ब्लॉग: 'जज' उमा का आदेश - खाल में नमक-मिर्च भर दो

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एक मुख्यमंत्री और थानेदार के बीच बातचीत किस तरह से होती होगी? इसे समझने के लिए थोड़ी कल्पना का सहारा लेते हैं.

मध्य प्रदेश के अंदरूनी इलाक़े में किसी सुनसान से क़स्बे के एक थाने में ऊँघते हुए थानेदार के फ़ोन की घंटी बजती है और दूसरी ओर से आवाज़ आती है - माननीय मुख्यमंत्री महोदया बात करना चाहती हैं.

थानेदार अपनी सीट से लगभग खड़ा हो जाता है. उसके और माननीय मुख्यमंत्री महोदया के बीच फ़ोन पर कुछ यूँ बात होती है

थानेदार - मैडम, प्रणाम मैडम.

मुख्यमंत्री - आपके क्षेत्र में क़ानून व्यवस्था कैसी है? सब कुछ क़ानून के हिसाब से चल रहा है ना? ध्यान रखिएगा किसी के साथ ज़्यादती न हो, किसी का मानवाधिकार हनन न हो. अपराधी को अदालत से आप सज़ा दिलवाएँ पर निर्दोष पर ज़ुल्म न हो.

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पुलिस चाहती है मानवाधिकार का काम न हो

थानेदार- बिलकुल नहीं मैडम, हमने स्थानीय मानवाधिकार संगठनों के साथ मिलकर एक पुलिस-नागरिक समिति बनाई है जो इस बात का ध्यान रखती है कि कहीं ज़्यादती न हो.

मुख्यमंत्री - ठीक है. आप जानते हैं न कि हमारा संविधान नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी देता है और मैंने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए संविधान की मर्यादा की रक्षा करने की शपथ भी ली है. ठीक है आप अपना काम निडर होकर और बिना किसी दबाव के ठीक ढंग से कीजिए.

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फ़ोन कट जाता है. पर इसमें कहीं कुछ गड़बड़ लग रही है. ये बातचीत काल्पनिक नहीं बल्कि सच होनी चाहिए पर सच लग क्यों नहीं रही है?

चलिए मुख्यमंत्री और थानेदार के बीच एक और बातचीत की कल्पना करते हैं. वही मध्य प्रदेश के अंदरूनी इलाक़े का ऊँघता हुआ क़स्बा, वही थानेदार, वैसे ही घंटी बजती है और थानेदार को बताया जाता है कि मैडम मुख्यमंत्री बात करेंगी.

थानेदार- मैडम, प्रणाम मैडम. मुख्यमंत्री - क्या हुआ उन बलात्कारियों का जिन्हें तुमने पकड़ा था?

थानेदार - मैडम, बंद कर दिया है कल अदालत में पेश किया जाएगा.

मुख्यमंत्री - ठहरो, तुरंत उन महिलाओं को थाने बुलाओ और उनसे कहो खिड़की से देखती रहें. तुम बलात्कारियों को उलटा लटका दो.

थानेदार- लेकिन मैडम.

मुख्यमंत्री - लेकिन वेकिन कुछ नहीं. मैं जैसा कह रही हूँ वैसा करो. बलात्कारियों को महिलाओं के सामने उलटा लटकाओ फिर मार मार कर उनकी चमड़ी उधेड़ दो. और फिर उनके माँस में नमक और मिर्च भर दो.

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थानेदार - लेकिन मैडम.

मुख्यमंत्री - लेकिन वेकिन कुछ नहीं, जैसा कहा जा रहा है वैसा करो. माँस में नमक मिर्च भरो ताकि बलात्कारी तड़पें और अपनी ज़िंदगी की भीख माँगें और उनकी चीखें खिड़की से देख रही लड़कियों और महिलाओं के कानों तक पहुँचें.

थानेदार - (हिम्मत करके) पर मैडम, मानवाधिकार का मुद्दा उठ जाएगा. ये तो मानवाधिकारों का हनन होगा.

मुख्यमंत्री - थानेदार, ऐसे दानवों का मानवाधिकार नहीं होता. मानवाधिकार उसी का है जो मानव की तरह बर्ताव करेगा. जो मानव की तरह बर्ताव नहीं करेगा दानव की तरह बर्ताव करेगा, रावण की तरह उसकी मुंडियाँ काट देनी चाहिए. उसकी लंका जलाकर फूँक देनी चाहिए.

फ़ोन काट दिया जाता है.

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ये दृश्य काल्पनिक हो सकता है, लेकिन बातचीत काल्पनिक नहीं है. थानेदार से बलात्कार के आरोप में पकड़े गए लोगों को उलटा लटका कर, उनकी खाल उधेड़ कर उसमें नमक और मिर्च भरने की सलाह देने वाली मुख्यमंत्री उमा भारती हैं जो बचपन से धार्मिक प्रवचन करने और भगवत गीता का प्रचार करने के लिए जानी जाती थीं.

कालांतर में वो साध्वी भी कहलाईं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नज़दीक आईं, भारतीय जनता पार्टी की स्थापित नेता बनीं और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचीं. और अब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में गंगा को निर्मल करने वाले विभाग की कैबिनेट मंत्री हैं.

