोड़ की आबादी के साथ उत्तर प्रदेश भारत का सबसे ज़्यादा आबादी वाला राज्य है. यदि उत्तर प्रदेश कोई अलग देश होता तो आबादी के मामले में यह चीन, भारत, अमरीका और इंडोनेशिया के बाद पांचवां सबसे बड़ा देश होता.

सामान्य तौर पर यह बात कही जाती है कि यह प्रदेश भारतीय संसद में सबसे ज़्यादा 80 सांसद भेजता है. इसीलिए अक्सर कहा जाता है कि जो पार्टी उत्तर प्रदेश जीत लेती है वही देश पर राज करती है. इस प्रदेश से भारत के कई प्रधानमंत्री बने. यहां तक कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी इसी राज्य से थे.

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Image caption यदि उत्तर प्रदेश देश होता तो दुनिया का पांचवां सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश होता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात से हैं, लेकिन उन्होंने भी 2014 के आम चुनाव में संसद की राह बनारस यानी उत्तर प्रदेश से ही चुनी. उत्तर प्रदेश के मतदाता बड़ी सहजता से दावा करते हैं कि भारतीय जनता पार्टी को उन्होंने सत्ता पर काबिज कराया.

बीजेपी ने 2014 के आम चुनाव में 282 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जिसमें से केवल उत्तर प्रदेश से उसे 71 लोकसभा सांसद मिले थे.

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कौन सी पार्टियां रेस में?

इस बार प्रदेश में बीजेपी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस-समाजवादी पार्टी गठबंधन के बीच त्रिकोणीय मुक़बला है. प्रदेश की राजनीति में 1990 के दशक से बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का दबदबा रहा है. कांग्रेस और बीजेपी इस काल में राज्य की राजनीति में हाशिए पर ही रहे.

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Image caption चुनाव जीतने के लिए समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और कांग्रेस के राहुल गांधी साथ आए हैं

लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव में मिली शानदार सफलता से उत्साहित बीजेपी को चुनाव में गंभीर खिलाड़ी के रूप में आंका जा रहा है. पार्टी ने चुनाव में किसी को भी मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बनाया है. वह विधानसभा चुनाव को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के दम पर जीतना चाहती है. मोदी उत्तर प्रदेश में कई रैलियां कर रहे हैं और लोगों से प्रदेश में बीजेपी को सरकार बनाने का मौका देने की अपील कर रहे हैं.

समाजवादी पार्टी का नेतृत्व 41 साल के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कर रहे हैं. 2012 के विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश ने अहम भूमिका अदा की थी. उन्हें उम्मीद है कि 11 मार्च को जब वोटों की गिनती होगी तो नतीजे उनके पक्ष में ही आएंगे.

हालांकि चुनाव से पहले उन्हें पार्टी की कमान अपने हाथ में लेने के लिए पिता मुलायम सिंह की नाराज़गी झेलनी पड़ी.

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Image caption दांव पर पीएम मोदी की साख?

पिता और पुत्र में सत्ता के लिए नाटकीय रूप से असहमति सामने आई. ऐसा लग रहा था कि समाजवादी पार्टी पिता-पुत्र की कलह में पूरी तरह से बिखर जाएगी. हालांकि इस लड़ाई में बेटे को जीत मिली और उन्होंने भारत के मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया.

दोनों पार्टियां संयुक्त रूप से रैलियां कर रही हैं. यह गठबंधन सुशासन, विकास और युवाओं को स्मार्टफ़ोन देने का वादा कर रहा है.

भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन के ख़िलाफ़ बीएसपी प्रमुख मायावती भी मैदान में हैं. मायावती को दलितों का नेता माना जाता है. प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती को 2012 के विधानसभा चुनाव में हार का सामना करने पड़ा था.

वह प्रदेश की राजनीति में वापसी के लिए संघर्ष कर रही हैं. मायावती सभी समुदायों में काफी लोकप्रिय हैं लेकिन अपने पहले के शासनकाल में करोड़ों रुपये खर्च कर दलित शख्सियतों की मूर्ति बनाने के आरोप में घिरी थीं. इस बार का चुनाव मायावती के लिए इतना आसान नहीं है. उन्होंने इस बार वादा किया है कि वह सत्ता में आएंगी तो मूर्तियां नहीं बनवाएंगी. उन्होंने वादा किया है कि लोगों को ग़रीबी से निकालने पर काम करेंगी.

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ज़ाहिर सी बात है कि यह जीत मायावती के पिछले पांच सालों के राजनीतिक वनवास को ख़त्म करने के लिए महत्वपूर्ण है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि वह इस बार चुनाव हार जाती हैं तो उनके लिए अप्रासंगिक होने का भारी जोखिम है. उनके लिए राजनीति में वापसी करना काफी कठिन होगा.

दांव पर क्या लगा है?

विशाल आकार और संख्या के कारण उत्तर प्रदेश अहम सियासी मैदान है. यूपी चुनाव में दलों के लिए करो या मरो जैसी लड़ाई की स्थिति है. 2014 में आम चुनाव जीतने के बाद से बीजेपी ने राज्य में हुए चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन किया है. ऐसे में उसके लिए यह जीत काफी अहम है.

इस चुनाव को मोदी सरकार के नोटबंदी पर जनमत संग्रह के रूप में भी देखा जा रहा है. कई पार्टियों ने नोटबंदी पर सवाल खड़ा किया था और ऐसे में बीजेपी हारती है तो वह बुरी तरह से आरोपों के घेरे में आएगी.

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Image caption मोदी के काफी अहम है यूपी चुनाव

समाजवादी पार्टी के मजबूत नेता बनकर उभरने के लिए अखिलेश यादव के लिए भी यह जीत काफी महत्वपूर्ण है. यदि वह चुनाव हारते हैं तो समाजवादी पार्टी में उनके चाचा शिवपाल यादव के नेतृत्व में विद्रोह को रोकना आसान नहीं होगा.

अखिलेश की जीत कांग्रेस के लिए भी पार्टी को दोबारा ज़िंदा करने की तरह होगी. पिछले कुछ सालों से कांग्रेस हर चुनाव में बुरी तरह से हारती आ रही है.

प्रदेश की कुल 403 सीटों पर हज़ारों प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं. 13.8 करोड़ से ज़्यादा मतदाता 1 लाख 47 हज़ार पोलिंग बूथों पर हज़ारों सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में मतदान करेंगे.

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