अपनी ही धार से कट गया रामपुरी चाकू

रामपुर में नवाबों के दौर में आम और ख़ास आदमी के दो हथियार होते थे- तेज़ ज़ुबान और तेज़-धार वाली छुरी.

तेज़ ज़ुबान तो रह गई लेकिन तेज़ छुरी बदलते ज़माने के बदलते असर का शिकार हो गई.

रामपुरी छुरी की अपनी एक पहचान थी. इसे बनाना एक कला थी. इसे एक अदा के साथ खोला जाता था. पुरानी बॉलीवुड फ़िल्मों के विलेन इसे एक क्लिक के साथ खोलते थे और दुश्मन के ख़िलाफ़ इसे हवा में लहराते थे.

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फ़ोल्ड की हुई छुरी के हैंडल पर आकर्षक नक़्क़ाशी की जाती थी और कई साइज़ की छुरियाँ तैयार की जाती थीं.

लेकिन ऑटोमैटिक राइफ़ल और दूसरे आधुनिक हथियारों के इस दौर में हाथ से बने रामपुरी छुरी और चाकू को अब कोई नहीं पूछता.

स्थानीय लोग कहते हैं इस उद्योग का अंत 15 साल पहले हो चुका था. लेकिन 56 साल के यामीन अंसारी अकेले इस हुनर को ज़िंदा रखे हुए हैं.

वो कहते हैं, "एक दौर था जब हमारे जैसे चार हज़ार से पाँच हज़ार कारीगर हुआ करते थे. लेकिन अब मैं अकेला रह गया हूँ. सबके दूसरे पेशे हैं."

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अंसारी पूरे शहर में अब अकेले जीवित कारीगर हैं. किसी ने कहा एक और कारीगर सक्रिय है. लेकिन उसे ढूँढने की पूरी कोशिश की. उसका पता नहीं चला.

ख़ुद अंसारी ने कहा कि उसके अलावा कोई कारीगर सक्रिय नहीं है. वो कहते हैं, "कोई रिक्शा चलाने पर मजबूर हो गया तो कोई मज़दूरी करने पर. "

अंसारी की चार बेटियां और एक बेटा है. इनमें से किसी ने इस हुनर को नहीं सीखा. अंसारी के अनुसार वो इस पुराने हुनर की आख़री कड़ी हैं.

छुरियों का प्रोडक्शन बंद होते ही रामपुर के प्रसिद्ध चाकू बाज़ार का नाम टीपू सुल्तान मार्केट रख दिया गया.

अब केवल दो दुकाने बची हैं जो रामपुरी छुरी के साथ-साथ कैंची और ताले भी बेचते हैं.

दोनों दुकानदार कहते हैं कि रामपुरी छुरी की माँग है ही नहीं. एक ने कहा कि इससे उसका पुश्तैनी लगाव है. रामपुर की छुरी से उसकी भावनाएँ जुड़ी हैं.

कारीगर अंसारी कहते हैं कि रामपुरी छुरी की शोहरत ही उसकी बदनामी और उसके पतन की वजह बनी.

बचपन में सुनते थे कि अलीगढ़ का ताला, मुरादाबाद का पीतल, फ़िरोज़ाबाद की चूड़ियाँ, मेरठ की कैंची और रामपुर की छुरी.

नोटबंदी ने मुरादाबाद के पीतल उद्योग की चमक ग़ायब कर दी है. मेरठ की कैंची और अलीगढ़ के तालों के उद्योग आख़री साँसे ले रहे हैं. फ़िरोज़ाबाद की चूड़ियों की खनक भी खत्म होती जा रही है.

रामपुर की छुरी और चाकू का उद्योग 15 साल पहले मर चुका था.

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रामपुर का मोहल्ला "नई बस्ती" के अपने पुराने घर के आँगन में अंसारी हमें अपना हुनर दिखाने के लिए छुरी बनाना शुरू करते हैं.

हाथ और दिमाग़ तेज़ी से काम करते हैं लेकिन मशीनें सुर औज़ार पुराने हो चुके हैं. फिर भी वो एक छुरी आधे घंटे में तैयार कर लेते हैं, "हम छह घंटे में छह छुरियाँ बना लेते हैं जब हमारा काम ज़ोरों पर था तो हम एक दिन में 25 छुरियाँ बना लेते थे."

अंसारी एक आधे बेरोज़गार कारीगर हैं. कभी रामपुरी छुरी बनाने का ऑर्डर मिलता है तो गुज़ारा होता है वरना किचन में इस्तेमाल होने वाले चाकू बनाकर गुज़र-बसर कर लेते हैं.

Image caption चाकू बनाने का लाइसेंस

रामपुरी छुरी की बदनामी में बॉलीवुड का योगदान भी है. एक ज़माने में हर विलेन के हाथ में रामपुरी छुरी हुआ करती थी.

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उत्तर प्रदेश सरकार ने साल 1990 में साढ़े चार इंच से लम्बी छुरी रखने और बेचने पर पाबंदी लगा दी थी. ये भी उसके पतन का कारण बना.

अंसारी कहते हैं कि रामपुरी छुरी से कहीं ख़तरनाक औज़ार मार्केट में है लेकिन उस पर पाबंदी नहीं लगी.

बाज़ार में चीन से नक़ली रामपुरी छुरी आने लगी. इससे भी पूरी तरह से हाथ से बनने वाली रामपुरी छुरी की बिक्री रुकी.

अंसारी भी हार मान चुके हैं. वो किसी भी समय ये काम बंद कर सकते हैं.

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