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बलात्कारियों के माँस में नमक-मिर्च भरकर सज़ा देने की ये बात न तो किसी स्टिंग ऑपरेशन से सामने आई और न ही किसी ने उमा भारती का फ़ोन टैप किया. बल्कि उन्होंने ख़ुद 9 फ़रवरी 2017, को उत्तर प्रदेश की चुनावी जनसभा में इसकी जानकारी अपने वोटरों को दी जिन्होंने उत्साह में बार-बार तालियों की गड़गड़ाहट से इसका स्वागत किया.

उमा भारती ने कहा, "ऐसे लोगों को जिन्होंने ऐसे दुष्कर्म किए होते हैं, उन्हें उन्हीं लड़कियों के सामने, महिलाओं के सामने उलटा लटका कर मार मार कर चमड़ी उधेड़ कर फिर उस माँस में नमक और मिर्च भर देना चाहिए, ताकि ये तड़पें और इन्हें तड़पते हुए देखें वो लड़कियाँ और वो माएँ और वो बहनें. जब ये तड़पेंगे और अपनी ज़िंदगी की भीख माँगेंगे. मैंने ऐसा करवाया था जब मैं मुख्यमंत्री थी."

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Image caption शारीरिक यातना की प्रतीकात्मक तस्वीर

"जब एक महिला के साथ ऐसा हुआ था तब मैंने ऐसा करवाया था. मुझे पुलिस अधिकारियों ने कहा था कि दीदी, मानवाधिकारों का हनन हो जाएगा. मैंने कहा मानवाधिकार उसी का है जो मानव की तरह बर्ताव करेगा. जो मानव की तरह बर्ताव नहीं करेगा दानव की तरह बर्ताव करेगा, रावण की तरह उसकी मुंडियाँ काट देनी चाहिए. उसकी लंका जलाकर फूँक देनी चाहिए."

बहुत से लोगों को याद होगा न्यायमूर्ति आनंद नारायण मुल्ला ने बरसों पहले कहा था, "मैं पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ कि पूरे देश में एक भी ऐसा क़ानून-विरोधी गिरोह नहीं है जिसके अपराधों का रिकार्ड उस संगठित ताक़त के बराबर होगा जिसे भारतीय पुलिस बल कहते हैं." यानी न्यायमूर्ति मुल्ला ने पुलिस वालों को सीधे सीधे वर्दीधारी अपराधी कहा था.

आज अगर न्यायमूर्ति मुल्ला मौजूद होते तो उन्हें ये परिभाषा बदलनी पड़ती. उमा भारती ने जिस घटना का ज़िक्र किया है उसके हिसाब से आँका जाए तो पुलिस अधिकारी कर्तव्यनिष्ठ, क़ानून के पाबंद और न्यायप्रिय होते हैं. लेकिन संविधान की शपथ लेकर मंत्री-मुख्यमंत्री बनने वाले उन पुलिस वालों पर क़ानून तोड़ने और मानवाधिकारों के धुर्रे बिखरने का दबाव डालते हैं.

उमा भारती ने अपने चुनावी भाषण में बहुत विस्तार से नहीं बताया कि उनके आदेश का पालन करते हुए पुलिस अधिकारियों ने बलात्कार के अभियुक्तों की खाल खींची या नहीं, या फिर उनके उधड़े हुए माँस में नमक-मिर्च भरी या नहीं. लेकिन यंत्रणा देने के ये मध्ययुगीन तरीक़े उमा भारती को पसंद आते हैं.

उमा भारती उस आधुनिक भारत की आधुनिक नेता हैं जिसे रीसर्जेंट इंडिया भी कहा जाता हैं और जहाँ के नेता और अर्थशास्त्री डबल डिजिट ग्रोथ, डिजिटल इंडिया, कैशलैश ट्रांज़ैक्शन, स्टार्ट-अप्स, स्मार्ट सिटीज़, बुलेट ट्रेन जैसे जुमलों को आम बोलचाल में ले आए हैं.

पर इस मुद्दे पर शायद बहुत विचार-विमर्श नहीं हुआ है कि ऐसे रीसर्जेंट इंडिया में यंत्रणा के तरीक़े कैसे होंगे? क्या अब भी भारतीय पुलिस पर यातना देने के मध्ययुगीन तरीक़े अपनाने के लिए दबाव डाला जाना चाहिए या फिर यातना के तरीक़ों का डिजिटाइज़ेशन करने पर विचार किया जाना चाहिए?

क्योंकि जैसे जैसे टेक्नॉलॉजी का विकास हुआ है जीवन जीने के तरीक़े बदले हैं. उमा भारती को सोचना चाहिए कि क्या अभियुक्तों को यातना देने के तरीक़े वही रहने चाहिए जैसे मध्ययुग में हुआ करते थे?

ये मुश्किल आसान करने के लिए उमा भारती शायद यंत्रणा के उपकरणों के इतिहास का अध्ययन करना चाहें. इसके लिए उन्हें सबसे पहले यूरोप से शुरुआत करनी चाहिए जहाँ सदियों पहले धर्म की अवहेलना करने वाले लोगों को स्टेक पर ज़िंदा जला दिया जाता था.

दरअसल उन्हें यंत्रणा प्रोजेक्ट यात्रा की शुरुआत चेक रिपब्लिक के ऐतिहासिक शहर प्राग से करनी चाहिए जहाँ बाक़ायदा एक यातना म्यूज़ियम बनाया गया है. इसमें उन उपकरणों की प्रदर्शनी लगाई गई है जिनसे अपराधियों को यातनाएँ दी जाती थीं.

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Image caption शारीरिक यातना की प्रतीकात्मक तस्वीर

जूडाज़ क्रेडल - ये लोहे का शंक्वाकार औज़ार होता है जिस पर क़ैदी को निर्वस्त्र करके और हाथ पैर बाँध कर बैठने पर मजबूर किया जाता था.

घुटनातोड़ - अपराधी घुटने के दोनों ओर लोहे की तीखी सरियों को फँसाकर पेंच के ज़रिए धीरे धीरे कसा जाता था जिससे घुटना पूरी तरह चकनाचूर हो जाता था.

खोपड़ीतोड़ - अपराधी की खोपड़ी में लोहे की मज़बूत गोल पट्टी को पेंच के ज़रिए इतना कसा जाता था जिससे खोपड़ी फूट जाती थी.

स्तन काटने का औज़ार - लोहे की गोल पट्टी जिसके भीतरी हिस्से में लोहे के काँटे लगे होते थे. अनैतिक यौन संबंध, ईशनिंदा, गर्भपात आदि का आरोप लगाकर इसे अभियुक्त महिला के स्तर पर कस कर खींचा जाता था जिससे स्तन उखाड़ दिए जाते थे.

लौह कुर्सी - इस कुर्सी में लोहे की सैकड़ों कीलें उभरी होती थीं. अपराधी को इस पर बैठाकर लोहे की पट्टियों से धीरे धीरे जकड़ा जाता था ताकि कीलें उसके शरीर में घुस जाएँ. ज़्यादा ख़ून बहने से अपराधी की मौत हो जाती थी.

लेकिन उमा भारती को शायद इन विदेशी औज़ारों पर एतराज़ हो इसलिए वो यंत्रणा के स्वदेशी तरीक़ों के बारे में जानना चाहें.

जिसकी बंदूक उसकी हुकूमत

चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाने से पहले अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में एक ऐसा महल बनाया था जो बाहर से देखने में बहुत सुंदर था, जहाँ फलदार पेड़ लगाए गए थे और सुंदर स्नानागार बनाए गए थे.

पर वहाँ जाने वाला जीवित लौट नहीं पाता था. प्राचीन ग्रंथ अशोकावदान में अशोक के इस यातनालय का ज़िक्र आता है और लिखा गया है कि सम्राट अशोक ने एक नर्क का निर्माण किया था.

किंवदंती है कि अपराधियों और निरपराध लोगों को यातनाएँ देने के लिए सम्राट अशोक ने चंडगिरिका नाम के एक जल्लाद को इस महल में काम पर रखा. सम्राट अशोक ने चंडगिरिका के सामने शर्त रखी थी कि वो इस महल से किसी को जीवित नहीं लौटने देगा.

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चंडगिरिका ने महल में कई कमरे बनाए थे जिनमें बड़ी बड़ी भट्ठियों में धातु गलाई जाती थी. ये पिघली हुई धातु कैदियों के ऊपर उड़ेल दी जाती थी.

यातना देने का एक तरीक़ा यह भी था कि अपराधी का मुँह खोलकर उसमें पिघला हुआ ताँबा उड़ेल दिया जाता था.

ब्रूस रिच ने अपनी किताब - 'टू अपहोल्ड द वर्ल्ड ए कॉल फॉर न्यू ग्लोबल एथिक फ़्रॉम एंशिएंट इंडिया' और जॉन एस स्ट्रॉग ने 'अशोकावदान' के अनुवाद में इस यातना महल पर विस्तार से लिखा है.

उमा भारती को कौटिल्य से भी प्रेरणा मिलेगी जिन्होंने अर्थशास्त्र में दंड के कई तरीक़े सुझाए हैं उनमें से एक तरीक़ा अपराधी की नाक में नमक का पानी डालना भी है. इसके अलावा राजा की पत्नी से संबंध बनाने वाले को बड़े बरतन में उबालने का प्रावधान सुझाया गया है.

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इसी तरह सल्तनत और मुग़ल युग में अपराधी को दीवार से चिनवा देने या हाथी के पैर से कुचलवा देने की प्रथा थी. यहाँ तक कि अँग्रेज़ी शासन के शुरुआती दौर में विरोधियों को तोप के दहाने पर बाँध कर उड़ा दिया जाता था.

पर तब न जनतंत्र था, न मतदाता अपनी सरकार चुनते थे, न संविधान था और न ही मानवाधिकार.

लेकिन मानव को दानव घोषित कर दिया जाए तो फिर उमा भारती को ये सभी तरीक़े इस्तेमाल करने से रोक कौन सकता है?

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